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Exclusive: ‘वही करना चाहती हूं जो पहले कभी न किया हो’, महिला केंद्रित फिल्मों पर माधुरी दीक्षित ने रखी राय

Fri, 19 Jun 2026 09:02 AM IST
Kiran Vinod Kumar Jain Kiran Vinod Kumar Jain
Updated Fri, 19 Jun 2026 09:02 AM IST
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सार
Madhuri Dixit Exclusive Interview: तीन दशक से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन माधुरी दीक्षित आज भी उन कलाकारों में शुमार हैं जिन्होंने हर दौर में खुद को बदलकर दिखाया।
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Madhuri Dixit Exclusive Interview: Maa Behen Movie actress talks about her career and Movies
माधुरी दीक्षित - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

माधुरी दीक्षित इन दिनों हालिया रिलीज फिल्म 'मां बहन' को लेकर चर्चा में हैं। अमर उजाला से हुई इस खास बातचीत में उन्होंने सिर्फ आज के दौर पर ही बात नहीं की, बल्कि उस दौर को भी याद किया जब इंडस्ट्री में उन्हें सुनना पड़ता था कि ‘ये लड़की नहीं चलेगी।’ संघर्ष, स्टारडम और बदलते सिनेमा पर अभिनेत्री ने काफी कुछ कहा...

माधुरी दीक्षित
माधुरी दीक्षित - फोटो : इंस्टाग्राम-@madhuridixitnene

मां की बात हमेशा याद रही
करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए माधुरी ने बताया, ‘जब मैंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी, तब मैं उस दौर की बनी-बनाई हीरोइनों जैसी नहीं दिखती थी। इस वजह से कई बातें होती थीं। लोग कहते थे ये बहुत पतली है, ये कैसे चलेगी? नहीं हो पाएगा। लेकिन उस वक्त मेरी मां मेरे साथ खड़ी रही। वो हमेशा एक बात कहती थीं कि लोग आज जिस चीज के लिए तुम्हारी आलोचना कर रहे हैं, कल वही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बनेगी।’

लोगों ने मन में डाली असुरक्षाएं 
जब माधुरी से पूछा गया कि क्या कभी उन्होंने खुद असुरक्षा महसूस की? तो अभिनेत्री ने कहा, ‘आज मैं खुद के साथ पूरी तरह सहज हूं। लेकिन असुरक्षाएं तब थीं जब मैंने नया-नया काम शुरू किया था। उस समय कुछ लोगों ने मेरे मन में असुरक्षाएं डालने की कोशिश की थी। लेकिन मेरी मां चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ी थीं। वो हर बार मेरी हर असुरक्षा को वहीं खत्म कर देती थीं।’ 

'मां बहन' में माधुरी दीक्षित
'मां बहन' में माधुरी दीक्षित - फोटो : साभार-@imdb

हीरो की फिल्म को कोई नाम नहीं देता 
हिंदी सिनेमा में महिलाओं को लेकर बदलती सोच पर बात करते हुए माधुरी ने एक ऐसा सवाल उठाया, जिस पर इंडस्ट्री में बहस हो सकती है। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है 'मां बहन' जैसी फिल्में इस बात का संकेत हैं कि अब चीजें बदल रही हैं। आज हमारे पास ऐसे लेखक और निर्देशक हैं जो महिलाओं को कहानी के केंद्र में रखकर काम कर रहे हैं। लेकिन एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आती। जब किसी हीरो की फिल्म आती है तो कोई उसे अलग नाम नहीं देता, लेकिन जैसे ही हीरोइन कहानी के केंद्र में होती है, फिल्म को तुरंत 'फीमेल सेंट्रिक' कह दिया जाता है। आखिर ऐसा क्यों?

मैं कभी एक जैसी रही ही नहीं
फिल्म ‘मां बहन’ के बाद कहा जा रहा है कि क्या माधुरी अपनी एक नई पहचान गढ़ रही हैं? इसके जवाब में एक्ट्रेस ने कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है। जब लोग मुझे धक धक गर्ल कहते थे, तब भी मैंने 'मृत्युदंड’, ‘पुकार’ और ‘लज्जा’ जैसी फिल्में की थीं। मैं हमेशा वही करना चाहती हूं जो मैंने पहले कभी न किया हो। यही चीज मुझे आगे बढ़ाती है। मैं हमेशा खुद को बदलते रहना चाहती हूं। अगर लोगों को अब ऐसा लग रहा है तो मुझे खुशी है।’

माधुरी दीक्षित
माधुरी दीक्षित - फोटो : इंस्टाग्राम@madhuridixitnene

बचपन का अनुभव फिल्म से जुड़ गया
फिल्म के सामाजिक पहलू पर बात करते हुए माधुरी ने बचपन की एक याद साझा की। उन्होंने कहा, ‘हम बहुत जल्दी लोगों को देखकर राय बना लेते हैं। मुझे याद है हमारे अपार्टमेंट में नीचे एक महिला रहती थीं। वो अकेली रहती थीं, साड़ी पहनती थीं, चश्मा लगाती थीं, होली खेलना पसंद नहीं था, दिवाली पर बाहर नहीं आती थीं। बहुत निजी जिंदगी जीती थीं और घर की खिड़कियां भी बंद रहती थीं। फिर लोग कहते थे उनसे बात मत करना, उनके पास मत जाना। हम बच्चे खिड़की से झांककर सोचते थे कि आखिर ऐसा क्या रहस्य है। मुझे लगता है जिस चीज को हम समझ नहीं पाते, उसके बारे में हम अपनी तरफ से कहानी बनाना शुरू कर देते हैं। जब मैंने यह स्क्रिप्ट सुनी तो मुझे लगा यह फिल्म तो मुझे करनी ही है।’

'मां बहन'
'मां बहन' - फोटो : साभार-@imdb

सिर्फ कहानी लोगों को थिएटर तक खींचती है 
बदलते सिनेमा पर माधुरी ने कहा, ‘मुझे लगता है दोनों दौर आसान नहीं हैं। बड़े पर्दे की फिल्म बनाते वक्त सबसे बड़ा दबाव यही होता है कि वह हर तरह के दर्शकों को पसंद आए। अलग-अलग सोच, अलग-अलग तबके, अलग-अलग माहौल..., सबको जोड़ना पड़ता है, तभी लोग थिएटर तक आते हैं। लेकिन अब जो बदलाव आया है, उसने फिल्म बनाने वालों को खुलकर काम करने का मौका दिया है।
अब कहानियां किसी तय ढांचे में बंधकर नहीं बन रहीं। भारत जैसे देश में कहानियां ही कहानियां हैं। मां बहन को दुनिया भर में लोग देख रहे हैं और अलग-अलग देशों की महिलाओं ने इसके किरदारों से खुद को जोड़ा है। मुझे लगता है अब वही फिल्में ज्यादा जरूरी हैं जो सच बोलती हैं और लोगों को अपने जैसा महसूस कराती हैं।’

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