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Movie Daadi Ki Shaadi Review: इमोशंस परोसने निकली फिल्म ट्विस्ट्स में उलझी, कपिल शर्मा भी नहीं जमा पाए रंग

Kiran Vinod Kumar Jain Kiran Vinod Kumar Jain
Updated Fri, 08 May 2026 01:13 PM IST
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सार

Daadi Ki Shaadi Movie Review: नीतू कपूर और कपिल शर्मा के अभिनय से सजी ‘दादी की शादी’ कॉमेडी से भरी एक फैमिली ड्रामा फिल्म है। रिव्यू में पढ़िए जानिए कैसी है ये फिल्म?

Movie Daadi Ki Shaadi Review Hindi Neetu Kapoor And Kapil Sharma To Sadia Khateeb
फिल्म 'दादी की शादी' का रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
दादी की शादी
कलाकार
नीतू कपूर , कपिल शर्मा , सादिया खतीब , दीपक दत्ता , जितेंद्र हुड्डा , रिद्धिमा कपूर साहनी और आर. शरतकुमार
लेखक
आशीष आर. मोहन , बंटी राठौर और साहिल एस. शर्मा
निर्देशक
आशीष आर. मोहन
निर्माता
कोमल शाहनी , श्रद्धा अग्रवाल , गिन्नी कपिल शर्मा , अक्षित लाहौरिया और गुरजोत सिंह
रिलीज डेट
8 मई 2026
रेटिंग
2/5

विस्तार

फैमिली ड्रामा फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी और भावनाएं होती हैं। मां-बाप का अकेलापन, बच्चों की व्यस्त जिंदगी और रिश्तों में आती दूरी, ये वो चीजें हैं जिनसे ऑडियंस तुरंत कनेक्ट कर लेती है। 'दादी की शादी' भी इसी इमोशनल जमीन पर खड़ी होने की कोशिश करती है। फिल्म बताती है कि कैसे बच्चे बड़े होने के बाद धीरे-धीरे अपने माता-पिता को टेक फॉर ग्रांटेड लेने लगते हैं।

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मुद्दा बढ़िया है, इरादा भी नेक है। लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि यह दिल छूने से ज्यादा दिमाग घुमाने में बिजी हो जाती है। इमोशन परोसने के चक्कर में फिल्म इतनी बार ट्विस्ट मारती है कि आखिर तक आते-आते ऑडियंस खुद पूछने लगती है, 'भाई, आखिर चल क्या रहा है?’ 

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Movie Daadi Ki Shaadi Review Hindi Neetu Kapoor And Kapil Sharma To Sadia Khateeb
फिल्म 'दादी की शादी' का रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

कहानी: एक टाइपिंग मिस्टेक और पूरे परिवार का इमोशनल भूचाल
कहानी की शुरुआत टोनी कालरा (कपिल शर्मा) से होती है, जिसकी शादी नहीं हो रही। तभी एक रिश्ता आता है और लड़की कन्नू (सादिया खतीब) वही निकलती है, जिस पर टोनी कॉलेज टाइम से फिदा था। भाई साहब सपनों में शहनाई बजा ही रहे होते हैं कि सगाई के बीच ऐसा खुलासा होता है कि मामला वहीं ठंडा पड़ जाता है।
लेकिन फिल्म की असली कहानी विमला (नीतू कपूर) की है, जो शिमला में अकेली रहती हैं। उनके दो बेटे जीवन (दीपक दत्ता) और नाग (जितेंद्र हुड्डा), अपने परिवारों के साथ दिल्ली और चंडीगढ़ में सेट हैं। जबकि बेटी सुनैना (रिद्धिमा कपूर साहनी) शादी के बाद सिंगापुर में बस चुकी है।
कहानी में असली बवाल तब शुरू होता है जब फेसलुक (फिल्म में दिखाया गया सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) पर हुई एक छोटी-सी टाइपिंग गलती पूरे परिवार को शॉक मोड में डाल देती है। कई साल से व्यस्त बच्चे अचानक शिमला पहुंच जाते हैं। सूना घर फिर से घर जैसा लगने लगता है। अब विमला इस खुशी को खत्म नहीं होने देना चाहतीं और यहीं से शुरू होता है झूठ, ड्रामा, इमोशनल ब्लैकमेल और ट्विस्ट का ऐसा सिलसिला जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता।
फिल्म कुछ जगहों पर यह भी दिखाती है कि कैसे बच्चे मां-बाप पर किए खर्च तक गिनवाने लगते हैं। कोई इलाज का हिसाब दे रहा है, कोई टिकट का। मतलब रिश्तों में प्यार कम और एक्सेल शीट ज्यादा चल रही है। इसी बीच कपिल शर्मा भी इस पूरे प्लान का हिस्सा बन जाता है।
सुनने में कहानी काफी मजेदार लगती है। शुरुआत में फिल्म दिलचस्पी जरूर पैदा करती है और कुछ समय तक यह जानने में मजा आता है कि कहानी आखिर किस दिशा में जाएगी। लेकिन फिल्म इसे संभाल नहीं पाती। हर 10-15 मिनट में नया ट्विस्ट डालने की कोशिश कहानी को इमोशनल कम और ओवरलोडेड ज्यादा बना देती है।

