WIEGO की रिपोर्ट में खुलासा: दिल्ली में 90% रेहड़ी-पटरी वालों ने घटाए काम के घंटे, 65% ने झेला उत्पीड़न
डब्ल्यूआईईजीओ के अध्ययन के अनुसार, 2025 की गर्मियों में आई हीटवेव के बाद किए गए सर्वेक्षण में 96% सड़क विक्रेताओं ने बताया कि अत्यधिक गर्मी के कारण ग्राहकों की संख्या में भारी गिरावट आई। लोग धूप और गर्मी से बचने के लिए घरों में रहे, जिससे सड़कों और बाजारों में भीड़ कम हो गई। इसका सीधा असर कामकाजी घंटों पर पड़ा।
विस्तार
2025 की भीषण हीटवेव ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सड़क विक्रेताओं की रोजी-रोटी पर गहरा असर डाला है। असहनीय गर्मी ने न सिर्फ ग्राहकों की संख्या घटा दी, बल्कि कामकाजी घंटों, आय, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा तक को प्रभावित किया। वूमेन इन इन्फोर्मल एम्प्लॉयमेंट- ग्लोबलाइजिंग एंड ऑर्गेनाइजिंग (डब्ल्यूआईईजीओ) के दो चरणों में किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि 96% विक्रेताओं ने ग्राहकों में भारी कमी दर्ज की, 90% ने अपने काम के घंटे घटाए और 79% को गर्मी से जुड़ी बीमारियों के लिए चिकित्सकीय सहायता लेनी पड़ी। रिपोर्ट यह भी बताती है कि बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक उत्पीड़न ने संकट को और गहरा कर दिया है।
डब्ल्यूआईईजीओ के अध्ययन के अनुसार, 2025 की गर्मियों में आई हीटवेव के बाद किए गए सर्वेक्षण में 96% सड़क विक्रेताओं ने बताया कि अत्यधिक गर्मी के कारण ग्राहकों की संख्या में भारी गिरावट आई। लोग धूप और गर्मी से बचने के लिए घरों में रहे, जिससे सड़कों और बाजारों में भीड़ कम हो गई। इसका सीधा असर कामकाजी घंटों पर पड़ा। 90% विक्रेताओं ने बताया कि बिना छांव के लंबे समय तक धूप में खड़े रहना संभव नहीं रहा, इसलिए उन्हें अपने काम के घंटे घटाने पड़े। जिन विक्रेताओं के पास छांव या अस्थायी आश्रय नहीं था, उनमें कामकाजी समय में कटौती और अधिक रही। साथ ही 72% विक्रेताओं को माल के नुकसान का सामना करना पड़ा। फल- सब्जी और तैयार भोजन बेचने वालों में यह दर 94% तक पहुंच गई। गैर-खाद्य सामान बेचने वालों में 57% और सेवाएं देने वालों में 41% ने नुकसान दर्ज किया। बढ़ती गर्मी ने रोजमर्रा की कमाई पर दोहरा प्रहार किया।एक ओर बिक्री घटी, दूसरी ओर खराब माल ने घाटा बढ़ाया।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव, पानी तक नहीं
रिपोर्ट में दिल्ली के 17 प्रमुख बाजारों का मानचित्रण किया गया। अधिकांश विक्रेता फुटपाथों, सड़कों और सड़क किनारे काम करते हैं। चौंकाने वाली बात यह रही कि किसी भी बाजार में नगरपालिका का पानी का पॉइंट उपलब्ध नहीं था।विक्रेताओं को पानी खरीदना या घर से लाना पड़ता है, जिससे रोजाना 50 से 300 रुपये तक अतिरिक्त खर्च होता है। कुछ मामलों में यह खर्च महीने में 6,000 रुपये से अधिक पहुंच गया। शौचालयों की उपलब्धता या तो नहीं थी या अपर्याप्त थी। जहां थे, वहां शुल्क देना पड़ता था। महिलाओं के लिए अलग शौचालय बहुत कम थे। छांव और स्थायी आश्रय की कमी आम समस्या रही। सामान्य दिनों में भी ये स्थितियां स्वास्थ्य जोखिम पैदा करती हैं, लेकिन हीटवेव के दौरान ये जोखिम और गंभीर हो जाते हैं।
चेतावनी प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा की सीमाएं
गर्मी को लेकर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली भी पर्याप्त नहीं रही। एक तिहाई से कम विक्रेताओं को समय पर हीटवेव की चेतावनी मिली। कई मामलों में चेतावनियां स्थानीय भाषाओं में नहीं थीं और हीट इंडेक्स के बजाय केवल तापमान पर आधारित थीं। हालांकि राशन कार्ड जैसे सामाजिक सुरक्षा लाभ अधिकांश के पास थे, लेकिन जलवायु-प्रेरित संकट से निपटने के लिए ये अपर्याप्त साबित हुए। सेवा जैसी संस्थाओं की मदद से महिला विक्रेताओं तक चेतावनियों की पहुंच पुरुषों की तुलना में कुछ बेहतर रही।
स्वास्थ्य संकट और बढ़ता कर्ज
गर्मी का असर सिर्फ आय तक सीमित नहीं रहा। सर्वेक्षण के दूसरे दौर में 79% विक्रेताओं या उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि उन्हें हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और अत्यधिक थकान जैसी समस्याओं के लिए डॉक्टर से संपर्क करना पड़ा। यह आंकड़ा पहले सर्वेक्षण की तुलना में लगभग चार गुना अधिक था। स्वास्थ्य खर्चों और आय में कमी के कारण कर्ज लेने की दर दोगुनी हो गई। महिलाओं पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर रहा। महिला विक्रेताओं में कर्ज में 50% अंक की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पुरुषों में यह वृद्धि 40% अंक रही। पारिवारिक जिम्मेदारियों और देखभाल के अतिरिक्त बोझ ने महिलाओं को अधिक वित्तीय दबाव में डाला।
संकट के बीच प्रशासनिक दबाव भी बढ़ा। पहले सर्वेक्षण दौर में 40 प्रतिशत से अधिक विक्रेताओं ने नगर निगम और पुलिस की ओर से उत्पीड़न की शिकायत की थी, जो दूसरे दौर में बढ़कर 65 प्रतिशत तक पहुंच गई। निष्कासन की दर भी दोगुनी हो गई।कुछ इलाकों में स्थिति अधिक गंभीर रही। जहांगीरपुरी में 92 प्रतिशत, मयूर विहार में 70 प्रतिशत और नरेला में 67 प्रतिशत विक्रेताओं ने निष्कासन या कार्रवाई की शिकायत की। रिपोर्ट के अनुसार, पुरुष विक्रेताओं को अधिक निशाना बनाया गया, संभवतः उनकी सार्वजनिक दृश्यता अधिक होने के कारण।