Ek Din Movie Review: लॉजिक से परे लेकिन खूबसूरत ‘एक दिन’, जानिए जुनैद और साई की फिल्म में कहां रह गई कमी?
पिछले साल रिलीज हुई ‘लवयापा’ के बाद आमिर खान के बेटे जुनैद की अगली फिल्म ‘एक दिन’ रिलीज हो चुकी है। इस फिल्म में उनके अपोजिट साई पल्लवी हैं। जानिए कैसी है यह फिल्म? और क्या साई और जुनैद आपका ‘एक दिन’ खूबसूरत बना पाएंगे?
विस्तार
वो सपने ही क्या जो पहुंच के बाहर ना हो? और अगर सपने पूरे नहीं कर सकते तो सपने देखने का क्या ही मतलब है? खुद को कमतर समझने का वाला एक लड़का जिसे एक खूबसूरत सी लड़की से सिर्फ एक दिन बात ही करने को मिल जाए, ऐसे सपने देखता है। उसका यह सपना कैसे पूरा होता है और जब टूटता है ताे क्या होता है? बस यही है ‘एक दिन’ की कहानी…
फ्रेश ऑनस्क्रीन कपल.. जापान की खूबसूरत लोकेशन और एक मासूम सी प्रेम कहानी… सुनने में तो यह सब बहुत अच्छा लगता है। पर जब यह सब मिलकर स्क्रीन पर आता है तो कुछ अधूरा सा लगता है। कहानी और ढीले स्क्रीनप्ले की वजह से फिल्म कई जगह कमजोर पड़ती है पर फिर अपने आप ही संभल जाती है। कैसी है यह फिल्म? यहां जानिए..
कहानी
सीधी साधी सी है। दिनेश (जुनैद खान) जिस कंपनी में काम करता है उसी कंपनी में मीरा (साई पल्लवी) भी काम करती है। दिनेश, खुद को कमजोर समझता है। उसे लगता है कि उसकी कोई वैल्यू नहीं है और ना ही वो किसी को दिखाई देता है। वो खुद को ‘इनविजिबल मैन’ समझता है। उसे मीरा से एकतरफा प्यार है पर उसे बताने से कतराता है। इसी बीच कंपनी का बॉस नकुल (कुणाल कपूर) पूरी ऑफिस टीम को लेकर जापान ट्रिप पर जाता है। यहां मीरा के साथ एक हादसा होता है और उसकी याददाश्त एक दिन के लिए चली जाती है। इसके बाद दिनेश, मीरा के साथ ‘एक दिन’ बिताता है और कई झूठ बोलता है। ट्विस्ट तब आता है जब मीरा को सच का पता चलता है। इसके आगे क्या होता है? यह जानने के लिए आप फिल्म देख सकते हैं।
निर्देशन
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है इसका धीमापन और कई ऐसी चीजें जो लॉजिक से परे हैं। फर्स्ट हाफ तो निर्देशक सुनील पांडे ने अच्छे से संभाला है पर सेकंड हाफ में जबरदस्ती खींचे गए इमोशंस फिल्म को बेवजह लंबा कर देते हैं। एक वक्त मात्र दो घंटे की यह फिल्म भी आपको बोर करने लगती है क्योंकि इसमें वो मसाला ही नहीं, जिसे आज के दौर में दर्शक देखने के आदी हो गए हैं। फिल्म में हीरो का इंट्रो अलग और थोड़ा साॅफ्ट है, जो अच्छा लगता है। एक दो अच्छे पंच भी हैं जिन्हें सुनकर दर्शक हंसते भी दिखते हैं। जैसे - ‘जिस हिसाब से ये तुम्हारा ख्याल रख रखा है ये तुम्हारा पति हो भी नहीं सकता।'
अभिनय
जुनैद का काम अच्छा है पर वो राेमांटिक सीन बहुत अच्छे से नहीं निभा पाते। ‘लवयापा’ और ‘महाराज’ में भी यही दिक्कत थी। जुनैद को चाहिए कि वो कोई एक्शन फिल्म करें.. शायद उसमें वो परफेक्ट लगेंगे। साई पल्लवी इस फिल्म को देखने की बड़ी वजह हैं। आमिर ने प्रमोशन के वक्त सही कहा था कि उनकी हिंदी परफेक्ट न होते हुए भी प्यारी लगती है। वो कई सीन में जान फूंकती है पर फिल्म की कहानी और गति ही इतनी कमजोर है कि वो चाहकर भी इसे बेहतर नहीं बना पातीं। जुनैद और साई के बीच की कैमिस्ट्री भी कुछ जगह अच्छी और कहीं कहीं कमजोर है क्योंकि इसे डेवलप होने का ना तो वक्त मिला और ना ही फिल्म की कहानी ऐसी है कि इनके बीच बेइंतहा प्यार दिखाया गया हो। कुणाल कपूर अपना काम अच्छी तरह करते हैं। बाकी कलाकारों के पास ज्यादा स्पेस नहीं है पर काम सबका ठीक ही है।
म्यूजिक
टाइटल ट्रैक और अरिजीत सिंह की आवाज में गाना 'ख्वाब देखूं..' ही थोड़ा सुनने लायक हैं। बाकी गाने याद नहीं रहते। बैकग्राउंड म्यूजिक ओके-ओके ही है।
फिल्म ‘एक दिन’ बुरी नहीं है पर ये थोड़ी धीमी है। फिल्म में मसाले की गहरी कमी है और लॉजिक तो कई सीन में ना के बराबर है। ऐसे में यह कई जगह बोरिंग लगने लगती है। लॉजिकली इसे पचाना शायद थोड़ा मुश्किल हो पर फिल्में तो ऐसी ही होती हैं ना? थिएटर में शायद यह थोड़ी भारी लगेगी पर ओटीटी पर आप इसे देखकर खुश हो सकते हैं।
