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‘तस्करी’ के निर्देशक ने साझा किए एयरपोर्ट पर शूटिंग के अनुभव; इमरान की तारीफ में बोले- ‘उन्होंने चुप रहकर..’
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: आराध्य त्रिपाठी
Updated Tue, 20 Jan 2026 07:00 AM IST
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सार
Raghav M Jairath Interview: इमरान हाशमी अभिनीत हालिया रिलीज वेब सीरीज ‘तस्करी: द स्मगलर्स वेब’ का निर्देशन राघव एम जैरथ ने किया है। राघव ने अमर उजाला से बातचीत में इस वेब सीरीज और इमरान की एक्टिंग पर चर्चा की।
राघव एम जैरथ और इमरान हाशमी
- फोटो : X
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विस्तार
राघव बताते हैं कि इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसकी रिसर्च है। एयरपोर्ट जैसे लाइव लोकेशन्स पर हुई शूटिंग ने इस कहानी को ज्यादा असल बनाया है। अमर उजाला से बातचीत में राघव ने बताया कि इस सीरीज को बनाना चुनौतीपूर्ण और जरूरी क्यों था?
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जो कहानियां सुनीं, उन्हें वैसे ही दिखाना मुमकिन नहीं था
ये कहानी पूरी तरह रियल गोल्ड स्मगलिंग नेटवर्क से निकली है। सच कहूं तो हमारी रिसर्च ने हमें खुद हिला कर रख दिया। हमने कई कस्टम अधिकारियों से बातचीत की और जो कहानियां सामने आईं, वो इतनी चौंकाने वाली थीं कि कई बार ये तय करना मुश्किल हो गया कि कौन सी सच्चाई दिखाई जाए और कौन सी छुपाई जाए?
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सबसे बड़ा झटका तब लगा जब ये समझ आया कि स्मगलिंग सिर्फ गोल्ड तक सीमित नहीं है। ये एक पूरा बिजनेस मॉडल है, जिसमें अमीर लोग अपने स्टेटस और लाइफस्टाइल के लिए गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। यहां तक कि अपने बच्चों के लिए लग्जरी चीजों के साथ-साथ एक्सोटिक जानवरों तक को मंगवाया जाता है।
कस्टम वाले हर बार नए तरीकों से इन्हें पकड़ने की कोशिश करता है, जबकि स्मगलर्स हर बार नया रास्ता निकाल लेते हैं। बाहर से ये सब किसी थ्रिलर जैसा लगता है, लेकिन हकीकत में ये बेहद खतरनाक क्राइम की दुनिया है।
राघव एम जैरथ और नीरज पांडे
- फोटो : सोशल मीडिया
क्राइम के नतीजे भी ईमानदारी से दिखाने पड़ते हैं
जब आप किसी रियल क्राइम और रियल नेटवर्क पर कहानी बना रहे होते हैं, तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होती है कि शो किसी भी तरह से क्राइम को ग्लैमराइज न करे। ये हमारे लिए सबसे बड़ा चैलेंज भी था। हम ऐसी जमीन पर काम कर रहे थे जहां पावर, पैसा और सिस्टम तीनों साथ चलते हैं।
अगर आप क्राइम को बड़ा दिखाते हैं, तो उसके नतीजे भी उतनी ही ईमानदारी से दिखाने पड़ते हैं। इसलिए हमने कभी भी क्राइम को जश्न की तरह पेश नहीं किया। शो में एक्शन जरूर है, लेकिन वो स्मगलर्स का नहीं बल्कि सिस्टम और कस्टम्स अधिकारियों का है। यही बैलेंस बनाना सबसे मुश्किल भी था और सबसे संतोषजनक भी।
