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भारत की पहचान विविधता में, दूसरी परंपराओं के सम्मान से ही संस्कृति सुरक्षित : प्रो. आशीष त्रिपाठी
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नई दिल्ली। भारत की सांस्कृतिक बहुलता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब समाज अपनी परंपराओं के साथ दूसरी परंपराओं के संरक्षण और सम्मान की भी चिंता करे। यह विचार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. आशीष त्रिपाठी ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में आयोजित डॉ. नामवर सिंह स्मृति व्याख्यान में व्यक्त किए।
सांस्कृतिक बहुलतावाद और दूसरी परंपरा विषय पर बोलते हुए प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि भारत को अनेक परंपराओं के सह-अस्तित्व से समझना चाहिए। विविधता में एकता पर जोर देते हुए अक्सर एकता पर ज्यादा ध्यान दे देते हैं, जबकि विविधता ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने नामवर सिंह के दूसरी परंपरा की खोज विचार की व्याख्या करते हुए कहा कि यहां दूसरी का अर्थ अन्य है जो मुख्यधारा से बाहर दिखती हैं, लेकिन सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। लोक परंपराओं और उपेक्षित धरोहरों को समान महत्व दिए बिना बहुलता की रक्षा संभव नहीं है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। इस अवसर पर नामवर सिंह के लेखों पर आधारित पुस्तक मेरे बिसरे बिखरे शब्द का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और शिक्षा जगत के विद्वानों, शोधार्थियों व छात्रों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। संवाद
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सांस्कृतिक बहुलतावाद और दूसरी परंपरा विषय पर बोलते हुए प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि भारत को अनेक परंपराओं के सह-अस्तित्व से समझना चाहिए। विविधता में एकता पर जोर देते हुए अक्सर एकता पर ज्यादा ध्यान दे देते हैं, जबकि विविधता ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने नामवर सिंह के दूसरी परंपरा की खोज विचार की व्याख्या करते हुए कहा कि यहां दूसरी का अर्थ अन्य है जो मुख्यधारा से बाहर दिखती हैं, लेकिन सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। लोक परंपराओं और उपेक्षित धरोहरों को समान महत्व दिए बिना बहुलता की रक्षा संभव नहीं है।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। इस अवसर पर नामवर सिंह के लेखों पर आधारित पुस्तक मेरे बिसरे बिखरे शब्द का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और शिक्षा जगत के विद्वानों, शोधार्थियों व छात्रों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। संवाद
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