'उन्हें अलग नहीं किया जा सकता', कमाल अमरोही और मीना कुमारी की मोहब्बत पर नाती वसीम अमरोही ने तोड़ी चुप्पी
Waseem Amrohi Exclusive interview: इंडियन सिनेमा में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि एक सोच बन जाते हैं। कमाल अमरोही उन्हीं में से एक हैं। 'मुगल-ए-आजम', 'पाकीजा' और 'रजिया सुल्तान' जैसी फिल्मों से उन्होंने हिंदी सिनेमा को नई पहचान दी। हाल ही में कमाल अमरोही के नाती वसीम ने उनसे जुड़े किस्से साझा किए।
विस्तार
अमर उजाला से बातचीत में कमाल अमरोही के नाती वसीम अमरोही ने कहा कि उनके लिए यह नाम विरासत नहीं, बल्कि हर दिन खुद को साबित करने की चुनौती है। बातचीत के दौरान उन्होंने कमाल अमरोही और मीना कुमारी की लव स्टोरी पर बन रही फिल्म पर राय रखी और उनसे जुड़े कई दिलचस्प किस्से भी साझा किए।
अमरोही सरनेम गर्व है, लेकिन कोई शॉर्टकट नहीं
मेरे नाम के साथ अमरोही इसलिए जुड़ा है, क्योंकि मैं अमरोहा से ताल्लुक रखता हूं। अमरोहा सिर्फ एक शहर नहीं, एक तहजीब है। इस मिट्टी ने हर क्षेत्र को नायाब लोग दिए हैं। लेकिन जब विरासत की बात होती है, तो सबसे बड़ा नाम अपने आप कमाल अमरोही का आता है। मैं खुद को खुशनसीब मानता हूं कि मैं उसी कुनबे से हूं। अमरोहा में मेरे घर से थोड़ी ही दूरी पर कमाल साहब का घर है। उनके परिवार ने सिनेमा को जो दिया, 'पाकीजा', 'राजिया सुल्तान' और 'मुगल-ए-आजम', वह सिर्फ फिल्में नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की बुनियाद हैं। उस दौर में 'पाकीजा' जैसी फिल्म बनाना जुनून और सब्र की मिसाल था।
'पाकीजा' से सबसे बड़ी सीख मिली, ऑरिजिनैलिटी की
कमाल साहब से मुझे जो सबसे बड़ी सीख मिली, वह उनकी ओरिजिनैलिटी है। पाकीजा पूरी तरह ओरिजिनल फिल्म थी। आज जब मैं 'हीरामंडी' देखता हूं, तो साफ दिखता है कि संजय लीला भंसाली कमाल साहब से कितने प्रेरित हैं और खुद संजय सर भी यह मानते हैं। मैंने वही सोच अपनी फिल्म में अपनाने की कोशिश की। जब कॉस्ट्यूम डिजाइनर चमकदार नए कपड़े लेकर आए, तो मैंने मना कर दिया। शूटिंग के दौरान कलाकारों के कपड़े आपस में मिक्स कर दिए गए, ताकि हर चीज जिया हुआ और असली लगे। मेरे लिए ऑथेंटिसिटी सबसे जरूरी है।
कमाल अमरोही सिर्फ नाम नहीं, एक बेंचमार्क हैं
सेट्स के मामले में भी मैंने यही रास्ता चुना। मेरे परिवार का सेट मेकिंग का बिजनेस रहा है, इसलिए मुझे पता है कि सेट कैसे बनते हैं। फिर भी मैंने अपनी फिल्म में एक भी आर्टिफिशियल सेट नहीं लगाया। तीन महीने तक यूपी और पंजाब में घूमकर 150 से 200 साल पुरानी असली हवेलियां और लोकेशंस ढूंढीं और वहीं शूट किया। जब मैं कमाल अमरोही साहब को देखता हूं, तो वह सिर्फ नाम नहीं लगते। वह एक बेंचमार्क हैं। उन्होंने जो किया, वह लगभग नामुमकिन था। मेरी कोशिश बस इतनी है कि उस विरासत के साथ ईमानदार रह सकूं। यह तो बस शुरुआत है, सफर अभी लंबा है।
कमाल और मीना कुमारी की कहानी को गॉसिप बनाना सही नहीं
