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Faridabad News: जीरो वेस्ट योजना अधूरी...कचरा संकट बरकरार, सुधार की योजना को नहीं मिल रही रफ्तार
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बंधवाड़ी पर निर्भरता घटाने की योजना कागजों से नहीं आ पा रही बाहर, पांच सेक्टरों में स्थानीय स्तर पर कचरा निस्तारण की थी तैयारी
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। शहर से प्रतिदिन निकलने वाले करीब एक हजार टन कचरे के प्रबंधन और बंधवाड़ी डंपिंग साइट पर निर्भरता कम करने के लिए नगर निगम ने पिछले वर्ष पांच सेक्टरों में जीरो वेस्ट मॉडल लागू करने की योजना बनाई थी। इस योजना का उद्देश्य कचरे का अधिकतम निस्तारण उसके स्रोत के नजदीक ही करना था ताकि डंपिंग साइटों पर दबाव कम हो सके। हालांकि करीब एक वर्ष बीतने के बाद भी यह मॉडल पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर सका है। नगर निगम और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (आरडब्ल्यूए) के बीच कई दौर की चर्चा होने के बावजूद प्रस्तावित व्यवस्था अभी शुरुआती चरण से आगे नहीं बढ़ पाई है।
फरीदाबाद में कचरा प्रबंधन लंबे समय से बड़ी शहरी चुनौतियों में शामिल रहा है। शहर का अधिकांश कचरा वर्षों से बंधवाड़ी डंपिंग साइट पर भेजा जाता रहा है। बंधवाड़ी में कचरे के बढ़ते दबाव और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच नगर निगम ने स्थानीय स्तर पर कचरा निस्तारण को बढ़ावा देने के लिए यह योजना तैयार की थी। उम्मीद थी कि पांच सेक्टरों में सफलता मिलने के बाद इसे शहर के अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा।
कई मुद्दों पर अंतिम सहमति नहीं बनी
योजना के तहत चयनित सेक्टरों में घर-घर से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र किया जाना था। गीले कचरे से खाद और बायोगैस तैयार करने तथा सूखे कचरे को पुनर्चक्रण के लिए अलग करने की व्यवस्था प्रस्तावित थी। इसके अलावा पार्कों और हरित क्षेत्रों से निकलने वाले बागवानी कचरे का भी स्थानीय स्तर पर निस्तारण किया जाना था। हालांकि योजना को लागू करने के लिए आवश्यक भूमि, उपकरण, वित्तीय सहायता और संचालन व्यवस्था जैसे कई मुद्दों पर अभी तक अंतिम सहमति नहीं बन सकी है। यही कारण है कि प्रस्तावित मॉडल अब तक पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया है।
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जमीन और संसाधनों की चुनौती
आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर कचरा निस्तारण की व्यवस्था शुरू करने के लिए पर्याप्त जगह और संसाधनों की जरूरत है। उनका कहना है कि कचरे के निस्तारण के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराना सबसे बड़ी जरूरत है। बिना जगह के इस तरह की व्यवस्था को शुरू करना संभव नहीं होगा। नगर निगम और आरडब्ल्यूए के बीच कई बैठकों में इस मुद्दे पर चर्चा हुई है लेकिन अभी तक कोई ऐसा मॉडल सामने नहीं आ पाया है जिस पर सभी पक्ष सहमत हों। इसी कारण योजना की रफ्तार धीमी बनी हुई है।
छोटे स्तर पर शुरू हुए प्रयोग
हालांकि प्रस्तावित पायलट मॉडल अभी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है लेकिन नगर निगम ने शहर की करीब 22 आरडब्ल्यूए के साथ छोटे स्तर पर कचरा पृथक्करण और निस्तारण का काम शुरू किया है। कुछ सेक्टरों में घरों से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग इकट्ठा किया जा रहा है। वहीं जैविक कचरे से खाद बनाने और पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग करने की कोशिशें भी चल रही हैं। निगम अधिकारियों का कहना है कि इन प्रयोगों के अनुभव के आधार पर आगे योजना का दायरा बढ़ाया जाएगा। हालांकि फिलहाल यह पहल शहर में निकलने वाले कुल कचरे की तुलना में सीमित स्तर पर ही है।