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फिल्म 'दादी की शादी' का रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

अभिनय: नीतू कपूर संभालती हैं, कपिल शर्मा फिसलते रहते हैं
नीतू कपूर ने अपने किरदार को ठीक-ठाक निभाया है। अकेलेपन और परिवार को साथ रखने की चाह वाले भाव उनके हिस्से में अच्छे आते हैं। कुछ सीन्स में उनका काम असर छोड़ता है, लेकिन फिल्म का कमजोर लेखन उनके अभिनय को भी ज्यादा ऊपर नहीं उठने देता।
कपिल शर्मा यहां भी अपने पुराने अंदाज में ही नजर आते हैं। कॉमिक टाइमिंग उनकी अब भी अच्छी है, लेकिन इमोशनल सीन में उनका अभिनय काफी फ्लैट लगता है। फर्क बस इतना है कि इस बार पंचलाइन के बाद ताली और ठहाकों का बैकग्राउंड साउंड नहीं है।
आर. शरतकुमार फिल्म में कर्नल थीरन देवराजन के किरदार में नजर आते हैं और स्क्रीन पर आते ही अपनी मौजूदगी महसूस करवाते हैं। साउथ सिनेमा के अनुभवी स्टार होने का असर उनके स्क्रीन प्रेजेंस में साफ दिखता है। नीतू कपूर के साथ उनके कुछ सीन्स फिल्म को थोड़ी गंभीरता और ठहराव देने की कोशिश करते हैं।
बाकी सपोर्टिंग कास्ट अपना काम ठीक-ठाक करती है। लेकिन कोई किरदार लंबे समय तक याद नहीं रहता। 

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फिल्म 'दादी की शादी' का रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

निर्देशन और स्क्रीनप्ले: ‘हर सीन में नया ड्रामा डालो’ वाला स्क्रीनप्ले
डायरेक्टर आशीष आर. मोहन फिल्म को हल्का-फुल्का फैमिली एंटरटेनर बनाना चाहते हैं। लेकिन फिल्म इमोशन और मेलोड्रामा के बीच ऐसा फंसती है कि आखिर में दोनों का बैलेंस ही बिगड़ जाता है। इस फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका स्क्रीनप्ले है। ऐसा लगता है जैसे लेखक हर दस मिनट बाद खुद से पूछ रहा हो, 'अब क्या करें?' और सामने से जवाब आता हो, ‘भाई, एक और ट्विस्ट दिखा दो।’ नतीजा यह होता है कि फिल्म रिश्तों की कहानी कम और टीवी सीरियल वाला फैमिली हंगामा ज्यादा लगने लगती है। कई इमोशनल सीन्स सिर्फ इसलिए असर नहीं छोड़ पाते क्योंकि फिल्म हर सीन में ऑडियंस से जबरदस्ती आंसू निकलवाना चाहती है।
फिल्म के अंत में जब एक किरदार कहता है, ‘ये आपने पहले क्यों नहीं बताया?’ तो यही सवाल ऑडियंस  के मन में भी आता है। अगर बात इतनी सी थी, तो उसे बताने के लिए ढाई घंटे की जरूरत क्यों पड़ी? 

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फिल्म 'दादी की शादी' का रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

सिनेमैटोग्राफी: कहानी भटकी, कैमरा नहीं
अगर फिल्म में कुछ लगातार अच्छा लगता है, तो वो है इसकी सिनेमैटोग्राफी। शिमला की वादियां, मॉल रोड, रिज ग्राउंड और जाखू टेंपल को बेहद खूबसूरती से शूट किया गया है। कई फ्रेम इतने शानदार हैं कि कई बार लगता है कैमरा फिल्म की कहानी से ज्यादा मेहनत कर रहा है। कहानी जहां-जहां थकाती है, वहां-वहां शिमला आंखों को ऑक्सीजन देता है। 

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फिल्म 'दादी की शादी' का रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

संगीत: गाने आते हैं और बिना असर छोड़े चले जाते हैं
फिल्म का संगीत पूरी तरह फीका पड़ता है। कोई भी गाना थिएटर से बाहर निकलने के बाद याद नहीं रहता। बैकग्राउंड स्कोर भी कई जगह टीवी सीरियल वाली फील देता है, जो इमोशनल सीन को और हल्का बना देता है।

देखें या नहीं?
‘दादी की शादी’ एक अच्छी फैमिली फिल्म बन सकती थी। टॉपिक में दम था, कलाकार भी ठीक थे और इमोशंस की पूरी गुंजाइश थी। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, जरूरत से ज्यादा ट्विस्ट और फीके डायलॉग्स फिल्म को दिल से ज्यादा दिमाग पर बोझ बना देते हैं। अगर आप सिर्फ नीतू कपूर, शिमला की खूबसूरत लोकेशंस और हल्का-फुल्का फैमिली ड्रामा देखने के मूड में हैं, तो एक बार ट्राय कर सकते हैं।
लेकिन अगर आप ऐसी फैमिली फिल्म ढूंढ रहे हैं जो सच में दिल छू जाए, तो यहां मामला थोड़ा उल्टा पड़ जाता है। फिल्म खत्म होने तक आंखें नम कम और दिमाग ज्यादा थका हुआ महसूस होता है।

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