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Delhi NCR News: इन-चैंबर मीडिएशन पर हाईकोर्ट ने जनहित याचिका किया निस्तारण
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-याचिकाकर्ता को जजों की आंतरिक समिति के समक्ष जाने का दिया निर्देश
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के जजों द्वारा अपने चैंबर में अनौपचारिक रूप से मीडिएशन कराने की प्रथा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका का निपटारा किया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस मुद्दे पर जजों की आंतरिक समिति के समक्ष जाने का निर्देश दिया। एडवोकेट प्रीति सिंह द्वारा दायर की गई इस पीआईएल में कहा गया था कि फैमिली कोर्ट के जज जब पक्षकारों के साथ अपने चैंबर में अनौपचारिक मीडिएशन या सुलह की चर्चा करते हैं और यदि वह असफल हो जाती है, तो उसी जज द्वारा मामले की मेरिट पर फैसला सुनाया जाना निष्पक्ष न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
याचिका में तर्क दिया गया कि इससे पक्षकारों के मन में उचित पूर्वाग्रह की आशंका उत्पन्न होती है और मीडिएशन तथा न्यायिक प्रक्रिया के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है। याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 का हवाला देते हुए कहा कि हालांकि कानून परिवारिक विवादों में मीडिएशन को प्रोत्साहित करता है, लेकिन जज की सुलहकारी भूमिका और न्यायिक भूमिका को स्पष्ट रूप से अलग रखना आवश्यक है। मीडिएशन के दौरान जज के पास गोपनीय जानकारियां आती हैं, जो बाद में मामले के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (मुख्य न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया) ने याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे एक संस्थागत और प्रशासनिक मुद्दा माना। बेंच ने फैमिली कोर्ट मामलों से संबंधित जजों की समिति को इस चिंता का गहन परीक्षण करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पीआईएल का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को आंतरिक प्रशासनिक सुधार के लिए समिति के समक्ष अपना मामला रखने को कहा।
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नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के जजों द्वारा अपने चैंबर में अनौपचारिक रूप से मीडिएशन कराने की प्रथा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका का निपटारा किया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस मुद्दे पर जजों की आंतरिक समिति के समक्ष जाने का निर्देश दिया। एडवोकेट प्रीति सिंह द्वारा दायर की गई इस पीआईएल में कहा गया था कि फैमिली कोर्ट के जज जब पक्षकारों के साथ अपने चैंबर में अनौपचारिक मीडिएशन या सुलह की चर्चा करते हैं और यदि वह असफल हो जाती है, तो उसी जज द्वारा मामले की मेरिट पर फैसला सुनाया जाना निष्पक्ष न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
याचिका में तर्क दिया गया कि इससे पक्षकारों के मन में उचित पूर्वाग्रह की आशंका उत्पन्न होती है और मीडिएशन तथा न्यायिक प्रक्रिया के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है। याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 का हवाला देते हुए कहा कि हालांकि कानून परिवारिक विवादों में मीडिएशन को प्रोत्साहित करता है, लेकिन जज की सुलहकारी भूमिका और न्यायिक भूमिका को स्पष्ट रूप से अलग रखना आवश्यक है। मीडिएशन के दौरान जज के पास गोपनीय जानकारियां आती हैं, जो बाद में मामले के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (मुख्य न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया) ने याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे एक संस्थागत और प्रशासनिक मुद्दा माना। बेंच ने फैमिली कोर्ट मामलों से संबंधित जजों की समिति को इस चिंता का गहन परीक्षण करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पीआईएल का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को आंतरिक प्रशासनिक सुधार के लिए समिति के समक्ष अपना मामला रखने को कहा।
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