निगम ने गिनाए आगे के कदम
नगर निगम का कहना है कि शहर में कचरे के निस्तारण की क्षमता बढ़ाने के लिए 1300 टन प्रतिदिन से अधिक क्षमता वाले तीन प्लांट लगाने की प्रक्रिया चल रही है। इसके लिए निविदा प्रक्रिया जारी है। अधिकारियों का दावा है कि इन प्लांटों के शुरू होने के बाद कचरा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूती मिलेगी और बंधवाड़ी पर निर्भरता कम होगी। इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नई गाइडलाइन के अनुसार बल्क वेस्ट जनरेटरों का सर्वे कराया जाएगा। इसके तहत बड़े संस्थानों, अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अन्य इकाइयों से निकलने वाले कचरे का आकलन किया जाएगा। यह भी देखा जाएगा कि वे अपने कचरे का निस्तारण कैसे कर रहे हैं। सर्वे के बाद संबंधित संस्थानों को नियमों के पालन के लिए नोटिस और निर्देश जारी किए जाएंगे।
वैकल्पिक परियोजनाओं के सामने भी चुनौतियां
कचरा निस्तारण के दूसरे विकल्पों को भी अभी तक पूरी सफलता नहीं मिल सकी है। प्रतापगढ़ में कचरा प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियों का स्थानीय लोग समय-समय पर विरोध करते रहे हैं। वहीं मोटूका में कचरे से चारकोल बनाने की प्रस्तावित परियोजना भी अभी आगे नहीं बढ़ पाई है। ऐसे में शहर के सामने कचरा निस्तारण की चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी और लगातार बढ़ रहे कचरे को देखते हुए केवल डंपिंग साइटों के भरोसे समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण और स्थानीय स्तर पर निस्तारण व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
प्रशासन, आरडब्ल्यूए और नागरिकों में बेहतर तालमेल जरूरी
फरीदाबाद की आबादी और शहरी क्षेत्र दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके साथ कचरे की मात्रा में भी लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में कचरा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक सक्षम और टिकाऊ बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। जीरो वेस्ट मॉडल को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशासन, आरडब्ल्यूए और नागरिकों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा।
आंकड़ों में कचरा प्रबंधन की तस्वीर
फरीदाबाद से प्रतिदिन करीब एक हजार टन ठोस कचरा निकलता है। इसी कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण और बंधवाड़ी पर निर्भरता कम करने के लिए पांच सेक्टरों में जीरो वेस्ट मॉडल लागू करने की योजना बनाई गई थी। नगर निगम शहर की करीब 22 आरडब्ल्यूए के साथ छोटे स्तर पर कचरा पृथक्करण और निस्तारण की गतिविधियां शुरू कर चुका है। वहीं 100 किलोग्राम या उससे अधिक कचरा प्रतिदिन उत्पन्न करने वाले संस्थानों को भी अपने स्तर पर कचरा प्रबंधन व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
ऐसे काम करना था जीरो वेस्ट मॉडल
योजना के तहत घरों से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र किया जाना था। गीले कचरे को बायोगैस अथवा अन्य जैविक प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुंचाकर उसका निस्तारण किया जाना था, जबकि प्लास्टिक, गत्ता, बोतल और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग कर दोबारा उपयोग की प्रक्रिया में शामिल किया जाना था। बागवानी से निकलने वाले कचरे से खाद तैयार करने की भी व्यवस्था प्रस्तावित थी। इससे डंपिंग साइटों पर भेजे जाने वाले कचरे की मात्रा में कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था।
बल्क वेस्ट जनरेटरों का सर्वे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नई गाइडलाइन के अनुसार कराया जाएगा। इसके साथ ही कचरा निस्तारण के लिए तीन नए प्लांट लगाने की प्रक्रिया भी चल रही है।
