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Faridabad News: खराब ट्यूबवेल की अब जल्द हो सकेगी मरम्मत
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नगर निगम नई व्यवस्था लागू करने की कर रहा तैयारी, 24 से 48 घंटे में री-बोरिंग शुरू कराने की योजना
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। गर्मी में पानी की मांग बढ़ते ही ट्यूबवेल खराब होने पर लोगों को कई दिन तक पानी की परेशानी न झेलनी पड़े, इसके लिए नगर निगम नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी कर रहा है। इसके तहत ट्यूबवेल में री-बोरिंग की जरूरत सामने आने पर 24 से 48 घंटे के भीतर ड्रिलिंग का काम शुरू कराने की व्यवस्था बनाने पर जोर है। आपात स्थिति में सस्पेंस हेड से सीधे री-बोरिंग कराने का प्रावधान भी तैयार किया जा रहा है। इससे सामान्य वित्तीय प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम कर खराब जलस्रोत जल्द चालू कराने का प्रयास होगा।
फरीदाबाद में पानी की मांग करीब 450 एमएलडी है, जबकि उपलब्धता करीब 300 से 325 एमएलडी के बीच है। ऐसे में पहले से ही मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। इस स्थिति में किसी इलाके का ट्यूबवेल बंद होना वहां की जलापूर्ति व्यवस्था पर सीधा असर डालता है। खासकर गर्मी के दिनों में जब पानी की खपत बढ़ जाती है, तब लोगों को टैंकरों पर निर्भर होना पड़ता है।
17 ग्राउंड ट्यूबवेल से भी मिलती है जलापूर्ति
शहर की जलापूर्ति में 22 रेनीवेल अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा 17 ग्राउंड ट्यूबवेल से भी पानी लिया जाता है। इन जलस्रोतों में मोटर खराब होने, बोर में तकनीकी दिक्कत आने या अन्य कारणों से पानी की आपूर्ति रुक जाती है। समस्या का समाधान समय पर नहीं होने पर संबंधित क्षेत्र में पानी की कमी और बढ़ जाती है। भविष्य में बढ़ती आबादी और पानी की जरूरत को देखते हुए नए रेनीवेल और ट्यूबवेल विकसित करने की योजनाओं पर भी काम किया जा रहा है। ऐसे में मौजूदा जलस्रोतों को चालू हालत में रखना भी उतना ही जरूरी है। अधिकारियों का मानना है कि नया स्रोत तैयार करने के साथ पुराने स्रोतों में खराबी आने पर उन्हें जल्द चालू कराने की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।
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स्रोत एफएमडीए के, घरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निगम की
फरीदाबाद में पानी की पूरी व्यवस्था नगर निगम के पास नहीं है। एफएमडीए प्रमुख जलस्रोतों और बड़ी जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़े हिस्से को संभालता है, जबकि नगर निगम की जिम्मेदारी वितरण नेटवर्क के माध्यम से पानी को लोगों के घरों तक पहुंचाने की है। रेनीवेल से मिलने वाली थोक जलापूर्ति को एफएमडीए की व्यवस्था के जरिये भूमिगत जल भंडारण टैंकों तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद नगर निगम के नेटवर्क से अलग-अलग इलाकों में पानी की आपूर्ति की जाती है।
यही वजह है कि जलस्रोत में खराबी आने पर दोनों विभागों के बीच तेजी से समन्वय होना जरूरी है। ट्यूबवेल बंद होने के बाद पहले तकनीकी जांच, फिर मरम्मत या री-बोरिंग का फैसला और इसके बाद मशीन व अन्य संसाधनों की व्यवस्था में समय लग जाता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य इसी प्रक्रिया को छोटा करना है।
