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Faridabad News: जिस गांव की जमीन पर बसा एनआईटी, 66 साल बाद भी वहां के लोगों को रजिस्ट्री का इंतजार
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संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। आज जिस न्यू इंडस्ट्रियल टाउनशिप (एनआईटी) को हम फरीदाबाद की रीढ़ और एक चमकता हुआ औद्योगिक शहर मानते हैं, उसकी नींव में मनयारू गांव का बहुत बड़ा बलिदान छिपा है। 1949 में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को बसाने के लिए मनयारू गांव की करीब 6000 बीघा जमीन ली गई थी, जहां आज अरावली गोल्फ क्लब, नाहर सिंह स्टेडियम और नगर निगम मुख्यालय खड़े हैं। शहर तो आलीशान बस गया, लेकिन देश के विकास के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन कुर्बान करने वाला यह गांव आज 66 साल बाद भी अपने मालिकाना हक की भीख मांग रहा है।
1960 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने मनयारू के ग्रामीणों को उजाड़कर गौंछी के पास मॉडल विलेज प्रतापगढ़ नाम से नया ठिकाना दिया। सरकार ने बिजली, पानी और स्कूल तो दे दिए, लेकिन 75 घरों और 500 की आबादी वाले इस गांव को जमीन की रजिस्ट्री नहीं दी। नतीजा यह है कि तीन पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी यहां के लोग अपने ही घरों में अवैध होने का दंश झेल रहे हैं। न इन्हें बैंक से लोन मिल सकता है और न ही ये अपनी जरूरत पर मकान बेच सकते हैं।
2003 का जख्म आज भी दे रहा है डर
साल 2003 में प्रशासन ने इन्हें अवैध बताकर तोड़फोड़ का नोटिस थमा दिया था। हालांकि, अदालत ने ग्रामीणों के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन मालिकाना हक न मिलने के कारण आज भी हर परिवार के दिल में यह डर बैठा है कि कब प्रशासन का पीला पंजा उनके आशियाने को ढहा दे।
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अब मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से न्याय की उम्मीद
ग्रामीणों का सब्र अब टूट चुका है। सोमवार को एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के मीडिया समन्वयक मुकेश वशिष्ठ से मुलाकात कर अपनी व्यथा सुनाई। ग्रामीणों का कहना है कि वे नियमित रूप से प्रॉपर्टी टैक्स भर रहे हैं, फिर उनके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? अब केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर के माध्यम से इस मांग की फाइल मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी तक पहुंचाई जा रही है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सूबे के मुखिया उनके इस 66 साल पुराने दर्द का अंत करेंगे।
पीड़ितों की आवाज
हमारी जमीन पर पूरा एनआईटी शहर चमक रहा है और हम अपने ही घर की रजिस्ट्री को तरस रहे हैं। यह सिर्फ नाइंसाफी नहीं, हमारे त्याग का अपमान है। - सत्यवीर भारद्वाज व धर्म नंबरदार, ग्रामीण
फरीदाबाद। आज जिस न्यू इंडस्ट्रियल टाउनशिप (एनआईटी) को हम फरीदाबाद की रीढ़ और एक चमकता हुआ औद्योगिक शहर मानते हैं, उसकी नींव में मनयारू गांव का बहुत बड़ा बलिदान छिपा है। 1949 में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को बसाने के लिए मनयारू गांव की करीब 6000 बीघा जमीन ली गई थी, जहां आज अरावली गोल्फ क्लब, नाहर सिंह स्टेडियम और नगर निगम मुख्यालय खड़े हैं। शहर तो आलीशान बस गया, लेकिन देश के विकास के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन कुर्बान करने वाला यह गांव आज 66 साल बाद भी अपने मालिकाना हक की भीख मांग रहा है।
1960 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने मनयारू के ग्रामीणों को उजाड़कर गौंछी के पास मॉडल विलेज प्रतापगढ़ नाम से नया ठिकाना दिया। सरकार ने बिजली, पानी और स्कूल तो दे दिए, लेकिन 75 घरों और 500 की आबादी वाले इस गांव को जमीन की रजिस्ट्री नहीं दी। नतीजा यह है कि तीन पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी यहां के लोग अपने ही घरों में अवैध होने का दंश झेल रहे हैं। न इन्हें बैंक से लोन मिल सकता है और न ही ये अपनी जरूरत पर मकान बेच सकते हैं।
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2003 का जख्म आज भी दे रहा है डर
साल 2003 में प्रशासन ने इन्हें अवैध बताकर तोड़फोड़ का नोटिस थमा दिया था। हालांकि, अदालत ने ग्रामीणों के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन मालिकाना हक न मिलने के कारण आज भी हर परिवार के दिल में यह डर बैठा है कि कब प्रशासन का पीला पंजा उनके आशियाने को ढहा दे।
अब मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से न्याय की उम्मीद
ग्रामीणों का सब्र अब टूट चुका है। सोमवार को एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के मीडिया समन्वयक मुकेश वशिष्ठ से मुलाकात कर अपनी व्यथा सुनाई। ग्रामीणों का कहना है कि वे नियमित रूप से प्रॉपर्टी टैक्स भर रहे हैं, फिर उनके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? अब केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर के माध्यम से इस मांग की फाइल मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी तक पहुंचाई जा रही है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सूबे के मुखिया उनके इस 66 साल पुराने दर्द का अंत करेंगे।
पीड़ितों की आवाज
हमारी जमीन पर पूरा एनआईटी शहर चमक रहा है और हम अपने ही घर की रजिस्ट्री को तरस रहे हैं। यह सिर्फ नाइंसाफी नहीं, हमारे त्याग का अपमान है। - सत्यवीर भारद्वाज व धर्म नंबरदार, ग्रामीण