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Ambala News: साइंस उद्योग पर ड्रैगन का साया, ट्रेडिंग की तरफ बढ़ रहे निर्माता

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 01 Feb 2026 02:26 AM IST
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Dragon's shadow on science industry, manufacturers moving towards trading
ग्लासवेयर यूनिट में काम करता कर्मचारी। संवाद
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- चीन से आयातित सस्ते उपकरणों के आने से मेक इन इंडिया के बजाय ट्रेडिंग का बढ़ा चलन
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वैभव शर्मा

अंबाला। साइंस उद्योग पर ड्रैगन यानि चीन का साया गहराने लगा है। चीन से आने वाले सस्ते साइंस उपकरणों और लैब के सामान ने भारतीय निर्माताओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। स्थिति यह है कि जो इकाइयां कभी स्वदेशी उपकरणों का निर्माण करती थीं, वे अब मैन्युफेक्चरिंग छोड़ चीन से माल मंगवाकर बेचने यानी ट्रेडिंग को प्राथमिकता दे रही हैं। इससे स्थानीय स्तर पर शोध और गुणवत्तापूर्ण निर्माण को झटका लग रहा है।
देश के प्रमुख साइंस हब जैसे हरियाणा का अंबाला, दिल्ली और गुजरात के औद्योगिक क्षेत्रों में अब ट्रेडिंग का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। कभी अंबाला के बने उपकरण दुनियाभर में प्रसिद्ध थे, लेकिन आज वहां के बाजार में चीनी उत्पादों की भरमार है। स्थानीय उद्यमियों का कहना है कि चीन से तैयार माल मंगवाना, यहां कच्चा माल जुटाकर निर्माण करने से काफी सस्ता पड़ता है। अंबाला में 150 से अधिक साइंस उपकरण बनाने वाले निर्माता हैं, जो 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक का कारोबार सालाना करते हैं। एशिया के कई देशों में साइंस उपकरणों की सप्लाई भी करते हैं।
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निर्माताओं की बढ़ीं मुश्किलें

चीन से आ रहे सस्ते सामान के कारण उन निर्माताओं को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है, जिन्होंने भारी निवेश कर फैक्ट्रियां स्थापित की हैं। चीनी सामान की कीमत भारतीय लागत से 30 से 40 प्रतिशत तक कम होती है। कम दाम के चलते सरकारी और निजी टेंडर में स्वदेशी उत्पादों को जगह नहीं मिल पा रही है। अंबाला का भी साइंस उद्योग धीरे-धीरे तकनीकी रूप से चीन पर निर्भर होता जा रहा है। इसमें ग्लासवेयर इंडस्ट्री तो अब चीन से आयातित ग्लास ट्यूब पर भी पूरी तरह से निर्भर हो गई है। अगर चीन से यह ट्यूब न आए तो ग्लासवेयर साइंस उत्पाद बनाने का संकट खड़ा हो जाएगा। इतना ही नहीं देशभर के शिक्षण संस्थानों में ऐसे मैटेरियल की साइंस किटें पहुंच रही हैं, जिन्हें देखा जा सकता है उपयोग करना मुश्किल है, जबकि इसकी तुलना में स्थानीय स्तर पर बनी साइंस किटें काफी अच्छी गुणवत्ता की हैं। इसी प्रकार माइक्रोस्कोप का लैंस भी आयात हो रहा है।
एमएसएमई को लग सकता है झटका

साइंटिफिक अपार्ट्स मैन्युफेक्चरर्स एंड एक्सपोटर्स के प्रधान अश्वनी नागपाल बताते हैं कि यही स्थिति बनी रही तो भविष्य में सूक्ष्म एवं लघु उद्योग के तहत चलने वाली साइंस इंडस्ट्रीज का काम काफी कम हो जाएगा। ट्रेडिंग की तरफ कारोबारी इसलिए बढ़ रहे हैं क्याेंकि इंडस्ट्री लगाना काफी महंगा हो रहा है। बिजली पर कोई राहत नहीं है। साथ ही बाजार में आयातित उत्पाद प्रतिस्पर्धा को बढ़ा रहे हैं, ऐसे में अगर कोई निर्माण यूनिट लगा भी लेता है तो उसे श्रमिक नहीं मिलते हैं। यही कारण है कि लोग ट्रेडिंग की तरफ बढ़ रहे हैं। फिलहाल, शॉर्ट-टर्म मुनाफे के चक्कर में बढ़ रहा ट्रेडिंग का यह रुझान देश के औद्योगिक भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।
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