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Delhi NCR News: दिल्ली के हर चार में से एक किशोर की नींद अधूरी
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-खराब नींद का असर उनकी पढ़ाई के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे रहा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। पढ़ाई, मोबाइल और बदलती दिनचर्या के बीच दिल्ली के किशोरों की नींद तेजी से प्रभावित हो रही है। एक अध्ययन में सामने आया है कि सेंट्रल दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 22.5 प्रतिशत किशोर यानी लगभग हर चार में से एक पर्याप्त नींद नहीं ले रहा है। खराब नींद का असर उनकी पढ़ाई के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे रहा है। इस अध्ययन में मध्य दिल्ली के सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों के 12 से 18 साल की उम्र के 1,452 किशोरों को शामिल किया गया। इनमें लड़के और लड़कियों की संख्या बराबर थी।
अध्ययन में शामिल किशोरों की औसत उम्र 14 से 18 वर्ष थी। यह शोध सर गंगा राम अस्पताल, नेशनल हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत आईसीएमआर-डॉ. एएस पेंटल डिस्टिंग्विश्ड साइंटिस्ट चेयर और आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने किया। शोधकर्ताओं ने नींद की गुणवत्ता, पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य, स्कूल में उपस्थिति, शारीरिक स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े कई पहलुओं का अध्ययन किया। अध्ययन के अनुसार, जिन किशोरों में नींद की कमी पाई गई, उनका औसत शैक्षणिक ग्रेड करीब 64 प्रतिशत था। वहीं, पर्याप्त नींद लेने वाले विद्यार्थियों का औसत ग्रेड 67 प्रतिशत रहा। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि नींद की कमी का पढ़ाई पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
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अवसाद से भी गहरा संबंध
कई विद्यार्थियों ने दिन में नींद आने और सुबह उठने में परेशानी की भी शिकायत की। करीब 48.3 प्रतिशत किशोरों ने बताया कि उन्हें सप्ताह में कम से कम एक बार जागने में दिक्कत होती है। करीब छह प्रतिशत ने सप्ताह में तीन या उससे अधिक बार ऐसी परेशानी होने की बात कही। अध्ययन में नींद और मानसिक स्वास्थ्य के बीच भी मजबूत संबंध सामने आया। करीब 60 प्रतिशत यानी 912 किशोरों में डिप्रेशन के लक्षण पाए गए। इनमें 32.9 प्रतिशत में हल्के, जबकि करीब 27 प्रतिशत में मध्यम से गंभीर लक्षण थे। शोधकर्ताओं के अनुसार, अवसाद के लक्षण वाले किशोरों में नींद की कमी की संभावना अन्य किशोरों की तुलना में 3.51 गुना अधिक थी।
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स्क्रीन और अनियमित दिनचर्या भी चिंता का कारण
शोधकर्ताओं ने नींद की अच्छी आदतों यानी स्लीप हाइजीन को भी महत्वपूर्ण पाया। नियमित समय पर सोना, सोने से पहले स्क्रीन का कम इस्तेमाल और बेहतर दिनचर्या अच्छी नींद में मदद कर सकती है। अध्ययन में खराब स्लीप हाइजीन और खराब नींद की गुणवत्ता के बीच संबंध पाया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि स्कूलों में विद्यार्थियों को नींद की अच्छी आदतों के बारे में जागरूक करने की जरूरत है। इसमें माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका भी अहम है। नियमित नींद की दिनचर्या बनाने और बच्चों को यह समझाने की जरूरत है कि अच्छी नींद सिर्फ आराम नहीं, बल्कि पढ़ाई, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। पढ़ाई, मोबाइल और बदलती दिनचर्या के बीच दिल्ली के किशोरों की नींद तेजी से प्रभावित हो रही है। एक अध्ययन में सामने आया है कि सेंट्रल दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 22.5 प्रतिशत किशोर यानी लगभग हर चार में से एक पर्याप्त नींद नहीं ले रहा है। खराब नींद का असर उनकी पढ़ाई के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे रहा है। इस अध्ययन में मध्य दिल्ली के सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों के 12 से 18 साल की उम्र के 1,452 किशोरों को शामिल किया गया। इनमें लड़के और लड़कियों की संख्या बराबर थी।
अध्ययन में शामिल किशोरों की औसत उम्र 14 से 18 वर्ष थी। यह शोध सर गंगा राम अस्पताल, नेशनल हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत आईसीएमआर-डॉ. एएस पेंटल डिस्टिंग्विश्ड साइंटिस्ट चेयर और आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने किया। शोधकर्ताओं ने नींद की गुणवत्ता, पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य, स्कूल में उपस्थिति, शारीरिक स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े कई पहलुओं का अध्ययन किया। अध्ययन के अनुसार, जिन किशोरों में नींद की कमी पाई गई, उनका औसत शैक्षणिक ग्रेड करीब 64 प्रतिशत था। वहीं, पर्याप्त नींद लेने वाले विद्यार्थियों का औसत ग्रेड 67 प्रतिशत रहा। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि नींद की कमी का पढ़ाई पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
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अवसाद से भी गहरा संबंध
कई विद्यार्थियों ने दिन में नींद आने और सुबह उठने में परेशानी की भी शिकायत की। करीब 48.3 प्रतिशत किशोरों ने बताया कि उन्हें सप्ताह में कम से कम एक बार जागने में दिक्कत होती है। करीब छह प्रतिशत ने सप्ताह में तीन या उससे अधिक बार ऐसी परेशानी होने की बात कही। अध्ययन में नींद और मानसिक स्वास्थ्य के बीच भी मजबूत संबंध सामने आया। करीब 60 प्रतिशत यानी 912 किशोरों में डिप्रेशन के लक्षण पाए गए। इनमें 32.9 प्रतिशत में हल्के, जबकि करीब 27 प्रतिशत में मध्यम से गंभीर लक्षण थे। शोधकर्ताओं के अनुसार, अवसाद के लक्षण वाले किशोरों में नींद की कमी की संभावना अन्य किशोरों की तुलना में 3.51 गुना अधिक थी।
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स्क्रीन और अनियमित दिनचर्या भी चिंता का कारण
शोधकर्ताओं ने नींद की अच्छी आदतों यानी स्लीप हाइजीन को भी महत्वपूर्ण पाया। नियमित समय पर सोना, सोने से पहले स्क्रीन का कम इस्तेमाल और बेहतर दिनचर्या अच्छी नींद में मदद कर सकती है। अध्ययन में खराब स्लीप हाइजीन और खराब नींद की गुणवत्ता के बीच संबंध पाया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि स्कूलों में विद्यार्थियों को नींद की अच्छी आदतों के बारे में जागरूक करने की जरूरत है। इसमें माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका भी अहम है। नियमित नींद की दिनचर्या बनाने और बच्चों को यह समझाने की जरूरत है कि अच्छी नींद सिर्फ आराम नहीं, बल्कि पढ़ाई, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है।