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Noida News: परिवार और समाज ने ठुकराया, दीपा ने स्वर्ण जीतकर खुद को किया साबित
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दीपा सिंह खिलाड़ी
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- पिता का सपना पूरा करने के लिए कराटे छोड़ वेटलिफ्टिंग चुनी, अब नेपाल और दुबई में अंतरराष्ट्रीय पदक पर नजर
मो. सफीक खान
नोएडा। सेक्टर-66 स्थित मामूरा गांव की रहने वाली दीपा सिंह ने संघर्ष, हौसले और दृढ़ संकल्प के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई है। परिवार और समाज के विरोध, आर्थिक तंगी और तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने वेटलिफ्टिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर खुद को साबित किया है। अब उनका लक्ष्य सितंबर में नेपाल और अक्टूबर में दुबई में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए पदक जीतना है।
दीपा पहले कराटे खिलाड़ी थीं। उन्होंने ब्लैक बेल्ट (सेकेंड डैन) हासिल करने के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते। लेकिन उनके दिवंगत पिता का सपना था कि बेटी वेटलिफ्टिंग में देश का नाम रोशन करे। पिता के निधन के बाद दीपा ने उनका सपना पूरा करने का संकल्प लिया और महज एक वर्ष के भीतर वेटलिफ्टिंग में अपनी अलग पहचान बना ली। 13 जुलाई 2026 को आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने 11 खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा-
दीपा बताती हैं कि उनकी मां हृदय रोग से पीड़ित हैं और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा। कई बार मां किराए के लिए जो पैसे देती थीं, उनमें से बचत करने के लिए वह लंबी दूरी पैदल तय करती थीं, ताकि उन्हीं पैसों से अपनी डाइट पूरी कर सकें। दीपा का कहना है कि खेल के सफर में सबसे बड़ी चुनौती मैदान नहीं, बल्कि घर और समाज का विरोध रहा। कई बार उन्हें अभ्यास के लिए बाहर जाने से रोका गया और प्रतियोगिताओं के समय स्कूटी की चाबी तक छीन ली गई। उनका दावा है कि हाल की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता से पहले उन्हें जान से मारने की धमकी भी मिली।
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कोट-
मेरा सपना नहीं, मेरी जिद है कि ओलंपिक में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतूं। फिलहाल मेरा पूरा ध्यान नेपाल और दुबई की प्रतियोगिताओं पर है। आर्थिक सहयोग मिले तो वहां भी देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर लौटूंगी। -दीपा
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मो. सफीक खान
नोएडा। सेक्टर-66 स्थित मामूरा गांव की रहने वाली दीपा सिंह ने संघर्ष, हौसले और दृढ़ संकल्प के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई है। परिवार और समाज के विरोध, आर्थिक तंगी और तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने वेटलिफ्टिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर खुद को साबित किया है। अब उनका लक्ष्य सितंबर में नेपाल और अक्टूबर में दुबई में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए पदक जीतना है।
दीपा पहले कराटे खिलाड़ी थीं। उन्होंने ब्लैक बेल्ट (सेकेंड डैन) हासिल करने के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते। लेकिन उनके दिवंगत पिता का सपना था कि बेटी वेटलिफ्टिंग में देश का नाम रोशन करे। पिता के निधन के बाद दीपा ने उनका सपना पूरा करने का संकल्प लिया और महज एक वर्ष के भीतर वेटलिफ्टिंग में अपनी अलग पहचान बना ली। 13 जुलाई 2026 को आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने 11 खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
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सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा-
दीपा बताती हैं कि उनकी मां हृदय रोग से पीड़ित हैं और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा। कई बार मां किराए के लिए जो पैसे देती थीं, उनमें से बचत करने के लिए वह लंबी दूरी पैदल तय करती थीं, ताकि उन्हीं पैसों से अपनी डाइट पूरी कर सकें। दीपा का कहना है कि खेल के सफर में सबसे बड़ी चुनौती मैदान नहीं, बल्कि घर और समाज का विरोध रहा। कई बार उन्हें अभ्यास के लिए बाहर जाने से रोका गया और प्रतियोगिताओं के समय स्कूटी की चाबी तक छीन ली गई। उनका दावा है कि हाल की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता से पहले उन्हें जान से मारने की धमकी भी मिली।
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कोट-
मेरा सपना नहीं, मेरी जिद है कि ओलंपिक में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतूं। फिलहाल मेरा पूरा ध्यान नेपाल और दुबई की प्रतियोगिताओं पर है। आर्थिक सहयोग मिले तो वहां भी देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर लौटूंगी। -दीपा