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शाहिदः जैसे गुस्से में रची कविता
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
Updated Fri, 18 Oct 2013 02:20 PM IST
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कुछ कहानियां कविताओं की तरह होती हैं। गुस्से में रची गई कविता की तरह। निर्देशक हंसल मेहता ने मुंबई में 2010 में मार दिए गए मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील शाहिद आजमी की जिंदगी को कुछ इसी अंदाज में पर्दे पर उतारा है।
शाहिद उन लोगों के मुकदमे लड़ रहे थे, जिन्हें पुलिस आतंकी होने के अंदेशे में जेल में डाल देती है। फिर उनकी सुनने वाला कोई नहीं होता। शाहिद ने अपने सात साल के कैरियर में ऐसे 17 लोगों को जेल से रिहा कराया। लेकिन शाहिद का एक अतीत भी था...।
वह किसी समय आतंकी कैंपों में रह कर ट्रेनिंग ला चुका था। जेल में सजा काट चुका था। इस सजा के दौरान ही उससे लॉ पढ़ने की ठानी और वकील बना। यह फिल्म स्याह-सफेद के संगम की रेखा से तैयार की गई तस्वीर है। हिंदी में ईमानदारी से बनी बायोपिक कम ही हैं।
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उन्हें या तो डॉक्यूमेंट्री की तरह बना दिया जाता है या फिर कॉमर्शियल रूप देने के लिए तड़का मार दिया जाता है। लेकिन हंसल की शाहिद इन दोनों से अलग है। वह सचमुच एक जीवन को आपके सामने ऐसे रखती है कि आप उसके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं।
इस समाज, समय और व्यवस्था को लेकर आपकी भावनाएं उद्वेलित होती हैं। फिल्म का कथानक तो आकर्षक है ही, इसका फिल्मांकन यथार्थ के धरातल पर खड़ा है। खास तौर पर अदालत की कार्यप्रणाली को जिस ढंग से हंसल ने फिल्माया है, वह किसी और हिंदी फिल्म में अभी तक आपने नहीं देखा होगा।
शाहिद को आप दिमाग से देखते और दिल से महसूस करते हैं। एक अच्छी फिल्म आपको इसी स्थिति में ले जाकर खड़ा करती है। शाहिद की भूमिका में राज कुमार यादव का अभिनय शानदार है। लव सेक्स और धोखा, काय पो चे और तलाश जैसी फिल्मों का यह अभिनेता इस फिल्म में अपने कैरियर की अब तक की सबसे बेहतरीन भूमिका में है।
शाहिद ने पूरी फिल्म में सहज जीवन, प्रेम और आक्रोश के दृश्यों में संतुलन बनाए रखा है। प्रभलीन संधु, मोहम्मद जीशान अयूब, केके मेनन, विपिन शर्मा, बलजिंदर कौर ने उनके किरदार को निखारने में पूरा योगदान दिया है। २००८ में वुडस्टॉक विलाज् बनाने वाले हंसल ने इस फिल्म के साथ जो वापसी की है, वह उन्हें एक राह पर आगे ले जाएगी। उनकी अगली फिल्म का इंतजार किया जाएगा।
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शाहिद उन लोगों के मुकदमे लड़ रहे थे, जिन्हें पुलिस आतंकी होने के अंदेशे में जेल में डाल देती है। फिर उनकी सुनने वाला कोई नहीं होता। शाहिद ने अपने सात साल के कैरियर में ऐसे 17 लोगों को जेल से रिहा कराया। लेकिन शाहिद का एक अतीत भी था...।
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वह किसी समय आतंकी कैंपों में रह कर ट्रेनिंग ला चुका था। जेल में सजा काट चुका था। इस सजा के दौरान ही उससे लॉ पढ़ने की ठानी और वकील बना। यह फिल्म स्याह-सफेद के संगम की रेखा से तैयार की गई तस्वीर है। हिंदी में ईमानदारी से बनी बायोपिक कम ही हैं।
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उन्हें या तो डॉक्यूमेंट्री की तरह बना दिया जाता है या फिर कॉमर्शियल रूप देने के लिए तड़का मार दिया जाता है। लेकिन हंसल की शाहिद इन दोनों से अलग है। वह सचमुच एक जीवन को आपके सामने ऐसे रखती है कि आप उसके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं।
इस समाज, समय और व्यवस्था को लेकर आपकी भावनाएं उद्वेलित होती हैं। फिल्म का कथानक तो आकर्षक है ही, इसका फिल्मांकन यथार्थ के धरातल पर खड़ा है। खास तौर पर अदालत की कार्यप्रणाली को जिस ढंग से हंसल ने फिल्माया है, वह किसी और हिंदी फिल्म में अभी तक आपने नहीं देखा होगा।
शाहिद को आप दिमाग से देखते और दिल से महसूस करते हैं। एक अच्छी फिल्म आपको इसी स्थिति में ले जाकर खड़ा करती है। शाहिद की भूमिका में राज कुमार यादव का अभिनय शानदार है। लव सेक्स और धोखा, काय पो चे और तलाश जैसी फिल्मों का यह अभिनेता इस फिल्म में अपने कैरियर की अब तक की सबसे बेहतरीन भूमिका में है।
शाहिद ने पूरी फिल्म में सहज जीवन, प्रेम और आक्रोश के दृश्यों में संतुलन बनाए रखा है। प्रभलीन संधु, मोहम्मद जीशान अयूब, केके मेनन, विपिन शर्मा, बलजिंदर कौर ने उनके किरदार को निखारने में पूरा योगदान दिया है। २००८ में वुडस्टॉक विलाज् बनाने वाले हंसल ने इस फिल्म के साथ जो वापसी की है, वह उन्हें एक राह पर आगे ले जाएगी। उनकी अगली फिल्म का इंतजार किया जाएगा।