एनआईटी से बल्लभगढ़ तक कई इलाकों में ज्यादा असर
ट्यूबवेल खराब होने का असर उन इलाकों में अधिक पड़ता है जहां वैकल्पिक जलस्रोत सीमित हैं। एनआईटी, डबुआ, पर्वतीय कॉलोनी, सैनिक कॉलोनी और बल्लभगढ़ के कई हिस्सों में गर्मी के दौरान पानी की मांग बढ़ने पर स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है। किसी स्थानीय स्रोत के बंद होने पर लोगों को पर्याप्त पानी के लिए टैंकरों का इंतजार करना पड़ता है। कई जगहों पर लोग निजी स्तर पर भी पानी की व्यवस्था करने को मजबूर होते हैं।
24 से 48 घंटे में काम शुरू हुआ तो घटेगी परेशानी
नई एसओपी में सबसे बड़ा बदलाव खराब ट्यूबवेल की मरम्मत प्रक्रिया को समयबद्ध करना है। अगर जांच में री-बोरिंग की जरूरत सामने आती है तो सामान्य प्रक्रिया में समय गंवाने के बजाय 24 से 48 घंटे के भीतर ड्रिलिंग शुरू कराने की व्यवस्था बनाने की तैयारी है। इसके लिए सस्पेंस हेड से आपात काम कराने का प्रावधान भी रखा जा सकता है। इससे जरूरत पड़ने पर तत्काल उपलब्ध स्वीकृत राशि से काम शुरू कराया जा सकेगा।
हालांकि यह व्यवस्था किस स्तर पर लागू होगी, किस अधिकारी को वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे और सस्पेंस हेड से कितनी राशि तक काम कराया जा सकेगा, इसकी अंतिम आधिकारिक प्रक्रिया अभी स्पष्ट नहीं है। व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए तकनीकी जांच, मशीन की उपलब्धता, पाइप और मोटर की व्यवस्था तथा बिजली कनेक्शन से जुड़े काम भी समानांतर रूप से पूरे करने होंगे।
लोगों की सुविधा के लिए नगर निगम कई स्तरों पर काम कर रहा है। जलनिकासी व पेयजल उपलब्ध करवाना वाले कार्य सबसे अधिक प्राथमिकता पर किए जा रहे हैं। - धीरेंद्र खड़गटा, निगम आयुक्त
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अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। गर्मी में पानी की मांग बढ़ते ही ट्यूबवेल खराब होने पर लोगों को कई दिन तक पानी की परेशानी न झेलनी पड़े, इसके लिए नगर निगम नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी कर रहा है। इसके तहत ट्यूबवेल में री-बोरिंग की जरूरत सामने आने पर 24 से 48 घंटे के भीतर ड्रिलिंग का काम शुरू कराने की व्यवस्था बनाने पर जोर है। आपात स्थिति में सस्पेंस हेड से सीधे री-बोरिंग कराने का प्रावधान भी तैयार किया जा रहा है। इससे सामान्य वित्तीय प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम कर खराब जलस्रोत जल्द चालू कराने का प्रयास होगा।
फरीदाबाद में पानी की मांग करीब 450 एमएलडी है, जबकि उपलब्धता करीब 300 से 325 एमएलडी के बीच है। ऐसे में पहले से ही मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। इस स्थिति में किसी इलाके का ट्यूबवेल बंद होना वहां की जलापूर्ति व्यवस्था पर सीधा असर डालता है। खासकर गर्मी के दिनों में जब पानी की खपत बढ़ जाती है, तब लोगों को टैंकरों पर निर्भर होना पड़ता है।
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17 ग्राउंड ट्यूबवेल से भी मिलती है जलापूर्ति