कई फिल्ममेकर कमाल अमरोही और मीना कुमारी की कहानी पर फिल्म बनाना चाहते हैं। लोग उनके रिश्ते के बारे में पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों बातें जानना चाहते हैं। लेकिन वे मेरे बुजुर्ग हैं, इसलिए मैं उनकी लव स्टोरी के निजी पहलुओं पर बात करना ठीक नहीं समझता। एक बात जरूर है कि जहां कमाल साहब की कब्र है, वहीं पास में मीना कुमारी साहब की भी कब्र है। उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। शायद यही उनका रिश्ता था। यह सिर्फ प्रेम कहानी नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की सबसे अनोखी विरासत है। 'पाकीजा' के दौरान अलगाव और लंबा ब्रेक भी रहा, उसकी वजहें थीं। लेकिन बाद में वे फिर साथ आए, फिल्म पूरी हुई और 'पाकीजा' इतिहास बन गई। आखिरकार वही काम बोलता है।
बायोपिक बने, लेकिन सम्मान के साथ
बायोपिक को लेकर मेरा मानना है कि हर कहानी की एक सीमा होनी चाहिए। पब्लिक फिगर होने का मतलब यह नहीं कि हर निजी बात को सनसनी बनाया जाए। आज सुनने में आ रहा है कि कमाल साहब और मीना कुमारी पर बायोपिक बन रही है। मेरी उम्मीद है कि जो भी बनाए, वह उनके काम और योगदान को केंद्र में रखे।
जब हेमा मालिनी के सीन के लिए स्विमिंग पूल में इत्र बहाया गया
'रजिया सुल्तान' की शूटिंग के दौरान एक सीन में हेमा मालिनी पानी में थीं। शूट से पहले स्विमिंग पूल के किनारे गुलाब जल की बोतलें खुल रही थीं और इत्र की शीशियां एक के बाद एक पानी में उड़ेली जा रही थीं। जब बजट को लेकर सवाल उठा, तो कमाल साहब ने कहा कि अगर सीन में शाही एहसास चाहिए, तो माहौल भी शाही होना चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि खुशबू तो परदे पर दिखेगी नहीं, तो उन्होंने कहा कि खुशबू कैमरे तक नहीं, कलाकार तक पहुंचनी चाहिए, क्योंकि वही एहसास परदे पर दिखेगा। यही कमाल अमरोही का पैमाना था। एक और किस्सा मुझे बहुत इंस्पायर करता है। जब कमाल साहब बॉम्बे आए और एक प्रोड्यूसर के पास स्क्रिप्ट लेकर पहुंचे, तो जवाब मिला कि बाद में देखेंगे। कमाल साहब ने बस इतना कहा कि कमाल देखने की चीज नहीं, सुनने की चीज है और चले गए। कुछ साल बाद वही प्रोड्यूसर उनके साथ काम कर रहा था और इसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती बताता था।
'बरेली के बाजार' में अगला प्रोजेक्ट
सच कहूं तो मुझे सरनेम का कोई फायदा नहीं मिला। इस इंडस्ट्री में कोई किसी के साथ खड़ा नहीं होता। यहां सिर्फ काम बोलता है। मैंने अपनी फिल्म खुद प्रोड्यूस की, पैसा लगाया और रिस्क लिया। अगर पैसों को प्राथमिकता देता, तो दुबई छोड़कर वापस नहीं आता। फिल्म रिलीज के लिए तैयार है और पार्ट टू की स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है। इसके बाद मेरी अगली फिल्म 'बरेली के बाजार' में होगी। यह हमारे बदलते कल्चर और अपनी जड़ों की तरफ लौटने की कहानी है। दिन के आखिर में हम सब अपने रूट्स की तरफ लौटना चाहते हैं। यही इस फिल्म की आत्मा है।