एयरपोर्ट पर शूटिंग कम, रियल टाइम सर्वाइवल ज्यादा
इस वेब सीरीज को बनाते वक्त सबसे बड़ा ऑन ग्राउंड चैलेंज एयरपोर्ट पर शूट करना रहा। एयरपोर्ट ऐसी जगह है जहां फ्लाइट्स को रोका नहीं जा सकता और सब कुछ रियल टाइम में चलता है। आपको उसी सिस्टम के साथ खुद को ढालना पड़ता है।
जहां आम तौर पर एक सीन के लिए दो या तीन घंटे मिल जाते हैं, वहीं कई बार हमें वही सीन एक घंटे के अंदर शूट करना पड़ा। पैसेंजर्स की मौजूदगी, सेफ्टी, हैंडलिंग और परमिशन.. हर चीज का ध्यान रखना पड़ता था। कई बार शूट से पहले ही तीन-चार घंटे सिर्फ कोऑर्डिनेशन में निकल जाते थे। यही वजह है कि एयरपोर्ट सीक्वेंस स्क्रीन पर इतने रॉ और रियल लगते हैं।
जब आप किसी रियल क्राइम और रियल नेटवर्क पर कहानी बना रहे होते हैं, तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होती है कि शो किसी भी तरह से क्राइम को ग्लैमराइज न करे। ये हमारे लिए सबसे बड़ा चैलेंज भी था। हम ऐसी जमीन पर काम कर रहे थे जहां पावर, पैसा और सिस्टम तीनों साथ चलते हैं।
अगर आप क्राइम को बड़ा दिखाते हैं, तो उसके नतीजे भी उतनी ही ईमानदारी से दिखाने पड़ते हैं। इसलिए हमने कभी भी क्राइम को जश्न की तरह पेश नहीं किया। शो में एक्शन जरूर है, लेकिन वो स्मगलर्स का नहीं बल्कि सिस्टम और कस्टम्स अधिकारियों का है। यही बैलेंस बनाना सबसे मुश्किल भी था और सबसे संतोषजनक भी।
एयरपोर्ट पर शूटिंग कम, रियल टाइम सर्वाइवल ज्यादा
इस वेब सीरीज को बनाते वक्त सबसे बड़ा ऑन ग्राउंड चैलेंज एयरपोर्ट पर शूट करना रहा। एयरपोर्ट ऐसी जगह है जहां फ्लाइट्स को रोका नहीं जा सकता और सब कुछ रियल टाइम में चलता है। आपको उसी सिस्टम के साथ खुद को ढालना पड़ता है।
जहां आम तौर पर एक सीन के लिए दो या तीन घंटे मिल जाते हैं, वहीं कई बार हमें वही सीन एक घंटे के अंदर शूट करना पड़ा। पैसेंजर्स की मौजूदगी, सेफ्टी, हैंडलिंग और परमिशन.. हर चीज का ध्यान रखना पड़ता था। कई बार शूट से पहले ही तीन-चार घंटे सिर्फ कोऑर्डिनेशन में निकल जाते थे। यही वजह है कि एयरपोर्ट सीक्वेंस स्क्रीन पर इतने रॉ और रियल लगते हैं।
इमरान हाशमी तस्करी के एक सीन में
- फोटो : सोशल मीडिया
सेट पर तैयारी से आते थे इमरान
जब हमने इमरान को इस किरदार की कहानी सुनाई, तो शुरू में अंदाजा नहीं था कि वो इसे इतनी जल्दी और इतनी गहराई से समझ लेंगे। करीब पैंतालीस मिनट की बातचीत के बाद ही साफ हो गया था कि वो इस रोल को सिर्फ निभाने नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी की तरह लेने वाले हैं।
इमरान हर सीन में पूरी तैयारी के साथ आते थे। वो सिर्फ डायलॉग याद करके सेट पर नहीं आते थे, बल्कि एक कस्टम्स ऑफिसर की बॉडी लैंग्वेज, टाइमिंग, एयरपोर्ट के बीच मूवमेंट और लोगों को देखने-समझने के तरीके को गहराई से स्टडी कर चुके थे। वो लगातार पूछते रहते थे कि किसी सिचुएशन में ऑफिसर क्या सोचेगा? सामने वाले को कैसे पढ़ेगा? और खुद को कैसे कंट्रोल में रखेगा?
