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हल्की फुल्की टाइमपास फिल्म है 'आई मी और मैं'
रोहित मिश्र
Updated Sat, 02 Mar 2013 11:19 AM IST
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'आई मी और मैं' एक हल्की फुल्की टाइम पास फिल्म है। दो घंटे से भी कम समय वाली इस फिल्म में याद रखने लायक कुछ भी नहीं है, पर यह फिल्म इस तरह से चलती है कि आप बोर नहीं होते। कहने को तो इसे एक लव ट्राएगंल फिल्म भी कह सकते हैं पर शायद फिल्म के निर्देशक को यह मंजूर नहीं था कि इसे प्रेम त्रिकोण फिल्म कहा जाए। इसीलिए फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा अलग कर दिया है।
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हल्की-फुल्की बातें करती हुई, बीच-बीच में थोड़ा-बहुत हंसाती चल रही यह फिल्म अपनी एक नॉन सीरियस इमेज गढ़ लेती है। यह इमेज फिल्म के लिए वहां पर उल्टी पड़ने लगती है जहां यह फिल्म गंभीर बातें करना चाहती है। फिल्म के कलाकारों के मुंह से निकलने वाली गंभीर बातें दर्शकों को हथौड़े जैसी लग सकती हैं। अपनी पहली फिल्म निर्देशित कर रहे कपिल शर्मा के पास रिश्तों की बारीकियों को समझने, उन्हें उलझाने और फिर उन्हें सुलझाने का हुनर नहीं है। उनकी यह कमजोरी फिल्म के अच्छे बन सकने वाले दृश्यों में साफ दिखती है। कुल मिलाकर 'आई मी और मैं' बिना किसी अपेक्षा के देखी जानी वाली और देखकर भूल जाने वाली फिल्म है।
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कहानी वही, एक लड़का दो लड़की वाली
फिल्म की कहानी ईशान (जॉन अब्राहम) के इर्द-गिर्द घूमती है। एक म्यूजिक कंपनी में काम करने वाला ईशान पिछले कुछ सालों से अनुष्का (चित्रांगदा सिंह) के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा होता है। अनुष्का इस रिश्ते को शादी में बदलने के लिए गंभीर रहती है। इसके उलट ईशान को यह भी नहीं पता होता है कि वह अनुष्का से कितना और कैसा प्यार करता है। ईशान के व्यवहार से अनुष्का उससे अलग हो जाती है। अपने को बेस्ट मानने वाला ईशान कुछ समय तक तो अनुष्का को फॉलो करता है फिर उसे गौरी (प्राची देसाई) के रूप में नयी प्रेमिका मिल जाती है।
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जीवन के प्रति एक स्पष्ट नजरिया रखने वाली गौरी से ईशान काफी कुछ सीखता है। जब वह गौरी के साथ अपने रिश्ते को किसी मुकाम पर पहुंचाने की सोचता है तभी पता चलता है कि अनुष्का, उसके बच्चे की मां बनने वाली है। (बाकी हिंदी फिल्मों से उलट, मां बन जाने वाले इस प्रसंग को इस फिल्म में हल्के-फुल्के अंदाज में ही पेश किया गया है।) यह सुनने के बाद भी ईशान अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझता। फिर अचानक फिल्म बदलती है और ईशान को लगता है कि वह गलत कर रहा है। फिल्म के क्लाइमेक्स में वह गौरी को छोड़कर प्रेगनेंट अनुष्का के पास पहुंच जाता है। बाकी फिल्मों के अलग अनुष्का और ईशान साथ रहने के बजाय एक तीसरा रास्ता चुनते हैं।
जरूरत भर का अभिनय, ओवरऐक्टिंग नहीं
इस फिल्म में कोई भी कलाकार अपने किरदार में पूरी तरह से नहीं घुसता पर अच्छी बात यह है कि वह ओवरऐक्टिंग भी नहीं करता। यह पूरी तरह से जॉन अब्राहम की फिल्म है। फिल्म के हर दृश्य में जॉन छाए हुए हैं। वह कभी प्राची देसाई के साथ हैं तो कभी चित्रांगदा के साथ तो कभी अपनी बॉस बनी खूबसूरत राइमा सेन के साथ। एक नॉन सीरियस और वर्तमान में जीने वाला लड़के का किरदार जॉन ने अच्छे से निभाया है। हां, भावुक दृश्यों में जॉन जरूर कमजोर दिखते हैं।
इस फिल्म में चित्रांगदा सिंह ने 'इंकार' फिल्म जैसी ही ऐक्टिंग की है। एक अभिनेत्री के रूप में चित्रांगदा अच्छी हैं पर उन पर हल्के ग्रेशेड वाले किरदार ही ज्यादा अच्छे लगते हैं। ज्यादा अच्छी और सताई हुई लड़की के रूप में वह फिट नहीं बैठतीं। प्राची देसाई ने इस फिल्म में अपनी पिछली सीधी-सादी लड़की वाली इमेज तोड़ने की कोशिश की है जिसमें वह कहीं पर सफल तो कहीं पर औंधे मुंह गिरी दिखती हैं। छोटे से किरदार में राइमा सेन हमेशा से खूबसूरत लगी हैं। उन्हें देखकर यह लगता है कि वह इंडस्ट्री में चल क्यों नहीं पायीं।
यह निर्देशक की पहली फिल्म है
कॉमेडी रियलिटी शो का बड़ा चेहरा रहे कपिल शर्मा ने इस फिल्म को निर्देशित किया है। उनकी इस पहली फिल्म को देखकर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने शुरूआत खराब नहीं की है। रियलिटी शो जिस तरह से लाऊड और ओवरऐक्टिंग से भरे हुए होते हैं इस फिल्म में वैसी ओवरऐक्टिंग और लाऊडनेस नहीं दिखती है। प्रेम त्रिकोण या प्रेम जैसा कुछ दिखाने के लिए निर्देशक के पास रिश्तों के मनोविज्ञान की अच्छी और प्रैक्टिकल समझ होनी चाहिए। उस समझ का कपिल शर्मा में अभाव दिखता है। यह फिल्म वहां पर भारी और बेझल लगने लगती है जहां यह कुछ गंभीर बातें कहना चाहती है। इसका सीधा मतलब यही होता है कि दर्शक फिल्म से ज्यादा उम्मीद नहीं कर रहे होते हैं। बड़े कलाकारों के साथ पहली बार काम करने का दबाव भी कपिल शर्मा में दिखता है।
एक गाना तो बड़ा मजेदार है
'किसी के हाथ न आएगी यह लड़की', की तर्ज पर इस फिल्म में 'किसी के हाथ न आएगा यह लड़का' गाना रखा गया है। यह गाना बड़ा मजेदार है। इस गाने का पिक्चराइजेशन भी अच्छा है। पर दिक्कत यह है कि यह गाना फिल्म के खत्म होने पर है। 'कैफीचूनो', 'साजना', 'नशा नशा' जैसे गाने फिल्म की तरह की औसत हैं, जोकि ऑडियो एलबम में नहीं सुने जाएंगे।
क्यों देखें
यदि आप जॉन अब्राहम के फैन हैं और आपको हल्की-फुल्की दिमाग न लगाने वाली रोमांटिक फिल्में पसंद हैं।
क्यों न देखें
यदि आप तीन सितारों से सजी एक अच्छी लव ट्राएगंल फिल्म की उम्मीद करके जा रहे हों तो।