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World Cancer Day: बुजुर्ग और युवा ही नहीं नवजात को भी अपनी गिरफ्त में ले रहा कैंसर, जलवायु परिवर्तन सब पर भारी

सिमरन, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 04 Feb 2026 03:55 AM IST
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सार

चौंकाने वाली बात यह है कि डॉक्टरों को मात्र तीन से छह महीने के छोटे-छोटे शिशुओं में भी इसके लक्षण दिख रहे हैं। इंडियन कैंसर सोसायटी की ने अपने हालिया शोध में इसका खुलासा किया है।

World Cancer Day: Cancer is affecting not only the elderly and the young, but also newborns
demo - फोटो : Freepik.com
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन के चलते अब नवजात शिशु भी कैंसर की चपेट में आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डॉक्टरों को मात्र तीन से छह महीने के छोटे-छोटे शिशुओं में भी इसके लक्षण दिख रहे हैं। इंडियन कैंसर सोसायटी की ने अपने हालिया शोध में इसका खुलासा किया है। कैंसर के कुल मामलों में लगभग 4 फीसदी हिस्सा बच्चों का है। इसकी तफ्तीश एम्स समेत कई बड़े अस्पताल के आंकड़े करते हैं।

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कई शोध के अनुसार, देश में हर साल करीब 50,000 से 75,000 नए बच्चे कैंसर के शिकार होते हैं, जिसमें उनकी उम्र 0-14 साल की होती है। दुनिया भर में हर साल 2 लाख से ज्यादा बच्चे कैंसर से प्रभावित होते हैं। देश में ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) सबसे आम है, उसके बाद लिम्फोमा, ब्रेन ट्यूमर, न्यूरोब्लास्टोमा, रेटिनोब्लास्टोमा और सारकोमा (हड्डी या सॉफ्ट टिश्यू कैंसर) आते हैं।
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शोध के अनुसार, विकसित देशों में 80 से 90 फीसदी बच्चे ठीक हो जाते हैं, जबकि भारत में यह दर 30-60 फीसदी के बीच है, लेकिन समय पर इलाज से बहुत सुधार हो सकता है। इसका कारण ज्यादातर मामलों में संकेत पता नहीं चलना है। ऐसे में केवल 5 प्रतिशत मामलों में यह जीन से माता-पिता से आता है। वयस्कों की तरह धूम्रपान या जीवनशैली का असर बच्चों में कम होता है। कुछ मामलों में रेडिएशन या माता-पिता के संपर्क में आने वाले कुछ कारक जोखिम बढ़ा सकते हैं।

बच्चों में कैंसर के मुख्य लक्षण क्या है?
डॉक्टरों के अनुसार, बच्चों में कैंसर वयस्कों से अलग प्रकार का होता है और यह अचानक बिना शुरुआती लक्षणों के आ सकता है। हालांकि, बच्चों में कैंसर का इलाज वयस्कों की तुलना में बेहतर होता है। ज्यादातर मामले ठीक हो जाते हैं, खासकर अगर शुरुआत में ही पता चल जाए। इसके अलावा कई मामलों में प्रमुख लक्षण लगातार बुखार, थकान, कमजोरी या खासकर ल्यूकेमिया में वजन घटना हड्डी या जोड़ों में दर्द सिरदर्द, चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना।

ब्रेन ट्यूमर के संकेत में उल्टी या आंख, कान व बोलने में समस्या गर्दन, बगल या कमर में सूजी हुई ग्रंथियां, रात में पसीना आना शामिल है। इसके अलावा, लिम्फोमा कैंसर में आंख में बदलाव जैसे उभरी हुई आंख, काले घेरे, ढीली पलकें या चलने में दिक्कत होती है।

महिला में स्तन और पुरुषों में लंग कैंसर का बढ़ रहा प्रकोप
एक आम धारणा है कि महिलाओं में कैंसर ज्यादा घातक होता है और उनमें मौतें ज्यादा होती हैं, लेकिन वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि ऐसा नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और ग्लोबोकॉन के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, कैंसर से होने वाली मौतों की दर पुरुषों में महिलाओं की तुलना में ज्यादा है। दुनिया भर में कैंसर से मरने वाले हर 9 पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 12 महिलाएं मरती हैं। पुरुषों में फेफड़े का कैंसर सबसे ज्यादा जान लेता है।

हालांकि, महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे आम और मौत का बड़ा कारण है। पुरुषों की कैंसर मौत दर महिलाओं से करीब 30-40 फीसदी ज्यादा रहती है। हालांकि, 50 साल से कम उम्र की महिलाओं में कैंसर के नए मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और कुछ उम्र समूहों में अब महिलाओं में पुरुषों से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं।

डॉक्टर बोले, समय पर इलाज से ठीक हो जाता है
ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. नितेश रोहतगी ने बताया कि शुरुआत में पता चलने से इलाज आसान और कम तीव्र होता है। दवाओं के साइड इफेक्ट कम होते हैं और बचने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। इसके अलावा खर्च भी कम होता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर रहती है। उन्होंने बताया कि इलाज में देरी से बालों का झड़ना, मुंह में छाले, थकान, एनीमिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बाद में दिल-फेफड़े की समस्या, विकास में देरी, प्रजनन संबंधी दिक्कत या दूसरा कैंसर का जोखिम रह सकता है। इसलिए इलाज के बाद नियमित फॉलो-अप जरूरी है।

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