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बढ़ती उम्र की चुनौतियों से निपटने में मददगार है जेरियाट्रिक केयर : विशेषज्ञ
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
देश में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने देश में समावेशी और बेहतर जेरियाट्रिक केयर सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों ने कहा कि डिमेंशिया, अल्जाइमर और अन्य उम्र से जुड़ी बीमारियों से निपटने के लिए बुजुर्गों के अनुकूल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना समय की मांग है। मंगलवार को राजधानी में आयोजित इलनेस टू वेलनेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने कहा कि कई सीनियर सिटीजन्स को तकनीक अपनाने में दिक्कत होती है। साथ ही, उनके लिए सार्वजनिक स्थान, परिवहन और आपातकालीन सेवाएं अभी भी पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। इससे उनकी सुरक्षा और स्वतंत्र जीवन प्रभावित होता है।
कार्यक्रम में बोलते हुए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव राजेश भूषण ने कहा कि जेरियाट्रिक केयर को सार्वजनिक स्वास्थ्य की मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बुजुर्गों की देखभाल केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि घर और जिला स्तर तक इसे मजबूत किया जाना जरूरी है। फाउंडेशन की सलाहकार परिषद के चेयरपर्सन अनिल राजपूत ने केंद्रीय बजट की सराहना करते हुए कहा कि जेरियाट्रिक और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर दिया गया जोर सही समय पर उठाया गया कदम है। उन्होंने कहा कि लंबी उम्र तभी मायने रखती है, जब वह सम्मान और अच्छे स्वास्थ्य के साथ जी जा सके।
एम्स के पूर्व वरिष्ठ डॉक्टर डॉ. एबी डे ने कहा कि जेरियाट्रिक मेडिसिन अब तेजी से मुख्यधारा की चिकित्सा बन रही है, लेकिन प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती है। दिल्ली सरकार के इहबास के निदेशक डॉ. राजिंदर के धामिजा ने कहा कि बुजुर्गों की देखभाल समन्वित, निरंतर और समुदाय आधारित होनी चाहिए, ताकि वे सक्रिय और गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। कॉन्फ्रेंस में स्वस्थ बुढ़ापे के लिए समय पर जांच, मानसिक स्वास्थ्य, पोषण, योग और नई तकनीक के उपयोग पर भी चर्चा की गई।
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नई दिल्ली।
देश में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने देश में समावेशी और बेहतर जेरियाट्रिक केयर सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों ने कहा कि डिमेंशिया, अल्जाइमर और अन्य उम्र से जुड़ी बीमारियों से निपटने के लिए बुजुर्गों के अनुकूल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना समय की मांग है। मंगलवार को राजधानी में आयोजित इलनेस टू वेलनेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने कहा कि कई सीनियर सिटीजन्स को तकनीक अपनाने में दिक्कत होती है। साथ ही, उनके लिए सार्वजनिक स्थान, परिवहन और आपातकालीन सेवाएं अभी भी पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। इससे उनकी सुरक्षा और स्वतंत्र जीवन प्रभावित होता है।
कार्यक्रम में बोलते हुए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव राजेश भूषण ने कहा कि जेरियाट्रिक केयर को सार्वजनिक स्वास्थ्य की मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बुजुर्गों की देखभाल केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि घर और जिला स्तर तक इसे मजबूत किया जाना जरूरी है। फाउंडेशन की सलाहकार परिषद के चेयरपर्सन अनिल राजपूत ने केंद्रीय बजट की सराहना करते हुए कहा कि जेरियाट्रिक और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर दिया गया जोर सही समय पर उठाया गया कदम है। उन्होंने कहा कि लंबी उम्र तभी मायने रखती है, जब वह सम्मान और अच्छे स्वास्थ्य के साथ जी जा सके।
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एम्स के पूर्व वरिष्ठ डॉक्टर डॉ. एबी डे ने कहा कि जेरियाट्रिक मेडिसिन अब तेजी से मुख्यधारा की चिकित्सा बन रही है, लेकिन प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती है। दिल्ली सरकार के इहबास के निदेशक डॉ. राजिंदर के धामिजा ने कहा कि बुजुर्गों की देखभाल समन्वित, निरंतर और समुदाय आधारित होनी चाहिए, ताकि वे सक्रिय और गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। कॉन्फ्रेंस में स्वस्थ बुढ़ापे के लिए समय पर जांच, मानसिक स्वास्थ्य, पोषण, योग और नई तकनीक के उपयोग पर भी चर्चा की गई।
