क्या चुनावों के बीच हिट हो पाएंगी ये फिल्में
जब चुनावों की गहमा-गहमी के बाद दिल्ली में नई सरकार जश्न मना रही होगी, तब जून के पहले हफ्ते में सोनाक्षी सिन्हा की दो फिल्में एक साथ दर्शकों के सामने होंगी। वे अजय देवगन के साथ प्रभुदेवा निर्देशित ‘एक्शन जैक्सन’ में एक ओर ‘सन ऑफ सरदार’ की सफलता दुहराने की कोशिश करती दिखेंगी।
दूसरी ओर हिंदी सिनेमा को 100 करोड़ का स्वाद देने वाले ‘गजनी’ के निर्देशक ए. आर. मुरुगदास की टाइटिल से ही विवादों में घिरी ‘हॉलीडे’ में अक्षय कुमार का साथ दे रही होंगी। इन दोनों फिल्मों का असर कमजोर पड़ने के पहले ही साजिद खान की सैफ अली खान, रितेश देशमुख, बिपाशा स्टारर ‘हमशक्ल’ दर्शकों को मिल जाएगी।
ठीक चुनावों के खत्म होते ही महंगे सितारों की मंहगी फिल्मों का एक साथ आना क्या सिर्फ संयोग है या फिर सिनेमा का यह भय कि लोकतंत्र के महापर्व के सामने दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाएंगे।
क्या चल पाएगा आम आदमी का मोहरा
सितारों के लिहाज से देखें, तो वर्ष की शुरुआत से ही सलमान खान की ‘जय हो’ के अलावा किसी ने भी इस चुनावी वर्ष में दर्शकों को दिग्भ्रमित करने की कोशिश नहीं की।
सलमान ‘जय हो’ को भी लाने की हिम्मत शायद इसलिए जुटा पाए कि कहीं न कहीं उम्मीद थी कि भारतीय राजनीति में `आम आदमी' के लोकप्रिय मुहावरे की मदद बॉक्स ऑफिस पर भी मिल जाएगी।
वास्तविक राजनीति में आम आदमी का मजाक बनते देखने वाले दर्शक परदे पर भी उसे स्वीकार नहीं कर सके। हिट मशीन में तब्दील हो चुके सलमान के इस हश्र में सलमान ने ही नहीं, 100 करोड़ की प्रत्याशा में लगी तमाम फिल्मों ने चेतावनी महसूस की और आम चुनाव और आम जनता के बीच नहीं आने में ही भलाई समझी।
पिछले बार चुनाव ने किया था कबाड़ा
शायद यह चेतावनी सिनेमा को 2009 के आम चुनाव के समय अपने सितारों के हश्र से भी मिली हो। 2009 में भी आम चुनाव 16 अप्रैल से 13 मई के मध्य हुए थे और कमाल यह कि उस दौरान रिलीज ‘चांदनी चौक टु चाइना’, `बिल्लू’, `दिल्ली-6’, `लक बाय चांस’, `8x10 तस्वीर’ जैसी सभी बड़ी फिल्में बुरी तरह फ्लॉप रहीं।
यानि अक्षय कुमार, शाहरुख खान, इरफान खान, अभिषेक बच्चन, फरहान अख्तर, दीपिका, करीना कपूर किसी को भी आम चुनाव की गहमा-गहमी के बीच दर्शकों ने तरजीह नहीं दी।
वैसे चुनौतियों के सामने पीठ दिखाना हिंदी सिनेमा का सामान्य स्वभाव है। चाहे विषय हो या प्रस्तुति या फिर कलाकार, सिनेमा दर्शकों की पसंद का निर्वाह करने की कोशिश करती है, उनके सौंदर्यबोध को चुनौती देने का जोखिम नहीं उठाती।
कई कारणों से पिटता है सिनेमा
आश्चर्य नहीं कि व्यवसाय के मामले में भी दर्शकों की प्राथमिकताओं से मुकाबले का आत्मविश्वास यह नहीं जुटा पाती। आम चुनाव तो एक महत्वपूर्ण अवसर हैं भी, जिससे देश का भविष्य जुड़ा है।
मामला रमजान के महीने का हो या फिर आईपीएल के तमाशे या फिर फुटबाल विश्व कप का या जन भागीदारी के किसी और अवसर का, हिंदी सिनेमा किनारे हो जाता है।
कहीं न कहीं सिनेमा को यह अहसास है कि मनोरंजन के लिए दर्शकों के सामने वह बस एक विकल्प भर ही है। इस चुनावी दौर में रिलीज हो रही फिल्मों को देखकर उसी विकल्प का अहसास होता है।
फिल्में तो रिलीज हो रहीं हैं, लेकिन वैसी फिल्में जिनका लक्ष्य 100 करोड़ का नहीं है। उल्लेखनीय है कि इस दौर में वैसी ही फिल्मों के मौके मिल रहे हैं, जिसमें किसी सितारे की विश्वसनीयता दांव पर नहीं लगी है।
अभी तक ठंडा ही रहा है साल
कहने को ‘गुंडे’ भले ही बड़ी फिल्म थी, लेकिन प्रियंका चोपड़ा, रणबीर सिंह और अर्जुन कपूर की इस फिल्म के लगभग 55 करोड़ के व्यवसाय के बाद मान लिया गया कि फिल्म हिट हो गई।
संतोष की बात है कि सिनेमा के व्यवसाय के लिए भले ही यह समय बेहतर नहीं माना जा रहा हो, बेहतर सिनेमा के लिए यह अवश्य ही बेहतर समय है। उसे अधिक स्क्रीन और बेहतर थियेटर मिल रहे हैं, सितारों की भीड़ के सामने जिसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी।
‘हाइवे’ और ‘क्वीन’ जैसी फिल्में यदि सही तरीके से व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच सकीं और उनका सही मूल्यांकन हो सका, तो इसका कारण इन्हें मिले मौके ही थे।
यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी कि गायिका मोनाली ठाकुर की मुख्य भूमिका वाली नागेश कुकनूर की फिल्म ‘लक्ष्मी’ और रजत कपूर की संवेदनशील फिल्म ‘आंखों देखी’ की दर्शकों द्वारा नोटिस ली जाएगी, लेकिन मिले अवसर का लाभ इन फिल्मों ने उठाया और दर्शकों को प्रभावित करने में सफल रहीं।
चुनाव के पहले की फिल्में भी नहीं चलीं
उल्लेखनीय है कि आम चुनाव से सहमे व्यावसायिक सिनेमा के इस समय में बॉक्स ऑफिस लोकप्रिय सितारों से अप्रभावित दिख रहा है। फरहान अख्तर और विद्या बालन की ‘शादी के साइड इफेक्ट’, माधुरी और जूही की बहुचर्चित ‘गुलाब गैंग’, सोनम कपूर, आयुष्मान खुराना और ऋषि कपूर की ‘बेवकूफियां’, अली जफर की ‘टोटल स्यापा’ को लोकप्रिय चेहरों के बावजूद कोई तवज्जो नहीं मिल पाती।
जबकि कंगना रनोट अकेले दम पर ‘क्वीन’ को लगातार तीन हफ्तों तक टॉप पर रख सकती है। वास्तव में कह सकते हैं कि चुनावी व्यस्तता के इस दौर में थियेटर तक सिर्फ सिनेमा के जेनुइन दर्शक पहुंच रहे हैं, जिनकी प्राथमिकता सिनेमा है। जाहिर है सितारों को भीड़ चाहिए, दर्शक नहीं और भीड़ तो अभी चुनावों में व्यस्त है।
(लेखक जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं)