-मनदीप, कार्यकारी अभियंता, स्वच्छ भारत मिशन
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अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। शहर से प्रतिदिन निकलने वाले करीब एक हजार टन कचरे के प्रबंधन और बंधवाड़ी डंपिंग साइट पर निर्भरता कम करने के लिए नगर निगम ने पिछले वर्ष पांच सेक्टरों में जीरो वेस्ट मॉडल लागू करने की योजना बनाई थी। इस योजना का उद्देश्य कचरे का अधिकतम निस्तारण उसके स्रोत के नजदीक ही करना था ताकि डंपिंग साइटों पर दबाव कम हो सके। हालांकि करीब एक वर्ष बीतने के बाद भी यह मॉडल पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर सका है। नगर निगम और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (आरडब्ल्यूए) के बीच कई दौर की चर्चा होने के बावजूद प्रस्तावित व्यवस्था अभी शुरुआती चरण से आगे नहीं बढ़ पाई है।
फरीदाबाद में कचरा प्रबंधन लंबे समय से बड़ी शहरी चुनौतियों में शामिल रहा है। शहर का अधिकांश कचरा वर्षों से बंधवाड़ी डंपिंग साइट पर भेजा जाता रहा है। बंधवाड़ी में कचरे के बढ़ते दबाव और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच नगर निगम ने स्थानीय स्तर पर कचरा निस्तारण को बढ़ावा देने के लिए यह योजना तैयार की थी। उम्मीद थी कि पांच सेक्टरों में सफलता मिलने के बाद इसे शहर के अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा।
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कई मुद्दों पर अंतिम सहमति नहीं बनी
योजना के तहत चयनित सेक्टरों में घर-घर से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र किया जाना था। गीले कचरे से खाद और बायोगैस तैयार करने तथा सूखे कचरे को पुनर्चक्रण के लिए अलग करने की व्यवस्था प्रस्तावित थी। इसके अलावा पार्कों और हरित क्षेत्रों से निकलने वाले बागवानी कचरे का भी स्थानीय स्तर पर निस्तारण किया जाना था। हालांकि योजना को लागू करने के लिए आवश्यक भूमि, उपकरण, वित्तीय सहायता और संचालन व्यवस्था जैसे कई मुद्दों पर अभी तक अंतिम सहमति नहीं बन सकी है। यही कारण है कि प्रस्तावित मॉडल अब तक पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया है।
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जमीन और संसाधनों की चुनौती
आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर कचरा निस्तारण की व्यवस्था शुरू करने के लिए पर्याप्त जगह और संसाधनों की जरूरत है। उनका कहना है कि कचरे के निस्तारण के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराना सबसे बड़ी जरूरत है। बिना जगह के इस तरह की व्यवस्था को शुरू करना संभव नहीं होगा। नगर निगम और आरडब्ल्यूए के बीच कई बैठकों में इस मुद्दे पर चर्चा हुई है लेकिन अभी तक कोई ऐसा मॉडल सामने नहीं आ पाया है जिस पर सभी पक्ष सहमत हों। इसी कारण योजना की रफ्तार धीमी बनी हुई है।
छोटे स्तर पर शुरू हुए प्रयोग
हालांकि प्रस्तावित पायलट मॉडल अभी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है लेकिन नगर निगम ने शहर की करीब 22 आरडब्ल्यूए के साथ छोटे स्तर पर कचरा पृथक्करण और निस्तारण का काम शुरू किया है। कुछ सेक्टरों में घरों से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग इकट्ठा किया जा रहा है। वहीं जैविक कचरे से खाद बनाने और पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग करने की कोशिशें भी चल रही हैं। निगम अधिकारियों का कहना है कि इन प्रयोगों के अनुभव के आधार पर आगे योजना का दायरा बढ़ाया जाएगा। हालांकि फिलहाल यह पहल शहर में निकलने वाले कुल कचरे की तुलना में सीमित स्तर पर ही है।
निगम ने गिनाए आगे के कदम
