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Mohammad Rafi: रफी को सुन जब छलके पंडित नेहरू के आंसू; लता दीदी संग झगड़ा, जानें 'सुरों के सरताज' के किस्से

Thu, 31 Jul 2025 08:11 AM IST
हिमांशु सोनी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: हिमांशु सोनी Updated Thu, 31 Jul 2025 08:11 AM IST
सार

Mohammad Rafi Death Anniversary: मोहम्मद रफी आज ही के दिन दुनिया को अलविदा कहकर चले गए थे। उनके करोड़ों चाहने वाले आज भी उनसे उतना ही प्यार करते हैं। चलिए आपको बताते हैं उनसे जुड़े कुछ दिलचस्प किस्सों के बारे में।

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Mohammad rafi death anniversary lifestory career interesting stories personal life
मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स

विस्तार

भारतीय संगीत के स्वर्ण युग में अगर किसी आवाज ने करोड़ों दिलों को छुआ, तो वो थी मोहम्मद रफी की। जिनके गाए नगमे आज भी लोगों की जुबान पर हैं और जिनकी आवाज सुनते ही भावनाओं की एक लहर दौड़ जाती है। 31 जुलाई 1980, इस दिन ये आवाज हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गई। मोहम्मद रफी की आज 45वीं पुण्यतिथि है। भले ही आज वो हमारे बीच ना हों लेकिन उनके गीत और शख्सियत हमेशा के लिए हमारे दिलों में अमर है। आइए जानते हैं रफी साहब की जिंदगी के कुछ ऐसे अनसुने और दिलचस्प किस्से, जो उन्हें औरों से काफी अलग बनाते हैं।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स

फकीर की संगत से शुरू हुआ संगीत का सफर
रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ था। वो बचपन से ही संगीत के दीवाने थे। लेकिन खास बात यह थी कि उनके घर में संगीत का कोई माहौल नहीं था। बावजूद इसके, गांव में गाने वाले एक सूफी फकीर को देखकर वो इतने प्रेरित हुए कि हर दिन उसका इंतजार करते और उसकी नकल उतारकर खुद रियाज करते थे। यही से उनकी सुरों की यात्रा शुरू हुई।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स

मंच पर पहली बार उतरे जब लाइट चली गई
साल 1937 में लाहौर में एक प्रदर्शनी में, जब मंच पर बिजली चली गई तो फेमस गायक के.एल. सहगल ने गाने से मना कर दिया। ऐसे में आयोजकों ने 13 वर्षीय रफी को गाने के लिए कहा। जैसे ही उन्होंने सुर छेड़े, लोग मंत्रमुग्ध हो गए। यहां तक कि सहगल साहब भी उनके प्रशंसक बन गए और भविष्यवाणी की कि ये लड़का एक दिन महान गायक बनेगा।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स

संगीत में ऐसा डूबे कि नाई की दुकान भी छूट गई
रफी साहब के बड़े भाई लाहौर में नाई की दुकान चलाते थे। रफी भी वहां काम में हाथ बंटाते थे। लेकिन दुकान में रहते हुए भी वो सुरों को गुनगुनाते रहते। एक ग्राहक ने उनके सुरों को पहचाना और जीवनलाल नाम के व्यक्ति के जरिए उन्हें संगीत की शिक्षा मिलने लगी। यहीं से उनका प्रोफेशनल सफर शुरू हुआ।



1 रुपए में गाया गाना, फिर भी कोई शिकायत नहीं
रफी साहब जितने बड़े गायक थे, उतने ही विनम्र और सरल स्वभाव के भी थे। कई बार वे सिर्फ 1 रुपए में गाना गा देते थे। उन्होंने कभी गाने से पहले पैसे की मांग नहीं की। उनके लिए गाना केवल पेशा नहीं, इबादत थी।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स

