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Delhi NCR News: यमुना और ड्रेनों की निगरानी अब मोबाइल लैब से कराने की तैयारी
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-फिक्स्ड मॉनिटरिंग और लैब टेस्टिंग की सीमाओं के बीच डीपीसीसी का नया प्रयोग, ग्राउंड कवरेज बढ़ाने का दावा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली में यमुना और प्रमुख ड्रेनों की निगरानी को लेकर अब एक नया प्रयोग शुरू होने जा रहा है। (डीपीसीसी) ने मोबाइल वाटर क्वाॅलिटी मॉनिटरिंग वैन के लिए निविदा प्रक्रिया शुरू की है। यह मौके पर ही पानी की जांच करने में सक्षम होगी। अब तक यह काम मुख्य रूप से स्थायी ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम और लैब आधारित सैंपलिंग के जरिये होता था, जिसमें कई बार देरी और सीमित कवरेज जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं।
दरअसल, अभी तक पानी की गुणवत्ता की निगरानी तय स्थानों पर लगे फिक्स्ड ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम (ओएलएमएस) के जरिए होती थी। ये सिस्टम केवल उन्हीं जगहों का डेटा देते थे, जहां उपकरण स्थापित हैं। इसके अलावा, अधिकारी विभिन्न स्थानों से सैंपल लेकर उन्हें लैब में जांच के लिए भेजते थे। इस प्रक्रिया में समय लगता था, जिससे कई बार प्रदूषण की घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई नहीं हो पाती थी। खासतौर पर छोटे ड्रेनों, औद्योगिक इलाकों और संकरी गलियों में निगरानी लगभग न के बराबर थी। डीपीसीसी के नए प्रस्ताव के अनुसार, मोबाइल लैब इन कमियों को दूर करने का दावा करती है। यह वैन मौके पर ही पानी का सैंपल लेकर तत्काल विश्लेषण कर सकेगी। इससे न केवल रियल-टाइम डेटा मिलेगा, बल्कि अचानक होने वाले प्रदूषण की घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया भी संभव होगी। साथ ही, यह उन इलाकों तक भी पहुंचेगी जो अब तक पारंपरिक मॉनिटरिंग सिस्टम की पहुंच से बाहर थे। दस्तावेज के मुताबिक, यह वैन रैंडम जांच, विशेष निगरानी अभियान और औद्योगिक क्षेत्रों की नियमित जांच में भी उपयोगी होगी ।
प्रदूषण के स्रोतों की पहचान होगी तेजी : विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की मोबाइल लैब से फील्ड स्तर पर निगरानी की क्षमता बढ़ेगी और डेटा संग्रह अधिक व्यापक होगा। इससे प्रदूषण के स्रोतों की पहचान तेजी से हो सकती है और प्रशासनिक कार्रवाई भी अधिक प्रभावी बन सकती है। हालांकि, इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूरे दिल्ली जैसे बड़े शहर के लिए केवल एक मोबाइल वैन कितनी प्रभावी साबित होगी। यमुना में गिरने वाले सैकड़ों ड्रेन और अलग-अलग इलाकों की निगरानी के लिए एक ही यूनिट पर्याप्त नहीं मानी जा रही। इसके अलावा, यह भी स्पष्ट नहीं है कि मोबाइल लैब से प्राप्त डेटा पर कितनी तेजी से कार्रवाई होगी और क्या इससे प्रदूषण नियंत्रण के ठोस परिणाम सामने आएंगे। ऐसे में, मोबाइल मॉनिटरिंग वैन को एक सकारात्मक कदम तो माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल निगरानी का माध्यम है, समाधान नहीं।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली में यमुना और प्रमुख ड्रेनों की निगरानी को लेकर अब एक नया प्रयोग शुरू होने जा रहा है। (डीपीसीसी) ने मोबाइल वाटर क्वाॅलिटी मॉनिटरिंग वैन के लिए निविदा प्रक्रिया शुरू की है। यह मौके पर ही पानी की जांच करने में सक्षम होगी। अब तक यह काम मुख्य रूप से स्थायी ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम और लैब आधारित सैंपलिंग के जरिये होता था, जिसमें कई बार देरी और सीमित कवरेज जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं।
दरअसल, अभी तक पानी की गुणवत्ता की निगरानी तय स्थानों पर लगे फिक्स्ड ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम (ओएलएमएस) के जरिए होती थी। ये सिस्टम केवल उन्हीं जगहों का डेटा देते थे, जहां उपकरण स्थापित हैं। इसके अलावा, अधिकारी विभिन्न स्थानों से सैंपल लेकर उन्हें लैब में जांच के लिए भेजते थे। इस प्रक्रिया में समय लगता था, जिससे कई बार प्रदूषण की घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई नहीं हो पाती थी। खासतौर पर छोटे ड्रेनों, औद्योगिक इलाकों और संकरी गलियों में निगरानी लगभग न के बराबर थी। डीपीसीसी के नए प्रस्ताव के अनुसार, मोबाइल लैब इन कमियों को दूर करने का दावा करती है। यह वैन मौके पर ही पानी का सैंपल लेकर तत्काल विश्लेषण कर सकेगी। इससे न केवल रियल-टाइम डेटा मिलेगा, बल्कि अचानक होने वाले प्रदूषण की घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया भी संभव होगी। साथ ही, यह उन इलाकों तक भी पहुंचेगी जो अब तक पारंपरिक मॉनिटरिंग सिस्टम की पहुंच से बाहर थे। दस्तावेज के मुताबिक, यह वैन रैंडम जांच, विशेष निगरानी अभियान और औद्योगिक क्षेत्रों की नियमित जांच में भी उपयोगी होगी ।
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प्रदूषण के स्रोतों की पहचान होगी तेजी : विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की मोबाइल लैब से फील्ड स्तर पर निगरानी की क्षमता बढ़ेगी और डेटा संग्रह अधिक व्यापक होगा। इससे प्रदूषण के स्रोतों की पहचान तेजी से हो सकती है और प्रशासनिक कार्रवाई भी अधिक प्रभावी बन सकती है। हालांकि, इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूरे दिल्ली जैसे बड़े शहर के लिए केवल एक मोबाइल वैन कितनी प्रभावी साबित होगी। यमुना में गिरने वाले सैकड़ों ड्रेन और अलग-अलग इलाकों की निगरानी के लिए एक ही यूनिट पर्याप्त नहीं मानी जा रही। इसके अलावा, यह भी स्पष्ट नहीं है कि मोबाइल लैब से प्राप्त डेटा पर कितनी तेजी से कार्रवाई होगी और क्या इससे प्रदूषण नियंत्रण के ठोस परिणाम सामने आएंगे। ऐसे में, मोबाइल मॉनिटरिंग वैन को एक सकारात्मक कदम तो माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल निगरानी का माध्यम है, समाधान नहीं।
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