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NCERT: एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक में मनुस्मृति का हवाला, वैदिक काल में महिलाओं को मिले सम्मान को किया रेखांकित

Fri, 26 Jun 2026 01:44 PM IST
Shahin Praveen पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Shahin Praveen Updated Fri, 26 Jun 2026 01:44 PM IST
सार

NCERT: एनसीईआरटी की कक्षा 9वीं की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में मनुस्मृति के एक श्लोक का हवाला दिया गया है, जिसमें वैदिक काल में महिलाओं को मिले सम्मान को दर्शाया गया है। साथ ही पुस्तक में यह भी बताया गया है कि समय के साथ महिलाओं की सामाजिक स्थिति में बदलाव और गिरावट देखने को मिली।

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NCERT book cites Manusmriti to highlight respect for women in Vedic period
NCERT Book - फोटो : अमर उजाला, ग्राफिक

विस्तार

Social Science Textbook: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की नई कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि वैदिक काल में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था, हालांकि समय के साथ उनकी सामाजिक स्थिति में कई बदलाव आए और कुछ अवधियों में उसमें गिरावट भी दर्ज की गई। 

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'1000 ईस्वी तक राज्य और समाज' नामक अध्याय में कहा गया है कि वैदिक काल को "अक्सर एक ऐसे काल के रूप में वर्णित किया जाता है जिसमें महिलाओं ने समाज में उच्च और सम्मानजनक स्थान धारण किया था।"
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महिलाएं उस समय शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करती थीं। कुछ धार्मिक कार्यों और अनुष्ठानों में वे पुरुषों के साथ भी शामिल होती थीं। वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी भाग लेती थीं। ऋग्वेद के कई भजन ऐसे हैं जिन्हें महिला ऋषियों से जोड़ा जाता है। इनमें अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाएं शामिल हैं।
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पाठ्यपुस्तक में आगे कहा गया है: " वैदिक काल के बाद रचित ग्रंथों में भी महिलाओं के प्रति सम्मान की परंपरा स्पष्ट है।  

इसके बाद यह मनुस्मृति 3.56 को उद्धृत करता है: "जहां स्त्री-पुरुषों का सम्मान किया जाता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं; जहां उनका सम्मान नहीं किया जाता, वहां सभी पवित्र अनुष्ठान निष्फल हो जाते हैं।"

घर, खेती और धर्म में महिलाओं की भागीदारी

मनुस्मृति एक पुराना संस्कृत ग्रंथ है जो समाज और कानून से जुड़े नियम बताता है। इसमें जाति और महिलाओं की स्थिति को लेकर लंबे समय से चर्चा और बहस होती रही है।

लेकिन यह भी बताया गया है कि समय के साथ महिलाओं की स्थिति एक जैसी नहीं रही। अलग-अलग समय में समाज और राजनीति में बदलाव के कारण महिलाओं की स्थिति कभी बेहतर हुई और कभी कमजोर भी पड़ गई। फिर भी, कई क्षेत्रों में महिलाएं हमेशा सक्रिय रहीं। वे घर के कामकाज, खेती, हस्तशिल्प और धार्मिक कार्यों में लगातार योगदान देती रहीं।

प्राचीन काल में महिलाओं की सक्रिय भूमिका

अध्याय में बताया गया है कि गुप्त-वाकाटक काल के साहित्य में शिक्षित और कला में कुशल महिलाओं का वर्णन मिलता है। ऐतिहासिक अभिलेखों से भी पता चलता है कि कई रानियों ने शासन चलाने और धार्मिक कार्यों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसमें वाकाटक साम्राज्य की शासक प्रभावती गुप्त का उदाहरण दिया गया है। वहीं, संगम साहित्य में महिलाओं को समाज और अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदार के रूप में दिखाया गया है। अध्याय में यह भी बताया गया है कि प्रारंभिक वैदिक समाज में लोगों की सामाजिक पहचान केवल जन्म के आधार पर तय नहीं होती थी, बल्कि अन्य कारकों का भी महत्व था।

किताब में कहा गया है, "प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों में जन्म के आधार पर निर्धारित किसी निश्चित सामाजिक स्थिति का उल्लेख नहीं है। इसके बजाय, यह आम तौर पर माना जाता है कि सामाजिक पहचान कई जटिल और परस्पर जुड़े कारकों द्वारा आकार लेती थी, जिनमें जातीयता, उपसमूह, क्षेत्र, ग्राम संबद्धता, भाषा, व्यवसाय और विशेष रूप से सांस्कृतिक संबंध शामिल हैं।"

पुस्तक में कहा गया है कि ऋग्वेद के साक्ष्य एक ही परिवार के भीतर भी व्यावसायिक विविधता की ओर इशारा करते हैं, और एक भजन का हवाला देते हुए कहा गया है: "मैं एक कवि हूं; मेरे पिता एक चिकित्सक हैं; मेरी माता अनाज पीसने वाली हैं।"

समाज में अलग-अलग कामों के लिए बनी वर्ण व्यवस्था

पाठ्यपुस्तक के अनुसार, समय के साथ समाज में चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) की अलग-अलग भूमिकाएं तय हो गईं। लेकिन शुरुआत में इन वर्णों को कठोर सामाजिक श्रेणियों के रूप में नहीं, बल्कि लोगों के कार्यों और जिम्मेदारियों के आधार पर समझा गया था।

अर्थात, प्रारंभिक दौर में वर्ण व्यवस्था का उद्देश्य समाज में कामों का बंटवारा करना था, न कि लोगों को सख्ती से अलग-अलग वर्गों में बांटना।
 
"इस प्रकार, वर्ण की अवधारणा मूल्यों की एक ऐसी प्रणाली पर आधारित थी जिसमें ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया था, उसके बाद राजनीतिक शक्ति और धन का स्थान आता था।"

इसमें बौद्ध ग्रंथ सुत्त निपाता का हवाला देते हुए इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सामाजिक प्रतिष्ठा जन्म के बजाय कर्मों पर निर्भर करती है।

वर्ण और जाति हमेशा कठोर नहीं थे

"कोई भी व्यक्ति जन्म से अछूत नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों के कारण होता है। ब्राह्मण अपने कर्मों के कारण अछूत बनता है।"

अध्याय में बताया गया है कि समय के साथ अलग-अलग समुदायों के लोगों के बीच विवाह संबंध बने और विभिन्न क्षेत्रों की परंपराओं व सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आए। इन कारणों से समाज में जाति नाम की एक नई सामाजिक व्यवस्था विकसित हुई।

"वर्णों की संख्या चार तय थी, लेकिन जातियों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं था। जैसे-जैसे नए सामाजिक समूह और व्यवसाय विकसित हुए, जातियों की संख्या बढ़ती गई।"

पाठ्यपुस्तक में यह भी उल्लेख किया गया है कि वर्ण और जाति "हमेशा से कठोर सामाजिक श्रेणियां नहीं थीं" और इसमें विविध सामाजिक पृष्ठभूमि के शासकों के उदाहरण और बाद के काल के शिलालेखों में व्यावसायिक गतिशीलता के प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं।

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