शहर की जलापूर्ति में 22 रेनीवेल अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा 17 ग्राउंड ट्यूबवेल से भी पानी लिया जाता है। इन जलस्रोतों में मोटर खराब होने, बोर में तकनीकी दिक्कत आने या अन्य कारणों से पानी की आपूर्ति रुक जाती है। समस्या का समाधान समय पर नहीं होने पर संबंधित क्षेत्र में पानी की कमी और बढ़ जाती है। भविष्य में बढ़ती आबादी और पानी की जरूरत को देखते हुए नए रेनीवेल और ट्यूबवेल विकसित करने की योजनाओं पर भी काम किया जा रहा है। ऐसे में मौजूदा जलस्रोतों को चालू हालत में रखना भी उतना ही जरूरी है। अधिकारियों का मानना है कि नया स्रोत तैयार करने के साथ पुराने स्रोतों में खराबी आने पर उन्हें जल्द चालू कराने की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।
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स्रोत एफएमडीए के, घरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निगम की
फरीदाबाद में पानी की पूरी व्यवस्था नगर निगम के पास नहीं है। एफएमडीए प्रमुख जलस्रोतों और बड़ी जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़े हिस्से को संभालता है, जबकि नगर निगम की जिम्मेदारी वितरण नेटवर्क के माध्यम से पानी को लोगों के घरों तक पहुंचाने की है। रेनीवेल से मिलने वाली थोक जलापूर्ति को एफएमडीए की व्यवस्था के जरिये भूमिगत जल भंडारण टैंकों तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद नगर निगम के नेटवर्क से अलग-अलग इलाकों में पानी की आपूर्ति की जाती है।
यही वजह है कि जलस्रोत में खराबी आने पर दोनों विभागों के बीच तेजी से समन्वय होना जरूरी है। ट्यूबवेल बंद होने के बाद पहले तकनीकी जांच, फिर मरम्मत या री-बोरिंग का फैसला और इसके बाद मशीन व अन्य संसाधनों की व्यवस्था में समय लग जाता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य इसी प्रक्रिया को छोटा करना है।
एनआईटी से बल्लभगढ़ तक कई इलाकों में ज्यादा असर
ट्यूबवेल खराब होने का असर उन इलाकों में अधिक पड़ता है जहां वैकल्पिक जलस्रोत सीमित हैं। एनआईटी, डबुआ, पर्वतीय कॉलोनी, सैनिक कॉलोनी और बल्लभगढ़ के कई हिस्सों में गर्मी के दौरान पानी की मांग बढ़ने पर स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है। किसी स्थानीय स्रोत के बंद होने पर लोगों को पर्याप्त पानी के लिए टैंकरों का इंतजार करना पड़ता है। कई जगहों पर लोग निजी स्तर पर भी पानी की व्यवस्था करने को मजबूर होते हैं।
24 से 48 घंटे में काम शुरू हुआ तो घटेगी परेशानी
नई एसओपी में सबसे बड़ा बदलाव खराब ट्यूबवेल की मरम्मत प्रक्रिया को समयबद्ध करना है। अगर जांच में री-बोरिंग की जरूरत सामने आती है तो सामान्य प्रक्रिया में समय गंवाने के बजाय 24 से 48 घंटे के भीतर ड्रिलिंग शुरू कराने की व्यवस्था बनाने की तैयारी है। इसके लिए सस्पेंस हेड से आपात काम कराने का प्रावधान भी रखा जा सकता है। इससे जरूरत पड़ने पर तत्काल उपलब्ध स्वीकृत राशि से काम शुरू कराया जा सकेगा।
हालांकि यह व्यवस्था किस स्तर पर लागू होगी, किस अधिकारी को वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे और सस्पेंस हेड से कितनी राशि तक काम कराया जा सकेगा, इसकी अंतिम आधिकारिक प्रक्रिया अभी स्पष्ट नहीं है। व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए तकनीकी जांच, मशीन की उपलब्धता, पाइप और मोटर की व्यवस्था तथा बिजली कनेक्शन से जुड़े काम भी समानांतर रूप से पूरे करने होंगे।
लोगों की सुविधा के लिए नगर निगम कई स्तरों पर काम कर रहा है। जलनिकासी व पेयजल उपलब्ध करवाना वाले कार्य सबसे अधिक प्राथमिकता पर किए जा रहे हैं। - धीरेंद्र खड़गटा, निगम आयुक्त