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गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय मामला: पूर्व कुलसचिव की अवमानना याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कार्रवाई से किया इनकार
Thu, 23 Jul 2026 10:37 AM IST
Rahul Kumar Tiwari
माई सिटी रिपोर्टर, ग्रेटर नोएडा
माई सिटी रिपोर्टर, ग्रेटर नोएडा
Published by: Rahul Kumar Tiwari
Updated Thu, 23 Jul 2026 10:37 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति और अन्य अधिकारियों के खिलाफ पूर्व कुलसचिव डॉ. विश्वास त्रिपाठी की अवमानना याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि संबंधित आदेश की प्रमुख टिप्पणियों पर पहले ही रोक लग चुकी है और सेवा समाप्ति का मामला अलग याचिका में लंबित है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह और अन्य के खिलाफ पूर्व कुलसचिव डॉ. विश्वास त्रिपाठी द्वारा दायर अवमानना याचिका खारिज कर दी है। न्यायालय ने यह फैसला नौ जुलाई 2026 को सुनाया है। अदालत ने पाया कि जिस आदेश के कथित उल्लंघन का आरोप था, उसकी कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियों पर पहले ही रोक लगा दी गई है। इसके अलावा, डॉ विश्वास त्रिपाठीकी सेवा समाप्ति का आदेश भी एक अलग याचिका में चुनौती के अधीन है।
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बता दें, डॉ विश्वास त्रिपाठी ने 13 फरवरी 2026 के एक आदेश का पालन न करने का आरोप लगाते हुए यह अवमानना याचिका दायर की थी। इस आदेश में उच्च न्यायालय ने उन्हें निलंबित करने के विश्वविद्यालय के फैसले को रद्द कर दिया था। न्यायालय ने तब विश्वविद्यालय के अधिकारियों के आचरण पर कड़ी टिप्पणियां की थीं। हालांकि, विश्वविद्यालय ने इस आदेश के खिलाफ विशेष अपील दायर की। 13 अप्रैल 2026 को विशेष अपील में उच्च न्यायालय की प्रतिकूल टिप्पणियों पर रोक लगा दी गई। डॉ त्रिपाठी को पहले 29 दिसंबर 2025 को रजिस्ट्रार पद से हटाया गया था। उच्च न्यायालय ने 16 जनवरी 2026 को इस आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद, 28 जनवरी 2026 को उन्हें निलंबित कर दिया गया था।
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आठ सप्ताह के भीतर जांच पूरी के दिए थे निर्देश
डॉ विश्वास त्रिपाठी को 29 दिसंबर 2025 को रजिस्ट्रार पद से मुक्त किया गया था। उच्च न्यायालय ने 16 जनवरी 2026 को इस आदेश को रद्द कर दिया था। न्यायालय ने विश्वविद्यालय को आठ सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद, 28 जनवरी 2026 को त्रिपाठी को निलंबित कर दिया गया। इस निलंबन को भी 13 फरवरी 2026 को उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। अदालत ने तब कहा था कि निलंबन आदेश दुर्भावनापूर्ण और मनमाना था। वहीं 13 फरवरी 2026 के आदेश में न्यायालय ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा शक्ति के मनमाने और प्रतिशोधात्मक प्रयोग पर टिप्पणी की थी। न्यायालय ने कहा था कि त्रिपाठी को निलंबित करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसके बाद, 7 मार्च 2026 की जांच रिपोर्ट के आधार पर 24 मार्च 2026 को त्रिपाठी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। त्रिपाठी ने इस सेवा समाप्ति के आदेश को भी एक अलग याचिका में चुनौती दी है। इस याचिका पर 27 मई 2026 को सुनवाई हुई थी।
डॉ विश्वास त्रिपाठी को 29 दिसंबर 2025 को रजिस्ट्रार पद से मुक्त किया गया था। उच्च न्यायालय ने 16 जनवरी 2026 को इस आदेश को रद्द कर दिया था। न्यायालय ने विश्वविद्यालय को आठ सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद, 28 जनवरी 2026 को त्रिपाठी को निलंबित कर दिया गया। इस निलंबन को भी 13 फरवरी 2026 को उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। अदालत ने तब कहा था कि निलंबन आदेश दुर्भावनापूर्ण और मनमाना था। वहीं 13 फरवरी 2026 के आदेश में न्यायालय ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा शक्ति के मनमाने और प्रतिशोधात्मक प्रयोग पर टिप्पणी की थी। न्यायालय ने कहा था कि त्रिपाठी को निलंबित करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसके बाद, 7 मार्च 2026 की जांच रिपोर्ट के आधार पर 24 मार्च 2026 को त्रिपाठी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। त्रिपाठी ने इस सेवा समाप्ति के आदेश को भी एक अलग याचिका में चुनौती दी है। इस याचिका पर 27 मई 2026 को सुनवाई हुई थी।
अवमानना याचिका खारिज होने का कारण
