'निर्भया सिर्फ एक मामला नहीं था, ऐसे रोज हो रहा है'; महिलाओं की स्थिति पर रानी मुखर्जी ने जताई चिंता
Rani Mukerji Exclusive Interview: साल 2014 में रानी मुखर्जी की फिल्म 'मर्दानी' आई थी। इसका निर्देशन प्रदीप सरकार ने किया था और इसे आदित्य चोपड़ा ने प्रोड्यूस किया था। यही फिल्म 'मर्दानी' फ्रेंचाइजी की शुरुआत थी। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा में महिला पुलिस अफसर को बिल्कुल नए और मजबूत रूप में दिखाया।
विस्तार
फिल्म 'मर्दानी' की कहानी शिवानी शिवाजी रॉय की थी। वह एक ऐसी पुलिस अफसर है, जो एक गुमशुदा किशोरी की तलाश करते करते मानव तस्करी जैसे संगठित अपराध की खौफनाक दुनिया तक पहुंच जाती है। इसके बाद साल 2019 में 'मर्दानी 2' आई। अब 'मर्दानी 3' जल्द ही रिलीज होने वाली है। हाल ही में अमर उजाला से बातचीत में रानी मुखर्जी ने इस पूरे सफर पर खुलकर बात की।
जब आपने 'मर्दानी' की शुरुआत की थी, क्या तब कभी सोचा था कि यह एक पूरी फिल्म सीरीज बन जाएगी?
बिल्कुल नहीं। जब हमने मर्दानी शुरू की थी, तब किसी के दिमाग में यह बात नहीं थी कि यह आगे जाकर एक फ्रेंचाइजी बनेगी। उस वक्त 'मर्दानी' एक बहुत नेचुरल प्रोसेस था। निर्भया केस के बाद जो गुस्सा, आक्रोश और बेचैनी थी, वह हम सब महसूस कर रहे थे। सवाल बस यही था कि एक क्रिएटिव इंसान उस दर्द और उस गुस्से को कैसे बाहर निकाले। मेरे लिए मर्दानी वही जरिया बनी। आदित्य और प्रदीप दा के साथ बैठकर हमने यही सोचा कि अगर हम यह सब महसूस कर रहे हैं, तो समाज में और लोग भी कर रहे होंगे। शिवानी शिवाजी रॉय का किरदार उसी सामूहिक गुस्से से पैदा हुआ। शायद इसी वजह से लोग आज भी उससे जुड़ाव महसूस करते हैं। 'मर्दानी' की सबसे बड़ी ताकत उसकी सच्चाई है।
आपके हिसाब से ऐसी फिल्मों का बड़े पैमाने पर ऑडियंस तक पहुंचना कितना जरूरी है?
यह बहुत जरूरी है। ऐसी कहानियां कभी आरामदायक नहीं हो सकतीं। जिन मुद्दों पर ये फिल्में बात करती हैं, वे खुद बहुत असहज हैं। बच्चियों और महिलाओं के साथ जो हो रहा है, अगर उसे हल्का करके दिखाया जाए, तो बात का असर ही खत्म हो जाएगा। अक्सर हम सच्चाई से बचना चाहते हैं। हम कहते हैं कि हमें ऐसी खबरें नहीं देखनी और ऐसी फिल्में नहीं देखनी। लेकिन ऐसा कह देने से सच्चाई बदल नहीं जाती। अगर हम सवाल नहीं पूछेंगे कि यह सब क्यों हो रहा है और अगर सिस्टम और कानून से जवाब नहीं मांगेंगे, तो बदलाव कैसे आएगा? इस फिल्म का मकसद डराना नहीं है। इसका मकसद सोचने पर मजबूर करना है। जब तक हम बार-बार ऐसी कहानियां सामने नहीं लाएंगे और उनके बारे में बात नहीं करेंगे, तब तक समाज में कोई सही बातचीत शुरू ही नहीं होगी। अक्सर ऐसा होता है कि कोई बड़ी घटना होती है। कुछ दिनों तक सब बहुत भावुक हो जाते हैं। लेकिन चार पांच दिन बाद सब ठंडा पड़ जाता है और मामला कहीं खो सा जाता है। मुझे यही सबसे ज्यादा डरावना लगता है, क्योंकि निर्भया सिर्फ एक मामला नहीं था। ऐसे बहुत सारे मामले हैं, जिनकी कहानियां कभी सामने ही नहीं आतीं। वे हर रोज हमारे आसपास हो रहे होते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि सरकार हो, समाज हो या हम सब, हमें बार बार खुद को जगाने की जरूरत है। जब तक हम सवाल पूछना बंद नहीं करेंगे और सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ेंगे, तब तक कुछ बदलेगा नहीं।
आपके घर में भी एक बेटी है। एक मां और एक पेरेंट के तौर पर यह डर कितना गहरा होता है?
