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Delhi NCR News: गर्भावस्था में मूड स्विंग नहीं, बाइपोलर डिसऑर्डर का संकेत
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नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में मूड स्विंग होना सामान्य माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कई बार यह गंभीर मानसिक बीमारी बाइपोलर डिसऑर्डर का संकेत भी हो सकता है। हार्मोनल बदलाव के कारण डिप्रेशन और मेनिया (अत्यधिक उत्साह) के बीच तेजी से बदलाव देखने को मिलता है, जो न केवल मां बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी जोखिम पैदा कर सकता है।
मानव व्यवहार एवं संबद्ध संस्थान के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश ने बताया कि प्रेग्नेंसी के दौरान यदि महिला लंबे समय तक उदासी, निराशा, चिड़चिड़ापन, नींद में कमी, अत्यधिक ऊर्जा या व्यवहार में असामान्य बदलाव महसूस कर रही है, तो इसे सामान्य मूड स्विंग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान और उचित इलाज न मिलने पर यह समस्या प्रसव के बाद और गंभीर रूप ले सकती है, जिसे पोस्टपार्टम मानसिक विकारों से भी जोड़ा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रसित गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव, कम वजन के बच्चे का जन्म, और मां के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, गंभीर मामलों में मां की निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे गर्भावस्था के दौरान जरूरी देखभाल में कमी आ सकती है।
डॉ. ओम प्रकाश ने बताया कि इस स्थिति से निपटने के लिए नियमित प्रसव पूर्व जांच के साथ मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी भी जरूरी है। काउंसलिंग, चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक दवाइयों के माध्यम से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि परिवार का सहयोग और भावनात्मक समर्थन भी मरीज के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संवाद
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मानव व्यवहार एवं संबद्ध संस्थान के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश ने बताया कि प्रेग्नेंसी के दौरान यदि महिला लंबे समय तक उदासी, निराशा, चिड़चिड़ापन, नींद में कमी, अत्यधिक ऊर्जा या व्यवहार में असामान्य बदलाव महसूस कर रही है, तो इसे सामान्य मूड स्विंग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान और उचित इलाज न मिलने पर यह समस्या प्रसव के बाद और गंभीर रूप ले सकती है, जिसे पोस्टपार्टम मानसिक विकारों से भी जोड़ा जाता है।
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विशेषज्ञों के अनुसार, बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रसित गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव, कम वजन के बच्चे का जन्म, और मां के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, गंभीर मामलों में मां की निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे गर्भावस्था के दौरान जरूरी देखभाल में कमी आ सकती है।
डॉ. ओम प्रकाश ने बताया कि इस स्थिति से निपटने के लिए नियमित प्रसव पूर्व जांच के साथ मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी भी जरूरी है। काउंसलिंग, चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक दवाइयों के माध्यम से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि परिवार का सहयोग और भावनात्मक समर्थन भी मरीज के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संवाद