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Noida News: 5 करोड़ से अधिक गबन में पूर्व रजिस्ट्रार व वित्त अधिकारी की अग्रिम जमानत खारिज
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(जीबीयू गबन केस)
(अदालत से)
-अदालत ने मामले को गंभीर आर्थिक अपराध मानते हुए कहा कि आरोप संगीन
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) में 5 करोड़ रुपये से अधिक के कथित गबन और वित्तीय अनियमितताओं के मामले में अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी और तत्कालीन वित्त अधिकारी नीरज कुमार की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी। मामला थाना इकोटेक-1 में दर्ज अपराध से जुड़ा है। एफआईआर 9 अप्रैल 2026 को दर्ज हुई थी।
अभियोजन के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान आंतरिक ऑडिट और खातों के मिलान में भारी गड़बड़ी सामने आई। जांच में पाया गया कि छात्रों से वसूली गई फीस जो विश्वविद्यालय के सॉफ्टवेयर में दर्ज थी। वह बैंक खातों में जमा नहीं हुई। यह रकम 5 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। एफआईआर में पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी, वित्त अधिकारी नीरज कुमार समेत कई अन्य कर्मचारियों शैलेंद्र कुमार शर्मा, मुदित कुमार, विजय प्रताप सिंह, मुकेश पांडेय, शिव कुमार खत्री, शिवम चड्ढा, संदीप, श्याम, नवीन और सुभाष शर्मा को आरोपी बनाया गया है।
फर्जी यूपीआई एंट्री से रचा गया खेल : जांच में सामने आया कि अकाउंट सेक्शन के कर्मचारियों और डाटा एंट्री ऑपरेटरों ने मिलकर फर्जी यूपीआई ट्रांजेक्शन आईडी और रसीदें तैयार कीं थी। इन एंट्रियों के जरिए यह दिखाया जाता था कि फीस जमा हो चुकी है, जबकि वास्तविक रकम विश्वविद्यालय के बैंक खातों में नहीं पहुंचती थी। शिकायत के अनुसार डॉ. विश्वास त्रिपाठी 28 दिसंबर 2020 को रजिस्ट्रार बने थे और बतौर ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) विश्वविद्यालय के वित्तीय लेनदेन की निगरानी उनके जिम्मे थी।
सीसीटीवी फुटेज न देने पर कोर्ट की टिप्पणी : फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने जांच के दौरान अकाउंट सेक्शन की सीसीटीवी फुटेज मांगी थी। आरोप है कि तीन बार लिखित अनुरोध के बावजूद फुटेज उपलब्ध नहीं कराई गई। अदालत ने इसे गंभीर मानते हुए कहा कि इससे साक्ष्य छिपाने या उनसे छेड़छाड़ की आशंका उत्पन्न होती है। मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। जिसकी अध्यक्षता सीबीआई मुख्यालय नई दिल्ली के पूर्व संयुक्त निदेशक एवं आईजी एनएम सिंह ने की।
बचाव पक्ष की नहीं काम आई दलील : सुनवाई के दौरान दोनों आरोपियों की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है और उनके खिलाफ आरोप अस्पष्ट हैं। यह भी कहा गया कि रजिस्ट्रार वित्त समिति का सदस्य नहीं होता और वित्तीय निर्णय अन्य अधिकारियों द्वारा लिए जाते हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद आरोपियों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी।
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(अदालत से)
-अदालत ने मामले को गंभीर आर्थिक अपराध मानते हुए कहा कि आरोप संगीन
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) में 5 करोड़ रुपये से अधिक के कथित गबन और वित्तीय अनियमितताओं के मामले में अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी और तत्कालीन वित्त अधिकारी नीरज कुमार की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी। मामला थाना इकोटेक-1 में दर्ज अपराध से जुड़ा है। एफआईआर 9 अप्रैल 2026 को दर्ज हुई थी।
अभियोजन के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान आंतरिक ऑडिट और खातों के मिलान में भारी गड़बड़ी सामने आई। जांच में पाया गया कि छात्रों से वसूली गई फीस जो विश्वविद्यालय के सॉफ्टवेयर में दर्ज थी। वह बैंक खातों में जमा नहीं हुई। यह रकम 5 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। एफआईआर में पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी, वित्त अधिकारी नीरज कुमार समेत कई अन्य कर्मचारियों शैलेंद्र कुमार शर्मा, मुदित कुमार, विजय प्रताप सिंह, मुकेश पांडेय, शिव कुमार खत्री, शिवम चड्ढा, संदीप, श्याम, नवीन और सुभाष शर्मा को आरोपी बनाया गया है।
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फर्जी यूपीआई एंट्री से रचा गया खेल : जांच में सामने आया कि अकाउंट सेक्शन के कर्मचारियों और डाटा एंट्री ऑपरेटरों ने मिलकर फर्जी यूपीआई ट्रांजेक्शन आईडी और रसीदें तैयार कीं थी। इन एंट्रियों के जरिए यह दिखाया जाता था कि फीस जमा हो चुकी है, जबकि वास्तविक रकम विश्वविद्यालय के बैंक खातों में नहीं पहुंचती थी। शिकायत के अनुसार डॉ. विश्वास त्रिपाठी 28 दिसंबर 2020 को रजिस्ट्रार बने थे और बतौर ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) विश्वविद्यालय के वित्तीय लेनदेन की निगरानी उनके जिम्मे थी।
सीसीटीवी फुटेज न देने पर कोर्ट की टिप्पणी : फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने जांच के दौरान अकाउंट सेक्शन की सीसीटीवी फुटेज मांगी थी। आरोप है कि तीन बार लिखित अनुरोध के बावजूद फुटेज उपलब्ध नहीं कराई गई। अदालत ने इसे गंभीर मानते हुए कहा कि इससे साक्ष्य छिपाने या उनसे छेड़छाड़ की आशंका उत्पन्न होती है। मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। जिसकी अध्यक्षता सीबीआई मुख्यालय नई दिल्ली के पूर्व संयुक्त निदेशक एवं आईजी एनएम सिंह ने की।
बचाव पक्ष की नहीं काम आई दलील : सुनवाई के दौरान दोनों आरोपियों की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है और उनके खिलाफ आरोप अस्पष्ट हैं। यह भी कहा गया कि रजिस्ट्रार वित्त समिति का सदस्य नहीं होता और वित्तीय निर्णय अन्य अधिकारियों द्वारा लिए जाते हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद आरोपियों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी।
