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'परमाणु' की तरह नहीं चला 'सत्यमेव जयते' का जादू, पर जॉन अब्राहम के एक्शन ने लूट ली महफिल

Wed, 15 Aug 2018 07:20 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Wed, 15 Aug 2018 07:20 PM IST
john abraham film Satyameva Jayate review
satyamev jayate
निर्माताः भूषण कुमार-निखिल आडवाणी

निर्देशकः मिलाप जवेरी
सितारेः जॉन अब्राहम, मनोज बाजपेयी, आयशा शर्मा
रेटिंग *
तरक्की के साथ सिनेमा को आगे बढ़ना चाहिए या पीछे? तय है कि आगे लेकिन लेखक-निर्देशक मिलाप जवेरी सत्यमेव जयते में इसे पीछे धकेलते हैं। वह 1970-80 के दशकों के चालू फार्मूलों से 2018 की फिल्म गढ़ते हैं। जो बेहद अतार्किक कहीं-कहीं हास्यास्पद हो जाती है। फिल्म भ्रष्टाचार मिटाओ नारे पर केंद्रित है और यहां हीरो के निशाने पर पुलिस फोर्स है। मिलाप ने दो भाई, ईमानदार पुलिस पिता और बेईमान पुलिस अफसरों को मिला कर कहानी रची। एक जमाने में फिल्म बनाने के लिए इतने सूत्र पर्याप्त होते थे। परंतु तरक्की करते सिनेमा में यह संभव है।
 

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Satyameva Jayate

सत्यमेव जयते ऐसी हिंसा से भरी फिल्म है जिसका आप समर्थन नहीं कर सकते। कथित हीरो (जॉन अब्राहम) हर कथित मुजरिम को माचिस की तीलियां सुलगाते हुए जिंदा आग के हवाले कर रहा है। वजह है कि भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर उसके पिता ने खुद पर कैरोसिन डाल कर आग लगा ली थी। यह भी कहा जा सकता है कि यहां दो लाइनों के बाद कहानी नाम की कोई चीज नहीं है। सिर्फ हिंसा की भरमार है।

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जॉन अब्राहम ने खुद को सनी देओल और सलमान खान के मिक्स के रूप में ढाला है। उन्हें एक्टिंग करने की यहां जरूरत भी नहीं थी। वहीं मनोज बाजपेयी पुलिस इंस्पेक्टर और जॉन के बड़े भाई के रूप में हैं, जो कहानी में इमोशनल ट्विस्ट लाने के लिए उसे बार-बार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी देते रहते हैः भाई कानून अपने हाथ में मत लो, वर्ना गोली मार दूंगा। छोटे भाई को पक्का भरोसा है कि बड़ा गोली मारेगा।

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अब आप चाहें तो सिर्फ जानने के लिए फिल्म देख सकते हैं कि क्या गोली चली? चली तो क्या लगी? लगी तो क्या फर्ज ने प्यार के ऊपर जीत पाई? मनोज बाजपेयी ने पूरी क्षमता के साथ काम किया है जबकि नई हीरोइन आयशा शर्मा हाव-भाव और आवाज से नेहा धूपिया का अनाकर्षक संस्करण लगती हैं। आयशा की मौजूदगी के बावजूद रोमांस एकाध गाने को छोड़ कर गायब है। आइटम डांस के रूप में यहां नोरा फतेही पर फिल्माया गाना दिलबर जरूर देखने योग्य है। सत्यमेव जयते भले कहे कि सत्य की सदा विजय होती है परंतु यह फिल्म सिनेमा की हार का नमूना है।

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