डर तो बहुत लगता है। मैं हमेशा कहती हूं कि मां बनने से पहले की रानी और आज की रानी में बहुत फर्क है। मां बनते ही इंसान भीतर से बदल जाता है। सोच बदल जाती है, संवेदनाएं बदल जाती हैं और चिंताएं भी बढ़ जाती हैं। आज की महिला किसी भी भूमिका में हो, बेटी हो, बहन हो, दोस्त हो, पत्नी हो या मां, हर जगह कोई न कोई संघर्ष चल रहा है। हर रिश्ते के साथ एक जिम्मेदारी जुड़ी होती है और उसके साथ एक डर भी। जिंदगी में चुनौतियां आती जाती रहती हैं, लेकिन एक डर ऐसा होता है जो हमेशा अंदर कहीं बैठा रहता है। कभी वह डर बच्चों को लेकर होता है, कभी अपनों को लेकर और कभी खुद को लेकर। वह जाता नहीं है। मर्दानी मुझे इसलिए बहुत खास लगती है, क्योंकि जब लड़कियां कहती हैं कि इस फिल्म ने उन्हें मजबूत महसूस कराया, तो मुझे लगता है कि शायद हम सही दिशा में कुछ कर पा रहे हैं।
क्या स्ट्रांग फीमेल सेंट्रिक फिल्मों के बाद ऑडियंस आपको सिर्फ मजबूत भूमिकाओं में देखने लगे हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। एक कलाकार के तौर पर मेरी दिलचस्पी हमेशा अच्छी कहानियों में रही है। मुझे मजबूत भारतीय महिलाओं को अलग-अलग रूपों में दिखाना पसंद है। कभी वे पढ़ाई कर रही होती हैं, कभी साड़ी पहनकर खाना बना रही हैं, घर संभाल रही होती हैं, कभी किसी पेशे में होती हैं और कभी वर्दी पहनकर देश की सेवा कर रही होती हैं। चाहे वह 'नो वन किल्ड जेसिका' की पत्रकार हो, 'मर्दानी' की शिवानी शिवाजी रॉय हो या देविका जैसी एक गृहिणी। भारतीय महिलाएं बहुत मजबूत होती हैं और मैं चाहती हूं कि सिनेमा में यह ताकत साफ दिखाई दे।
अगर कभी आपकी जिंदगी पर बायोपिक बनी, तो कौन सा पहलू अब तक सामने नहीं आया होगा?
हो सकता है कभी बने। रचनात्मक आजादी सबके पास होती है। (हंसते हुए) लेकिन मुझे लगता है कि अभी उसके लिए बहुत समय है। जिंदगी ने अभी बहुत कुछ सिखाना बाकी है। बहुत कुछ हासिल करना है और बहुत कुछ सीखना है। अभी तो यह सफर बस शुरू ही हुआ है।
इतनी गंभीर कहानियों के बीच अगर कोई ऐसा विषय आए, जिसके लिए आप बिना सोचे हां कह दें, तो वह क्या होगा?
रोमांटिक जॉनर। मुझे लगता है कि प्यार और भावनाएं भी उतनी ही जरूरी हैं। हां, मर्दानी मेरे लिए इसलिए खास है। मुझे बस ऑडियंस का साथ चाहिए। जब तक वह साथ रहेगा, मैं ऐसी कहानियां कहती रहूंगी।