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Delhi NCR News: यूको बैंक से सात करोड़ के ऋण धोखाधड़ी में डीएसएल के तीन पूर्व निदेशक दोषी करार
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राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा, वन-टाइम सेटलमेंट से आपराधिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती, पूर्व बैंक अधिकारी विकास बसु सबूतों के अभाव में बरी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। राउज एवेन्यू कोर्ट ने वर्ष 2001 में यूको बैंक से सात करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी मामले में द्वारकाधीश स्पिनर्स लिमिटेड (डीएसएल) के तीन पूर्व निदेशकों अमित चतुर्वेदी, संजय चतुर्वेदी और परवीन जुनेजा को दोषी ठहराया है। वहीं, बैंक के तत्कालीन अधिकारी विकास बसु को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।
विशेष न्यायाधीश सुधांशु कौशिक ने अपने 160 पृष्ठों के फैसले में कहा कि आरोपियों ने बैंक से ऋण प्राप्त करने के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया और स्वीकृत राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के बजाय अन्य कार्यों में किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक के साथ वन-टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) होने से किसी आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
मामला वर्ष 2009 में सीबीआई की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर से संबंधित है। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने शुरुआत में दावा किया था कि ऋण की राशि आईएफसीआई का कर्ज समय से पहले चुकाने के लिए ली जा रही है। बाद में बैंक को बताया गया कि आईएफसीआई ने समयपूर्व भुगतान स्वीकार नहीं किया। यही नहीं ऋण का उद्देश्य बदलकर टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड स्कीम के तहत नई मशीनरी खरीदना दर्शा दिया गया।सीबीआई के अनुसार, नई मशीनें खरीदने का दिखावा करने के लिए फर्जी चार्टर्ड अकाउंटेंट प्रमाणपत्र और नकली बिल जमा किए गए। जांच में पाया गया कि कोई मशीनरी नहीं खरीदी गई और ऋण की राशि समूह की अन्य कंपनियों में स्थानांतरित कर दी गई।
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कोर्ट ने कहा-तीनों दोषियों ने बैंक को धोखा देने की शुरू से रच रखी थी साजिश
अदालत ने कहा कि तीनों दोषियों ने शुरू से ही बैंक को धोखा देने की साजिश रची थी और उन्हें ऋण लेने, राशि के बंटवारे तथा उसके दुरुपयोग की पूरी जानकारी थी। वहीं, विकास बसु के खिलाफ साजिश में शामिल होने या किसी अवैध लाभ प्राप्त करने का ठोस प्रमाण नहीं मिला। अदालत ने यह भी माना कि उनके निर्णयों की समीक्षा दो वरिष्ठ अधिकारियों ने भी की थी। दोषी ठहराए गए तीनों आरोपियों की सजा पर जल्द सुनवाई होगी।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। राउज एवेन्यू कोर्ट ने वर्ष 2001 में यूको बैंक से सात करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी मामले में द्वारकाधीश स्पिनर्स लिमिटेड (डीएसएल) के तीन पूर्व निदेशकों अमित चतुर्वेदी, संजय चतुर्वेदी और परवीन जुनेजा को दोषी ठहराया है। वहीं, बैंक के तत्कालीन अधिकारी विकास बसु को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।
विशेष न्यायाधीश सुधांशु कौशिक ने अपने 160 पृष्ठों के फैसले में कहा कि आरोपियों ने बैंक से ऋण प्राप्त करने के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया और स्वीकृत राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के बजाय अन्य कार्यों में किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक के साथ वन-टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) होने से किसी आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
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मामला वर्ष 2009 में सीबीआई की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर से संबंधित है। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने शुरुआत में दावा किया था कि ऋण की राशि आईएफसीआई का कर्ज समय से पहले चुकाने के लिए ली जा रही है। बाद में बैंक को बताया गया कि आईएफसीआई ने समयपूर्व भुगतान स्वीकार नहीं किया। यही नहीं ऋण का उद्देश्य बदलकर टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड स्कीम के तहत नई मशीनरी खरीदना दर्शा दिया गया।सीबीआई के अनुसार, नई मशीनें खरीदने का दिखावा करने के लिए फर्जी चार्टर्ड अकाउंटेंट प्रमाणपत्र और नकली बिल जमा किए गए। जांच में पाया गया कि कोई मशीनरी नहीं खरीदी गई और ऋण की राशि समूह की अन्य कंपनियों में स्थानांतरित कर दी गई।
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कोर्ट ने कहा-तीनों दोषियों ने बैंक को धोखा देने की शुरू से रच रखी थी साजिश
अदालत ने कहा कि तीनों दोषियों ने शुरू से ही बैंक को धोखा देने की साजिश रची थी और उन्हें ऋण लेने, राशि के बंटवारे तथा उसके दुरुपयोग की पूरी जानकारी थी। वहीं, विकास बसु के खिलाफ साजिश में शामिल होने या किसी अवैध लाभ प्राप्त करने का ठोस प्रमाण नहीं मिला। अदालत ने यह भी माना कि उनके निर्णयों की समीक्षा दो वरिष्ठ अधिकारियों ने भी की थी। दोषी ठहराए गए तीनों आरोपियों की सजा पर जल्द सुनवाई होगी।