नगर निगम का कहना है कि शहर में कचरे के निस्तारण की क्षमता बढ़ाने के लिए 1300 टन प्रतिदिन से अधिक क्षमता वाले तीन प्लांट लगाने की प्रक्रिया चल रही है। इसके लिए निविदा प्रक्रिया जारी है। अधिकारियों का दावा है कि इन प्लांटों के शुरू होने के बाद कचरा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूती मिलेगी और बंधवाड़ी पर निर्भरता कम होगी। इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नई गाइडलाइन के अनुसार बल्क वेस्ट जनरेटरों का सर्वे कराया जाएगा। इसके तहत बड़े संस्थानों, अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अन्य इकाइयों से निकलने वाले कचरे का आकलन किया जाएगा। यह भी देखा जाएगा कि वे अपने कचरे का निस्तारण कैसे कर रहे हैं। सर्वे के बाद संबंधित संस्थानों को नियमों के पालन के लिए नोटिस और निर्देश जारी किए जाएंगे।
वैकल्पिक परियोजनाओं के सामने भी चुनौतियां
कचरा निस्तारण के दूसरे विकल्पों को भी अभी तक पूरी सफलता नहीं मिल सकी है। प्रतापगढ़ में कचरा प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियों का स्थानीय लोग समय-समय पर विरोध करते रहे हैं। वहीं मोटूका में कचरे से चारकोल बनाने की प्रस्तावित परियोजना भी अभी आगे नहीं बढ़ पाई है। ऐसे में शहर के सामने कचरा निस्तारण की चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी और लगातार बढ़ रहे कचरे को देखते हुए केवल डंपिंग साइटों के भरोसे समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण और स्थानीय स्तर पर निस्तारण व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
प्रशासन, आरडब्ल्यूए और नागरिकों में बेहतर तालमेल जरूरी
फरीदाबाद की आबादी और शहरी क्षेत्र दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके साथ कचरे की मात्रा में भी लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में कचरा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक सक्षम और टिकाऊ बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। जीरो वेस्ट मॉडल को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशासन, आरडब्ल्यूए और नागरिकों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा।
आंकड़ों में कचरा प्रबंधन की तस्वीर
फरीदाबाद से प्रतिदिन करीब एक हजार टन ठोस कचरा निकलता है। इसी कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण और बंधवाड़ी पर निर्भरता कम करने के लिए पांच सेक्टरों में जीरो वेस्ट मॉडल लागू करने की योजना बनाई गई थी। नगर निगम शहर की करीब 22 आरडब्ल्यूए के साथ छोटे स्तर पर कचरा पृथक्करण और निस्तारण की गतिविधियां शुरू कर चुका है। वहीं 100 किलोग्राम या उससे अधिक कचरा प्रतिदिन उत्पन्न करने वाले संस्थानों को भी अपने स्तर पर कचरा प्रबंधन व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
ऐसे काम करना था जीरो वेस्ट मॉडल
योजना के तहत घरों से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र किया जाना था। गीले कचरे को बायोगैस अथवा अन्य जैविक प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुंचाकर उसका निस्तारण किया जाना था, जबकि प्लास्टिक, गत्ता, बोतल और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग कर दोबारा उपयोग की प्रक्रिया में शामिल किया जाना था। बागवानी से निकलने वाले कचरे से खाद तैयार करने की भी व्यवस्था प्रस्तावित थी। इससे डंपिंग साइटों पर भेजे जाने वाले कचरे की मात्रा में कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था।
बल्क वेस्ट जनरेटरों का सर्वे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नई गाइडलाइन के अनुसार कराया जाएगा। इसके साथ ही कचरा निस्तारण के लिए तीन नए प्लांट लगाने की प्रक्रिया भी चल रही है।
-मनदीप, कार्यकारी अभियंता, स्वच्छ भारत मिशन