इमरान ने चुप रहकर किरदार को खास बनाया
मेरे लिए सबसे खास बात ये थी कि इमरान कभी भी किसी सीन को हल्के में नहीं लेते थे। हर सीन के पीछे उनका एक साफ मकसद होता था। कई बार बिना स्क्रिप्ट बदले, सिर्फ एक्सप्रेशंस और आंखों से ही उन्होंने सीन को इतना असरदार बना दिया कि मैं खुद मॉनिटर के सामने रुक गया। उनका किरदार ज्यादा शो नहीं करता। इमरान ने चुप रहकर इस किरदार को खास बनाया है।
उन्होंने इस किरदार के लिए कई छोटी-छोटी चीजें नोटिस की थीं। इन बातों पर आम आदमी ध्यान नहीं देता लेकिन एक कस्टम ऑफिसर सामने वाले के हाव-भाव से ही पूरी कहानी पढ़ लेता है। मुझे ये देखकर हैरानी होती थी कि इमरान सिर्फ रोल निभा नहीं रहे थे, बल्कि सच में उसे जी रहे थे।
यह खबर भी पढ़ेंः विवाद के बीच एआर रहमान की बेटियों ने किया पिता का समर्थन, अपमान और आलोचना को लेकर कही ये बात
किरदारों को खुलकर जीने का मौका देता है ओटीटी
ओटीटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां किरदारों को वक्त मिलता है। फिल्मों में समय सीमित होता है, लेकिन सीरीज में किरदारों के ग्रे एरिया को भी खुलकर दिखाया जा सकता है। इसी वजह से तस्करी में तैयारी पर खास ध्यान दिया गया और कई वर्कशॉप्स की गईं। जब तक किरदार और सिचुएशन पूरी तरह साफ नहीं हुई, तब तक कैमरा ऑन नहीं किया गया।
जब हमने इमरान को इस किरदार की कहानी सुनाई, तो शुरू में अंदाजा नहीं था कि वो इसे इतनी जल्दी और इतनी गहराई से समझ लेंगे। करीब पैंतालीस मिनट की बातचीत के बाद ही साफ हो गया था कि वो इस रोल को सिर्फ निभाने नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी की तरह लेने वाले हैं।
इमरान हर सीन में पूरी तैयारी के साथ आते थे। वो सिर्फ डायलॉग याद करके सेट पर नहीं आते थे, बल्कि एक कस्टम्स ऑफिसर की बॉडी लैंग्वेज, टाइमिंग, एयरपोर्ट के बीच मूवमेंट और लोगों को देखने-समझने के तरीके को गहराई से स्टडी कर चुके थे। वो लगातार पूछते रहते थे कि किसी सिचुएशन में ऑफिसर क्या सोचेगा? सामने वाले को कैसे पढ़ेगा? और खुद को कैसे कंट्रोल में रखेगा?
इमरान ने चुप रहकर किरदार को खास बनाया
मेरे लिए सबसे खास बात ये थी कि इमरान कभी भी किसी सीन को हल्के में नहीं लेते थे। हर सीन के पीछे उनका एक साफ मकसद होता था। कई बार बिना स्क्रिप्ट बदले, सिर्फ एक्सप्रेशंस और आंखों से ही उन्होंने सीन को इतना असरदार बना दिया कि मैं खुद मॉनिटर के सामने रुक गया। उनका किरदार ज्यादा शो नहीं करता। इमरान ने चुप रहकर इस किरदार को खास बनाया है।
उन्होंने इस किरदार के लिए कई छोटी-छोटी चीजें नोटिस की थीं। इन बातों पर आम आदमी ध्यान नहीं देता लेकिन एक कस्टम ऑफिसर सामने वाले के हाव-भाव से ही पूरी कहानी पढ़ लेता है। मुझे ये देखकर हैरानी होती थी कि इमरान सिर्फ रोल निभा नहीं रहे थे, बल्कि सच में उसे जी रहे थे।
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किरदारों को खुलकर जीने का मौका देता है ओटीटी
ओटीटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां किरदारों को वक्त मिलता है। फिल्मों में समय सीमित होता है, लेकिन सीरीज में किरदारों के ग्रे एरिया को भी खुलकर दिखाया जा सकता है। इसी वजह से तस्करी में तैयारी पर खास ध्यान दिया गया और कई वर्कशॉप्स की गईं। जब तक किरदार और सिचुएशन पूरी तरह साफ नहीं हुई, तब तक कैमरा ऑन नहीं किया गया।