राजश्री देशपांडे उन अभिनेत्रियों में से एक हैं जो न सिर्फ पर्दे पर दमदार किरदार निभाती हैं, बल्कि असल जिंदगी में भी समाज के लिए कुछ बड़ा करने की कोशिश में रहती हैं। साल 2024 की फिल्म 'सत्यशोधक' में सावित्रीबाई फुले का किरदार निभाने के लिए उन्हें प्रशंसा से लेकर पुरस्कार तक मिल चुके हैं। इस फिल्म में उन्होंने जिस संजीदगी से सावित्रीबाई की भूमिका निभाई है, वैसा ही जज्बा उनकी असल जिंदगी में भी दिखता है।
Rajshri Deshpande: सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, असल जिंदगी की भी दमदार नायिका, लेकिन…
Rajshri Deshpande: राजश्री देशपांडे सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी दमदार नायिका हैं। समाज के लिए उन्होंने अब तक कई सराहनीय काम किए हैं।
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सावित्रीबाई की तरह ही राजश्री महाराष्ट्र के कई गांवों में लड़कियों की शिक्षा के लिए काम कर रही हैं। हालांकि, उनका यह सफर इतना आसान भी नहीं है। इस काम में उनके सामने कई चुनौतियां भी हैं। राजश्री का काम सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है। उन्होंने 30 गांवों में पानी की सप्लाई बहाल करने और 200 शौचालयों के लिए सरकारी फंड जुटाने में अहम भूमिका निभाई है। इतना ही नहीं, उन्होंने महिलाओं के लिए स्कूल खोले और कई कपास चुनने वाली महिलाओं को शिक्षक बनने का मौका दिया।
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उनकी ये कोशिशें दिखाती हैं कि वह समाज में बदलाव लाने के लिए कितनी गंभीर हैं। फिल्म 'सत्यशोधक' में ज्योतिराव फुले का किरदार निभाने वाले संदीप कुलकर्णी को भी राजश्री के सामाजिक कामों की जानकारी थी। जब संदीप ने उनसे संपर्क किया तो वह एक गांव में स्वच्छता प्रोजेक्ट में व्यस्त थीं। 'सत्यशोधक' फिल्म का सफर भी आसान नहीं रहा। साल 2017 में घोषित इस फिल्म को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। निर्माता पीछे हट गए और प्रोडक्शन में देरी हुई। आखिरकार 5 जनवरी 2024 को यह फिल्म रिलीज हुई। इसमें गणेश यादव और रवींद्र मनकानी जैसे कलाकार भी नजर आए।
फिल्म को लेकर राजश्री ने कहा, “फिल्म से सबसे प्रेरणादायक चीज थी ज्योतिराव और सावित्रीबाई के सुधारों के बारे में जानना और उनकी गहरी दोस्ती। एक सीन में सावित्रीबाई के पिता माफी मांगते हैं कि उनकी बेटी मां नहीं बन सकी और ज्योतिराव से दूसरी शादी करने को कहते हैं, लेकिन ज्योतिराव कहते हैं कि गलती उनकी है। उस जमाने में एक पुरुष का अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करना और इसके लिए आवाज़ उठाना वाकई कमाल का था।”
असल जिंदगी में राजश्री मराठवाड़ा के सूखाग्रस्त इलाके में एक और स्कूल बनाने के लिए फंड जुटाने की जद्दोजहद में लगी हैं। साल 2018 से अपनी नभांगन फाउंडेशन के जरिए वह जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश कर रही हैं। उनका मानना है कि सिर्फ पर्दे पर मजबूत किरदार निभाना ही काफी नहीं, बल्कि असल में कुछ करना जरूरी है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उनकी इस सोच को हमेशा स्वीकार नहीं किया जाता। राजश्री कहती हैं, “मैंने जमीनी बदलाव की बात शुरू करने की कोशिश की, लेकिन लोग सुनना नहीं चाहते। कई बार मुझे रोल्स इसलिए नहीं मिलते क्योंकि मैं प्रमोशनल इंटरव्यू देने की बजाय अपने स्कूल और गांव के काम के बारे में बात करना पसंद करती हूं।”