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डिजिटल रिव्यू: दुश्मन देश में भेष बदलकर रहना आसान नहीं होता, रॉ के ट्रेलर से उठा मुश्किलों से पर्दा
Mon, 04 Mar 2019 01:58 PM IST
विजय जैन
अमर उजाला, ब्यूरो
अमर उजाला, ब्यूरो
Published by: विजय जैन
Updated Mon, 04 Mar 2019 01:58 PM IST
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john abraham
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डिजिटल रिव्यू: रोमियो अकबर वॉल्टक (ट्रेलर)
कलाकार: जॉन अब्राहम, जैकी श्रॉफ, मौनी रॉय, रघुवीर यादव आदि। निर्देशक: बॉबी ग्रेवाल
बैनर: वॉयकॉम 18 पिक्चर्स
सर्जिकल स्ट्राइक वन और सर्जिकल स्ट्राइक 2 के हीरो रहे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने रॉ में रहने के दौरान पाकिस्तान में कई साल मुसलमान बनकर गुजारे हैं। मस्जिदों में नमाजें पढ़ी हैं। मौलवियों संग काफी वक्त भी गुजारा है।
जॉन अब्राहम की फिल्म रॉ यानी रोमियो, अकबर, वॉल्टर ऐसे ही एक रॉ एजेंट की कहानी है। दुश्मन देश में भेष बदलकर रहना आसान नहीं होता। और भेष अगर खुलने का खतरा हो तो न सिर्फ मुश्किलें बढ़ जाती हैं, बल्कि जान जाने का खतरा भी हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। भारत दुनिया की महाशक्ति 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश को अलग करके बना था। किसी देश ने आज तक इससे बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक दुनिया में नहीं की है कि दुश्मन देश के दो टुकड़े ही हो जाएं।
राष्ट्रवाद से ओतप्रोत हिंदी फिल्मों के दौर में जॉन अब्राहम की ये फिल्म भी राष्ट्रवाद की ही बात करती है। भारत और पाकिस्तान की बात करती है। सरहद पर बने तनाव की बात करती है और साथ ही बात करती है एक ऐसी राष्ट्रभावना की जिसमें देशभक्त होने के लिए खून के केसरिया होने की जरूरत नहीं है।
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जॉन अब्राहम ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ऐसी फिल्में बनाने के लिए खोली है, जिन्हें बनाने में पैसे के अलावा दिमाग भी लगता है। उनकी फिल्मों विकी डोनर औऱ मद्रास कैफे ने हिंदी सिनेमा से सितारों की विदाई का बिगुल बजाकर कहानियों को सुपरस्टार बनाया। अब इसी कसौटी पर जॉन अब्राहम की खुद की परख होनी है। माहौल बन चुका है। चुनाव सिर पर है और सत्ता के संग्राम के ठीक बीच में रिलीज होने जा रही ये फिल्म काफी कुछ बदल सकती है।
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कलाकार: जॉन अब्राहम, जैकी श्रॉफ, मौनी रॉय, रघुवीर यादव आदि। निर्देशक: बॉबी ग्रेवाल
बैनर: वॉयकॉम 18 पिक्चर्स
सर्जिकल स्ट्राइक वन और सर्जिकल स्ट्राइक 2 के हीरो रहे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने रॉ में रहने के दौरान पाकिस्तान में कई साल मुसलमान बनकर गुजारे हैं। मस्जिदों में नमाजें पढ़ी हैं। मौलवियों संग काफी वक्त भी गुजारा है।
जॉन अब्राहम की फिल्म रॉ यानी रोमियो, अकबर, वॉल्टर ऐसे ही एक रॉ एजेंट की कहानी है। दुश्मन देश में भेष बदलकर रहना आसान नहीं होता। और भेष अगर खुलने का खतरा हो तो न सिर्फ मुश्किलें बढ़ जाती हैं, बल्कि जान जाने का खतरा भी हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। भारत दुनिया की महाशक्ति 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश को अलग करके बना था। किसी देश ने आज तक इससे बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक दुनिया में नहीं की है कि दुश्मन देश के दो टुकड़े ही हो जाएं।
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राष्ट्रवाद से ओतप्रोत हिंदी फिल्मों के दौर में जॉन अब्राहम की ये फिल्म भी राष्ट्रवाद की ही बात करती है। भारत और पाकिस्तान की बात करती है। सरहद पर बने तनाव की बात करती है और साथ ही बात करती है एक ऐसी राष्ट्रभावना की जिसमें देशभक्त होने के लिए खून के केसरिया होने की जरूरत नहीं है।
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जॉन अब्राहम ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ऐसी फिल्में बनाने के लिए खोली है, जिन्हें बनाने में पैसे के अलावा दिमाग भी लगता है। उनकी फिल्मों विकी डोनर औऱ मद्रास कैफे ने हिंदी सिनेमा से सितारों की विदाई का बिगुल बजाकर कहानियों को सुपरस्टार बनाया। अब इसी कसौटी पर जॉन अब्राहम की खुद की परख होनी है। माहौल बन चुका है। चुनाव सिर पर है और सत्ता के संग्राम के ठीक बीच में रिलीज होने जा रही ये फिल्म काफी कुछ बदल सकती है।