जब विधवा की मदद के लिए छुपा लिया अपना नाम
एक विधवा महिला जो आर्थिक संकट से जूझ रही थी, उसकी मदद करने के लिए रफी साहब ने गुमनाम रूप से पोस्ट ऑफिस के जरिए पैसे भेजने शुरू किए। ये रहस्य तब उजागर हुआ जब रफी साहब के निधन के बाद पैसे आने बंद हो गए और वो महिला पूछताछ के लिए पोस्ट ऑफिस पहुंची।

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अमेरिका से कार मंगवाई, ड्राइवर को दी टैक्सी
जब रफी साहब ने अमेरिका से एक कार मंगवाई, तो उनके पुराने ड्राइवर सुल्तान को उसे चलाना नहीं आया क्योंकि वो दाईं ओर स्टेयरिंग वाली थी। रफी जी ने उसे नौकरी से नहीं निकाला, बल्कि उसके लिए 70,000 रुपए की एक टैक्सी खरीद दी। वो टैक्सी चलाकर सुल्तान ने खुद की 12 टैक्सियों का कारोबार शुरू किया।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स

जवाहरलाल नेहरू के लिए खास पेशकश
साल 1948 में जब रफी साहब ने 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी' गाया तो यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन्हें अपने निवास पर बुलाकर विशेष प्रस्तुति देने को कहा। ये पल रफी साहब के करियर का ऐतिहासिक मोड़ था।

'दोस्ती' फिल्म के गाने पर रो पड़े नेहरू
एक और दिलचस्प किस्सा जुड़ा है फिल्म 'दोस्ती' के गाने ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ से। एक समारोह में जब रफी साहब ने यs गाना गाया, तो पंडित नेहरू की आंखों से आंसू बहने लगे। इसने रफी की गायकी की भावनात्मक गहराई को साबित कर दिया।

13 की उम्र में गुपचुप शादी
बहुत कम लोग जानते हैं कि रफी साहब ने महज 13 साल की उम्र में अपने चाचा की बेटी बशीर बेगम से निकाह किया था। हालांकि ये शादी कुछ ही वर्षों तक चली और फिर रफी जी ने 19 वर्ष की उम्र में बिलकिस से विवाह किया, जो उनकी जीवनसाथी बनीं।

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लता-रफी साहब - फोटो : एक्स

लता मंगेशकर से विवाद: 4 साल तक नहीं की बात
लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की जोड़ी ने कई कालजयी गीत दिए। लेकिन रॉयल्टी के मुद्दे पर दोनों के बीच विवाद हो गया। लता चाहती थीं कि गायक को गाने की रॉयल्टी मिले, जबकि रफी का मानना था कि रिकॉर्डिंग के बाद गायक का अधिकार खत्म हो जाता है। इस वजह से चार साल तक दोनों ने साथ गाना बंद कर दिया।

कैसे हुई लता दीदी और रफी साहब में सुलह?
जब लता दीदी को लगा कि सुमन कल्याणपुर को ज्यादा मौके मिलने लगे हैं, तो उन्होंने संगीतकार शंकर-जयकिशन से आग्रह किया कि वो रफी जी से सुलह कराएं। फिर 4 साल बाद 'पलकों की छांव में' के दौरान दोनों ने फिर से एक साथ गाना गाया और पुराने मतभेद भुला दिए।

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Mohammad rafi death anniversary lifestory career interesting stories personal life
मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स

संगीत के हर रंग में रफी
रफी साहब ने भजन, गजल, कव्वाली, देशभक्ति, रोमांस, ट्रैजिक, हर रंग के गाने गाए। नौशाद, एसडी बर्मन, ओपी नैय्यर, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम करते हुए उन्होंने करीब 7000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए।

आखिरी विदाई में 10 हजार लोगों की भीड़
31 जुलाई 1980 को जब रफी साहब का निधन हुआ, तो उनका अंतिम संस्कार किसी जन आंदोलन की तरह बन गया। 10,000 से ज्यादा लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे और भारत सरकार ने दो दिन का शोक घोषित किया। जब वो 55 वर्ष के थे, तब उनका निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ था।

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