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World Hearing Day: ईयरफोन और हेडफोन का अधिक इस्तेमाल कम कर रहा है सुनने की क्षमता, चिकित्सकों ने दी चेतावनी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Tue, 03 Mar 2026 06:13 AM IST
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सार

दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने ईयरफोन और हेडफोन के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि रोजाना आठ से नौ घंटे इस्तेमाल से सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है।

World Hearing Day: Excessive use of earphones and headphones is reducing hearing ability
demo - फोटो : Freepik
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विस्तार

ईयरफोन और हेडफोन का अधिक इस्तेमाल कानों के सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा रहा है। लोग 40-45 की उम्र में ही ठीक ढंग से सुन नहीं पा रहे हैं। दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने ईयरफोन और हेडफोन के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि रोजाना आठ से नौ घंटे इस्तेमाल से सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है।

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इस संबंध में एम्स में सोमवार को प्रेसवार्ता हुई। एम्स के ईएनटी विभाग की डॉक्टर पूनम सागर ने कहा कि उम्र के साथ सुनाई देने की कमजोरी अब 40-45 साल में भी सामने आ रही है। इसको लेकर सावधानी की जरूरत है। उन्होंने कहा कि तेज आवाज से श्रवण कोशिका को नुकसाान पहुंचता है। इसके लिए जरूरी है कि डिवाइस की आवाज को 60 फीसदी से नीचे रखे। लगातार 60 मिनट से अधिक समय तक ईयरफोन और हेडफोन का इस्तेमाल बिल्कुल न करें।
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12 हजार बच्चों की अब तक हुई स्क्रीनिंग
एम्स ईएनटी प्रोफेसर कपिल सिक्का ने बताया कि सुनने की क्षमता प्रभावित होने पर ज्यादातर बच्चे चार से साढ़े चार साल की उम्र में उपचार के लिए आते हैं, जबकि एक साल की उम्र के अंदर उन्हें आना चाहिए। एम्स में जन्म लेने वाले हर बच्चे का स्क्रीनिंग टेस्ट किया जाता है। अब तक दस से 12 हजार बच्चों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। एक हजार बच्चों में एक बच्चे में बहरापन निकलता है, जिसमें कॉकलियर इंप्लांट की जरूरत होती है।

एम्स के ईएनटी विभाग में ऑडियोलॉजिस्ट शिवानी अग्रवाल ने कहा कि कॉकलियर इंप्लांट के बाद डिवाइस की नियमित तौर पर सफाई जरूरी है। उसे पानी से बचाकर रखना होता है। ईएनटी विभाग प्रमुख प्रोफेसर राकेश कुमार ने कहा कि अगर जन्म के छह-आठ महीने बाद भी सुनने-बोलने की समस्या है तो दिक्कत है। ऐसा नहीं है कि सुनने संबंधी समस्या का उपचार केवल ऑपरेशन है। कॉकलियर इंप्लांट का विकल्प उपलब्ध है।
एम्स में पहली बार हुआ ब्रेन स्टेम इंप्लांट

प्रोफेसर कपिल सिक्का ने बताया कि एम्स दिल्ली में पहली बार पांच वर्ष के बच्चे को ब्रेन स्टेम इंप्लांट किया गया। मैनिंजाइटिस बीमारी के चलते बच्चे की सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा। दिल्ली के रहने वाले बच्चे को उपचार के लिए एम्स में लाया गया। न्यूरो सर्जरी विभाग की मदद से बच्चे में ब्रेन स्टेम इंप्लांट किया गया। जर्मन के सर्जन की मदद से ब्रेन स्टेम इंप्लांट कराया गया।

जन्मजात बहरापन सिर्फ 0.2 फीसदी
उन्होंने बताया कि अगर समय से पता चल जाए कि बच्चा सुन नहीं रहा है तो कॉकलियर इंप्लांट के बाद स्पीच थेरेपी करवाएं। इससे बच्चा सामान्य की तरेगा सुनेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकडों के अनुसार करीब छह से सात फीसदी लोग बहरापन की समस्या से जूझ रहे है। अच्छी बात यह है कि जितना बहरापन है, उसमें से करीब 70-80 फीसदी का उपचार किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि बच्चों में बहरापन की दर दो फीसदी है। जबकि जन्मजात यह समस्या 0.2 फीसदी है। मगर, आबादी के हिसाब से देखेंगे तो यह दर ज्यादा दिखेगी। गर्भावस्था के दौरान मां को संक्रमण होना भी एक वजह है। जिन बच्चों का वजन जन्म के समय कम और पीलिया अधिक होता है उनकी सुनने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

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