न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने अवमानना याचिका खारिज करते हुए कहा कि 13 फरवरी 2026 के आदेश की महत्वपूर्ण टिप्पणियों पर रोक लगा दी गई है। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ने विशेष अपील संख्या 286/2026 में यह रोक प्राप्त की थी। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि डॉ त्रिपाठी की सेवा समाप्ति का आदेश भी एक अन्य याचिका में चुनौती के अधीन है। इन परिस्थितियों को देखते हुए, न्यायालय ने अवमानना कार्यवाही को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं पाया। न्यायालय ने डॉ त्रिपाठी को लंबित कार्यवाही में अपने कानूनी और तथ्यात्मक तर्क उठाने की स्वतंत्रता दी है।
न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने अवमानना याचिका खारिज करते हुए कहा कि 13 फरवरी 2026 के आदेश की महत्वपूर्ण टिप्पणियों पर रोक लगा दी गई है। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ने विशेष अपील संख्या 286/2026 में यह रोक प्राप्त की थी। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि डॉ त्रिपाठी की सेवा समाप्ति का आदेश भी एक अन्य याचिका में चुनौती के अधीन है। इन परिस्थितियों को देखते हुए, न्यायालय ने अवमानना कार्यवाही को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं पाया। न्यायालय ने डॉ त्रिपाठी को लंबित कार्यवाही में अपने कानूनी और तथ्यात्मक तर्क उठाने की स्वतंत्रता दी है।
कैश में लेते थे फीस, विवि के खातों में नहीं होती थी जमा
विवि के अधिकारियों ने बताया था कि विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर बोर्ड को फीस को लेकर कई शिकायतें मिली थी। छात्रों ने शिकायत की थी कि कैश में फीस लेने के बाद उन्हें विवि की मोहर लगी जाली रसीद दी गई। कुछ बाहरी लोग व विवि के सीनियर छात्र जूनियरों को फीस कम कराने का झांसा देकर उनसे कैश में पैसे ले लेते थे। उसके बाद वह पैसा विवि के खातों में जमा नहीं किया जाता था। फीस जमा नहीं होने पर परीक्षा देने से रोकने पर छात्रों को ठगी का पता चलता था। प्रॉक्टर बोर्ड के पास जब शिकायतें पहुंचीं तो मामले का खुलासा हुआ था। कुछ छात्रों को सस्पेड भी किया गया। वहीं, बाहरी लोगों को जेल भेजा गया।
विवि के अधिकारियों ने बताया था कि विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर बोर्ड को फीस को लेकर कई शिकायतें मिली थी। छात्रों ने शिकायत की थी कि कैश में फीस लेने के बाद उन्हें विवि की मोहर लगी जाली रसीद दी गई। कुछ बाहरी लोग व विवि के सीनियर छात्र जूनियरों को फीस कम कराने का झांसा देकर उनसे कैश में पैसे ले लेते थे। उसके बाद वह पैसा विवि के खातों में जमा नहीं किया जाता था। फीस जमा नहीं होने पर परीक्षा देने से रोकने पर छात्रों को ठगी का पता चलता था। प्रॉक्टर बोर्ड के पास जब शिकायतें पहुंचीं तो मामले का खुलासा हुआ था। कुछ छात्रों को सस्पेड भी किया गया। वहीं, बाहरी लोगों को जेल भेजा गया।
इन पर मामला हुआ था दर्ज
पूर्व कुलसचिव डॉ विश्वास त्रिपाठी, वित्त अधिकारी नीरज कुमार, लेखा विभाग के अधिकारी मुदित कुमार, आउटसोर्सिंग में तैनात मुकेश पांडेय, शिव कुमार दत्त, शिवम, संदीप, श्याम, नवीन और सुभाष के अलावा दो पूर्व अधिकारियों समेत कुल 12 लोगों के खिलाफ पांच करोड़ रुपये की फीस घोटाले में शामिल होने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था।
इसके अतिरिक्त, डॉ. त्रिपाठी के विरुद्ध विद्यार्थियों की फीस से संबंधित कथित घोटाले के मामले में थाना इकोटेक में अपराध संख्या 39/2026 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज है। उक्त प्रकरण में डॉ. त्रिपाठी द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका निचली अदालत द्वारा पहले ही खारिज की जा चुकी थी। इसके बाद उन्होंने गिरफ्तारी पर रोक की मांग करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे न्यायालय ने भी खारिज कर दिया।
पूर्व कुलसचिव डॉ विश्वास त्रिपाठी, वित्त अधिकारी नीरज कुमार, लेखा विभाग के अधिकारी मुदित कुमार, आउटसोर्सिंग में तैनात मुकेश पांडेय, शिव कुमार दत्त, शिवम, संदीप, श्याम, नवीन और सुभाष के अलावा दो पूर्व अधिकारियों समेत कुल 12 लोगों के खिलाफ पांच करोड़ रुपये की फीस घोटाले में शामिल होने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था।
इसके अतिरिक्त, डॉ. त्रिपाठी के विरुद्ध विद्यार्थियों की फीस से संबंधित कथित घोटाले के मामले में थाना इकोटेक में अपराध संख्या 39/2026 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज है। उक्त प्रकरण में डॉ. त्रिपाठी द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका निचली अदालत द्वारा पहले ही खारिज की जा चुकी थी। इसके बाद उन्होंने गिरफ्तारी पर रोक की मांग करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे न्यायालय ने भी खारिज कर दिया।