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मेला : विकसित भारत 2047 की राह मजबूत करेगा सूरजकुंड शिल्प मेला: अरविंद कुमार शर्मा
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50 से अधिक देशों की भागीदारी, बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दायरा
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड शिल्प मेले के मंच से हरियाणा के सहकारिता मंत्री डॉ. अरविंद कुमार शर्मा ने इसे केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि देश के शिल्पकारों की पहचान और आत्मनिर्भर भारत की ताकत बढ़ाने वाला वैश्विक मंच बताया। उन्होंने कहा कि यह मेला विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को जमीनी स्तर पर मजबूती देने का माध्यम बन रहा है क्योंकि यह ग्रामीण कारीगरों को सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार और दर्शकों से जोड़ता है।
मंत्री ने याद दिलाया कि सूरजकुंड शिल्प मेला 1987 में एक सीमित प्रयास के रूप में शुरू हुआ था लेकिन तीन दशकों में यह देश के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल हो चुका है। उनके अनुसार प्रधानमंत्री के विकसित भारत-2047 के संकल्प और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में मेले का स्वरूप लगातार भव्य होता जा रहा है। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतरराष्ट्रीय भागीदारी और पेशेवर प्रबंधन ने इसे स्थानीय मेले से वैश्विक उत्सव में बदल दिया है जिसका सीधा लाभ हरियाणा की अर्थव्यवस्था और स्थानीय कारीगरों को मिल रहा है। मंत्री ने बताया कि पिछले वर्ष 44 देशों के शिल्पकारों ने मेले में हिस्सा लिया था, जबकि इस बार यह संख्या 50 से अधिक हो गई है। उनके अनुसार, यह बढ़ोतरी केवल संख्या नहीं, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प और लोककला के प्रति वैश्विक भरोसे का संकेत है। मेले में विभिन्न देशों के कलाकारों और भारतीय कारीगरों के बीच संवाद, कार्यशालाएं और लाइव डिमॉन्स्ट्रेशन भी हो रहे हैं, जिससे पारंपरिक कला को नया बाजार और नई तकनीक मिल रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब ग्रामीण कारीगरों को सीधा खरीदार मिलता है, तो बिचौलियों पर निर्भरता घटती है और उनकी आय बढ़ती है। ऐसे में सूरजकुंड मेला सिर्फ संस्कृति नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम साबित हो रहा है।
पर्यटकों से खरीदारी की अपील, कारीगरों को सीधा लाभ
सहकारिता मंत्री ने मुख्यमंत्री की ओर से सभी आगंतुकों का आभार जताते हुए लोगों से अपील की कि वे मेले में घूमने के साथ-साथ खरीदारी भी करें। उन्होंने कहा कि एक छोटी-सी खरीद भी किसी कारीगर के परिवार की आजीविका को सहारा दे सकती है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि लोग शिल्पकारों से बातचीत करें उनकी कला के बारे में जानें और उनके साथ तस्वीरें लें। इससे कारीगरों का आत्मविश्वास बढ़ता है और अगली पीढ़ी भी पारंपरिक शिल्प से जुड़ने के लिए प्रेरित होती है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा सकारात्मक असर
मेले से जुड़े कारोबारियों और दुकानदारों का कहना है कि हर साल बढ़ती भीड़ से होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, फूड स्टॉल और स्थानीय बाजारों को सीधा फायदा होता है। आसपास के गांवों के कारीगरों को भी अस्थायी रोजगार मिलता है। ऐसे में सूरजकुंड शिल्प मेला केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जिले की अर्थव्यवस्था को गति देने वाला महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बन चुका है।
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अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड शिल्प मेले के मंच से हरियाणा के सहकारिता मंत्री डॉ. अरविंद कुमार शर्मा ने इसे केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि देश के शिल्पकारों की पहचान और आत्मनिर्भर भारत की ताकत बढ़ाने वाला वैश्विक मंच बताया। उन्होंने कहा कि यह मेला विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को जमीनी स्तर पर मजबूती देने का माध्यम बन रहा है क्योंकि यह ग्रामीण कारीगरों को सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार और दर्शकों से जोड़ता है।
मंत्री ने याद दिलाया कि सूरजकुंड शिल्प मेला 1987 में एक सीमित प्रयास के रूप में शुरू हुआ था लेकिन तीन दशकों में यह देश के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल हो चुका है। उनके अनुसार प्रधानमंत्री के विकसित भारत-2047 के संकल्प और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में मेले का स्वरूप लगातार भव्य होता जा रहा है। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतरराष्ट्रीय भागीदारी और पेशेवर प्रबंधन ने इसे स्थानीय मेले से वैश्विक उत्सव में बदल दिया है जिसका सीधा लाभ हरियाणा की अर्थव्यवस्था और स्थानीय कारीगरों को मिल रहा है। मंत्री ने बताया कि पिछले वर्ष 44 देशों के शिल्पकारों ने मेले में हिस्सा लिया था, जबकि इस बार यह संख्या 50 से अधिक हो गई है। उनके अनुसार, यह बढ़ोतरी केवल संख्या नहीं, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प और लोककला के प्रति वैश्विक भरोसे का संकेत है। मेले में विभिन्न देशों के कलाकारों और भारतीय कारीगरों के बीच संवाद, कार्यशालाएं और लाइव डिमॉन्स्ट्रेशन भी हो रहे हैं, जिससे पारंपरिक कला को नया बाजार और नई तकनीक मिल रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब ग्रामीण कारीगरों को सीधा खरीदार मिलता है, तो बिचौलियों पर निर्भरता घटती है और उनकी आय बढ़ती है। ऐसे में सूरजकुंड मेला सिर्फ संस्कृति नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम साबित हो रहा है।
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पर्यटकों से खरीदारी की अपील, कारीगरों को सीधा लाभ
सहकारिता मंत्री ने मुख्यमंत्री की ओर से सभी आगंतुकों का आभार जताते हुए लोगों से अपील की कि वे मेले में घूमने के साथ-साथ खरीदारी भी करें। उन्होंने कहा कि एक छोटी-सी खरीद भी किसी कारीगर के परिवार की आजीविका को सहारा दे सकती है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि लोग शिल्पकारों से बातचीत करें उनकी कला के बारे में जानें और उनके साथ तस्वीरें लें। इससे कारीगरों का आत्मविश्वास बढ़ता है और अगली पीढ़ी भी पारंपरिक शिल्प से जुड़ने के लिए प्रेरित होती है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा सकारात्मक असर
मेले से जुड़े कारोबारियों और दुकानदारों का कहना है कि हर साल बढ़ती भीड़ से होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, फूड स्टॉल और स्थानीय बाजारों को सीधा फायदा होता है। आसपास के गांवों के कारीगरों को भी अस्थायी रोजगार मिलता है। ऐसे में सूरजकुंड शिल्प मेला केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जिले की अर्थव्यवस्था को गति देने वाला महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बन चुका है।