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Forest fire Uttarakhand: ऊंचे हिमालय तक पहुंची जंगल की आग, नंदादेवी जैसे संरक्षित क्षेत्र भी चपेट में

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली/देहरादून Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 26 Jan 2026 06:45 AM IST
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सार

आमतौर पर समुद्र तल से 2,000 मीटर तक सीमित रहने वाली वनाग्नि इस बार आश्चर्यजनक रूप से 3,000 मीटर से ऊपर पहुंच गई। 

Forest fire in Uttarakhand: Forest fire reaches the high Himalayas
उत्तराखंड में जंगल की आग - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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उत्तराखंड में जंगल की आग को लेकर अब तक जो धारणा बनी रही थी, वह इस सर्दी में टूटती नजर आई है। आमतौर पर समुद्र तल से 2,000 मीटर तक सीमित रहने वाली वनाग्नि इस बार आश्चर्यजनक रूप से 3,000 मीटर से ऊपर पहुंच गई। 

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चमोली जिले में स्थित नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान, जिसे उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी का सबसे संवेदनशील और संरक्षित क्षेत्र माना जाता है, जनवरी में आग की चपेट में आ गया। यह केवल एक असामान्य घटना ही नहीं, बल्कि बदलते जलवायु पैटर्न, सूखे मौसम और हिमालयी तंत्र पर मंडराते नए खतरों का संकेत भी है।
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हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी के बेसकैंप घांघरिया से करीब 23 किलोमीटर पैदल और लगभग 7 किलोमीटर हवाई दूरी पर स्थित गोविंदघाट रेंज में, समुद्र तल से करीब 3,500 मीटर की ऊंचाई पर नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर जंगल में आग लगना वन विभाग के लिए भी अप्रत्याशित था। यह इलाका न केवल अत्यधिक दुर्गम है, बल्कि आम तौर पर सर्दियों में बर्फ और नमी से ढका रहता है। 

डाउन टू अर्थ  की रिपोर्ट के अनुसार बद्रीनाथ वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी सर्वेश दुबे को जब 9 जनवरी को इस आग की सूचना मिली तो वे स्वयं हैरान रह गए। उनके अनुसार पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में आग की कोई घटना दर्ज नहीं हुई थी। हवाई सर्वेक्षण में सामने आया कि आग जिस इलाके में लगी थी, वहां 70 से 80 डिग्री तक की खड़ी चट्टानी ढलान है, जहां पहुंचना बेहद जोखिम भरा है।

दुर्गम क्षेत्रों में आग बुझाने में कठिनाई
समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर की ऊंचाई पर और नदी तल से करीब 1,500 मीटर ऊपर स्थित इस क्षेत्र में जंगल करीब छह दिनों तक धधकते रहे। आग पर काबू पाने के लिए भेजे गए दो वन विभागीय दल विषम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बार-बार लौटने को मजबूर हुए। 9 जनवरी को ही खड़ी ढलान, चट्टानों से पत्थर गिरने के खतरे और असुरक्षित रास्तों के कारण टीम को वापस बुलाना पड़ा। 

अगले दिन लक्ष्मण गंगा नदी पर अस्थायी पुल बनाकर टीम भ्यूंडार वन बीट तक पहुंची। 11 जनवरी को एक दल जमे हुए झरने के पास पहुंचा, जबकि दूसरे दल ने ड्रोन के जरिए स्थिति का आकलन किया। 13 जनवरी को पुलना गांव की महिला मंगल दल और ग्रामीणों के सहयोग से वन विभाग के कर्मचारी भ्यूंडार-द्वितीय वन बीट में दाखिल तो हुए, लेकिन अत्यंत कठिन परिस्थितियों के कारण उन्हें फिर लौटना पड़ा। 

पहली बार ऊपरी हिमालय से शुरू हुई आग....
चमोली के पीपलकोटी क्षेत्र में ग्रामीण विकास और आजीविका से जुड़े कार्य कर रहे जेपी मैठाणी इस घटना को हिमालयी वनों के लिए एक नई और गंभीर चेतावनी मानते हैं। उनके अनुसार यह पहली बार है जब जंगल की आग निचले इलाकों के बजाय सीधे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में शुरू हुई है। पहले आग नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती थी, लेकिन इस बार तस्वीर उलट गई।

मैठाणी बताते हैं कि सर्दियों में बारिश और बर्फबारी न होने से जंगलों में नमी पूरी तरह खत्म हो चुकी है। छोटे-बड़े गाड-गदेरे सूख गए हैं, जबकि आमतौर पर इन्हीं में मौजूद पानी आग को आगे बढ़ने से रोकता था। इसके साथ ही दोपहर की तेज धूप और लगातार सूखा मौसम आग के फैलाव के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना रहे हैं।

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