‘मेरे लिए शोहरत सफलता का पैमाना नहीं’, सुभाष घई ने बताया कैसे मनाते हैं जन्मदिन; इस फिल्म को बताया सबसे खास
Subhash Ghai Interview: दिग्गज निर्देशक सुभाष घई आज 83 साल के हो गए हैं। इस मौके पर जानिए जन्मदिन को लेकर उन्होंने क्या कुछ बताया…
विस्तार
‘हीरो’, ‘कर्मा’, और ‘परदेस’ जैसी फिल्मों से भारतीय सिनेमा को नई पहचान देने वाले निर्देशक सुभाष घई आज अपना 83वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस खास मौके पर उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में अपने जीवन के अनुभव, सिनेमा की बदलती दुनिया, नई पीढ़ी से जुड़ाव और लगातार सीखते रहने की अपनी सोच को साझा किया। निर्देशक की जुबानी पढ़िए उन्होंने क्या कुछ कहा।
मेरे लिए जन्मदिन एक निजी संवाद
अपने जन्मदिन को लेकर निर्देशक ने कहा कि 83 साल की उम्र में भी हर जन्मदिन मेरे लिए आत्मचिंतन का दिन होता है। मेरे लिए जन्मदिन का मतलब है सुबह ईश्वर का धन्यवाद और शाम को परिवार या मित्रों के साथ समय। केक और मोमबत्तियां आजकल हमारी परंपरा बन गई हैं। मेरा जन्मदिन मेरे लिए एक निजी संवाद है। बचपन में मां ने सिखाया था कि पहले खुद को बेहतर बनाओ, फिर परिवार, समाज के लिए कुछ करो। मेरे लिए पैसा या शोहरत कभी सफलता का पैमाना नहीं रहे। मेरी असली कमाई ज्ञान का दान है। इसलिए आज भी मैं 18 से 20 साल के युवाओं के बीच बैठता हूं। हमारे संस्थान में 1100 बच्चे पढ़ते हैं और मैं हर एक से आराम से बात कर सकता हूं। यह मेरे लिए ईश्वर का वरदान है।
ऐसे जागा मेरे अंदर कहानीकार
‘नाथद्वारा में जन्म फिर दिल्ली और जोधपुर में पढ़ाई और स्कूल के नाटकों ने मेरी दुनिया गढ़ी। चंद्रकांता, संतति, भूतनाथ जैसी किताबों ने मेरे भीतर कहानीकार जगाया। पिता ने कहा कि अगर शौक है तो ट्रेनिंग लो। 23 साल की उम्र में मुंबई आया। अभिनय सीखा। फिर वर्ल्ड सिनेमा ने सिखाया कि हर देश अपनी संस्कृति फिल्मों से दिखाता है। तभी सोचा कि भारत की कहानियां भी दुनिया को दिखनी चाहिए।’
‘कालीचरण’ ने मेरी किस्मत बदल दी
‘कालीचरण फिल्म को 50 साल पूरे हो गए। मेरे जीवन की किस्मत बदलने वाली फिल्म थी। यह फिल्म मेरे लिए एक टर्निंग पॉइंट थी। किसी ने मुझसे कहा कि तुम कहानी ऐसे सुनाते हो जैसे फिल्म दिखा रहे हो, तो डायरेक्शन क्यों नहीं करते। मैंने कहा कि मुझे डायरेक्शन नहीं आती। उन्होंने कहा कि सीख लो। वहां से मेरी यात्रा शुरू हुई।’
‘ब्लैक एंड व्हाइट’ मेरे दिल के सबसे करीब
‘मेरी कई फिल्मों में से ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ मेरे दिल के सबसे करीब है। यह फिल्म मेरी कमर्शियल फिल्मों से अलग थी। यह इंसानियत और जिम्मेदारी की कहानी थी। अगर मेरी फिल्मों ने किसी के दिल को छूकर उसकी सोच बदली, तो वही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैंने जितने भी कलाकार लॉन्च किए, सबमें एक बात समान थी कि वे अपने दौर की नब्ज समझते थे। आज की पीढ़ी तेज, तकनीक-समझदार और जागरूक है।’
अच्छा काम हमेशा याद रह जाता है
‘मुझे इस बात की इच्छा नहीं कि आने वाली पीढ़ियां मुझे याद रखें। बस इतना चाहता हूं कि मेरी फिल्में अपने समय को कुछ दिशा दें। 35 साल दिशा निर्देशन, 50 साल सिनेमा की पढ़ाई और 25 साल अध्यापन के बाद एक बात पक्की समझ में आई है, लोग बदल जाते हैं, इतिहास बदलता रहता है, लेकिन अच्छा काम हमेशा याद रह जाता है। ‘मदर इंडिया’, ‘मुगल-ए-आजम’ ‘आवारा’ या मनोज कुमार और देव आनंद साहब के काम आज भी इसलिए याद हैं, क्योंकि वे अपने समय की सच्चाई थे।’
AI दिमाग है, दिल नहीं
‘83 साल की उम्र में भी मैं एआई सीख रहा हूं। लोग पूछते हैं कि इससे क्रिएटिविटी बदल जाएगी क्या? मैं कहता हूं कि एआई रिसर्च आसान कर सकती है, आइडिया दे सकती है, लेकिन महसूस नहीं कर सकती। फिल्ममेकिंग दिल की प्रक्रिया है। भावना मशीन नहीं दे सकती।
भारत की शिक्षा बदलनी चाहिए
‘मेरी 83वें जन्मदिन की एक ही इच्छा है कि भारत की शिक्षा प्रणाली में बदलाव आए। मैं चाहता हूं कि स्कूलों में सिर्फ पढ़ाई नहीं, बच्चों की असली प्रतिभा पहचानी जाए। हमारे बच्चे बहुत टैलेंटेड हैं, लेकिन दबाव में दब जाते हैं। अगर सरकारी और निजी संस्थाएं मिलकर उन्हें सही दिशा दें, तो ये बच्चे दुनिया बदल सकते हैं। मैं इस क्षेत्र में जरूर कुछ करना चाहूंगा।’