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अपने ही बयान से विवादों में घिर जाते थे ओम पुरी, फिर फूट-फूटकर रोते थे
अतुल सिन्हा
Updated Sat, 06 Jan 2018 05:02 PM IST
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आज के दौर में बेशक समानांतार सिनेमा पर बहस या चर्चा बेमानी हो, लेकिन इस दौर से निकला जो एक किरदार लंबे समय तक सिल्वर सक्रीन पर राज करता रहा वो बेहद सहज और ज़िंदादिल ओम पुरी ही था। उनके गुज़रने से कुछ महीने पहले इस संवेदनशील कलाकार को देश ने फूट फूट कर रोते देखा था।
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देश ने ओम पुरी को ‘तमस’ से पहचाना। भीष्म साहनी के इस शानदार उपन्यास में सांप्रदायिक ताकतों और सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ सियासी ताने बाने को जिस खूबसूरती से बुना गया, और जिस तरह दूरदर्शन पर यह धारावाहिक चर्चित हुआ, उसमें मुख्य किरदार ओम की अदाकारी का ही कमाल था।
फिर तो बिहार और पश्चिम बंगाल के भूमि संघर्ष और पुलिस उत्पीड़न के साथ साथ सियासत और अपराध के गठजोड़ पर जो फिल्में उस दौर में बनीं, उसके लिए लोगों को सबसे बेहतर किरदार ओम ही लगते थे। अपनी आवाज़ की बदौलत, अपनी संवाद अदायगी की वजह से, आंखों और चेहरे की अपनी सख्ती की वजह से।
फिर तो बिहार और पश्चिम बंगाल के भूमि संघर्ष और पुलिस उत्पीड़न के साथ साथ सियासत और अपराध के गठजोड़ पर जो फिल्में उस दौर में बनीं, उसके लिए लोगों को सबसे बेहतर किरदार ओम ही लगते थे। अपनी आवाज़ की बदौलत, अपनी संवाद अदायगी की वजह से, आंखों और चेहरे की अपनी सख्ती की वजह से।
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लेकिन ओम पुरी निजी ज़िंदगी में कितने सहज थे, इसका अंदाज़ा उनसे मिलने के बाद पता चलता था। कुछ साल पहले जब समानांतर और व्यावसायिक हिन्दी सिनेमा पर एक सेमिनार में हिस्सा लेने वो इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आए तो उन्होंने वहां बैठे तमाम कथित बुद्धिजीवियों पर चुटकी ली।
कहने लगे ‘सिनेमा तो सिनेमा है, इसे कला सिनेमा, समानांतर सिनेमा या व्यावसायिक सिनेमा तो बुद्धिजीवी लोग बना देते हैं। हम कलाकारों के लिए किरदार और कहानी अहम है। हम अपना काम करते हैं लेकिन आप उसे खांचे में बांट देते हैं।’
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ओम पुरी के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अपने घर जैसा था। अक्सर वो वहां आते थे। इसलिए कि यहां से उनका गहरा नाता रहा और यहीं से उन्हें पहचान भी मिली। यहां के बड़े नाट्य समारोहों में ओम भले ही कुछ देर के लिए सही, आते ज़रूर थे।
इसी दौरान उनके साथ एक बार एनएसडी की घास पर बैठ कर बातें हुईं और लेकिन चंद ही पल में लोगों ने ऐसा घेरा कि वो कहने लगे, अरे भई, बड़े बड़े कलाकार हैं, मैं तो कुछ भी नहीं। बस नाटकों में अपनी गहरी दिलचस्पी शुरू से रही है, इसलिए यहां भागा चला आता हूं।
इसी दौरान उनके साथ एक बार एनएसडी की घास पर बैठ कर बातें हुईं और लेकिन चंद ही पल में लोगों ने ऐसा घेरा कि वो कहने लगे, अरे भई, बड़े बड़े कलाकार हैं, मैं तो कुछ भी नहीं। बस नाटकों में अपनी गहरी दिलचस्पी शुरू से रही है, इसलिए यहां भागा चला आता हूं।
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एक बार एक चैनल के लिए रंगमंच से जुड़ा एक कार्यक्रम बनाने के दौरान ओम पुरी से कई बार फोन पर बात हुई। खासियत ये कि अगर आप उन्हें फोन करें तो कॉल बैक वो ज़रूर करते। कभी खुद को बड़ा नहीं माना। कार्यक्रम के सिलसिले में जानकर उत्साहित हुए और कहने लगे, कहां आजकल टीवी वाले रंगमंच और थिएटर पर कार्यक्रम बनाते हैं, इसमें मसाला तो होता नहीं...
फिर एक ज़ोरदार ठहाका लगाया फिर कहने लगे... आपका चैनल तो बहुत पैसे वालों का है, कुछ हमें भी मिलेगा क्या, फिर ठहाका लगाया और कहा, यार मैं मज़ाक कर रहा था... दिल्ली आ रहा हूं तब आराम से बात करते हैं, मेरे पास बहुत कुछ है कहने को थिएटर के बारे में। बहरहाल वो मौका नहीं आया।
फिर एक ज़ोरदार ठहाका लगाया फिर कहने लगे... आपका चैनल तो बहुत पैसे वालों का है, कुछ हमें भी मिलेगा क्या, फिर ठहाका लगाया और कहा, यार मैं मज़ाक कर रहा था... दिल्ली आ रहा हूं तब आराम से बात करते हैं, मेरे पास बहुत कुछ है कहने को थिएटर के बारे में। बहरहाल वो मौका नहीं आया।