{"_id":"6a7401459e4f876edc0dfaf8","slug":"harappan-era-mound-in-bhiwani-of-tigdana-under-threat-from-farming-for-over-decade-2026-08-06","type":"story","status":"publish","title_hn":"Haryana: भिवानी में डेढ़ दशक से खेती की चपेट में तिगड़ाना का हड़प्पाकालीन टीला, मूकदर्शक बना पुरातत्व विभाग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Haryana: भिवानी में डेढ़ दशक से खेती की चपेट में तिगड़ाना का हड़प्पाकालीन टीला, मूकदर्शक बना पुरातत्व विभाग
Thu, 06 Aug 2026 09:06 AM IST
Naveen
संजय वर्मा, भिवानी (हरियाणा)
संजय वर्मा, भिवानी (हरियाणा)
Published by: Naveen
Updated Thu, 06 Aug 2026 09:06 AM IST
सार
गांव तिगड़ाना हड़प्पाकालीन मानव सभ्यता का एक प्राचीन गढ़ रहा है। यहां से पुरातत्व विभाग को ऐसी दुर्लभ वस्तुएं बरामद हो चुकी हैं जिनका उपयोग करीब पांच हजार वर्ष पहले लोग दैनिक जीवन में करते थे।
विज्ञापन
गांव तिगड़ाना का हड़प्पा कालीन सभ्यता से जुड़ा ऐतिहासिक टीले पर अवैध मिट्टी खनन के बाद के हालाात।
- फोटो : संवाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
गांव तिगड़ाना का हड़प्पाकालीन ऐतिहासिक टीला पिछले करीब डेढ़ दशक से खेती और मिट्टी के अवैध खनन की चपेट में है। इस दौरान पुरातत्व विभाग प्रभावी संरक्षण नहीं कर सका। हरियाणा सरकार ने 13 मार्च 2025 को अधिसूचना जारी कर तिगड़ाना और मिताथल के हड़प्पाकालीन टीलों को संरक्षित पुरातात्विक स्थल घोषित किया लेकिन तब तक तिगड़ाना का टीला काफी हद तक सिमट चुका था।
विज्ञापन
विभाग की ओर से चहारदीवारी कराने का दावा किया जा रहा है लेकिन अभी तक धरातल पर इसका कोई कार्य दिखाई नहीं देता। गांव के लोग भी अपनी आंखों के सामने सिमटती इस ऐतिहासिक धरोहर को लेकर चिंता जता रहे हैं। करीब 25 एकड़ में फैला यह हड़प्पाकालीन टीला अब सिमटकर लगभग आधा एकड़ रह गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले करीब 15 वर्षों से टीले की मिट्टी का अवैध खनन होता रहा जिससे इसका स्वरूप लगातार खत्म होता गया।
विज्ञापन
गांव की मुख्य आबादी से करीब ढाई किलोमीटर दूर स्थित यह टीला चारों ओर खेतों से घिरा है तथा इसके निकट बड़ी नहर गुजरती है। ग्रामीणों का कहना है कि अवैध खनन रोकने के लिए न तो प्रभावी निगरानी हुई और न ही कार्रवाई। उनका आरोप है कि जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग की उदासीनता के कारण ऐतिहासिक धरोहर लगातार सिकुड़ती गई।
विज्ञापन
प्रतिक्रिया
गांव तिगड़ाना हड़प्पाकालीन मानव सभ्यता का एक प्राचीन गढ़ रहा है। यहां से पुरातत्व विभाग को ऐसी दुर्लभ वस्तुएं बरामद हो चुकी हैं जिनका उपयोग करीब पांच हजार वर्ष पहले लोग दैनिक जीवन में करते थे। यह गांव की ऐतिहासिक पहचान का बड़ा प्रमाण है मगर अब यहां कुछ भी संरक्षित नहीं दिखता। केवल नाममात्र का संरक्षण किया जा रहा है। - अनुपाल सिंह, समाजसेवी।
तिगड़ाना टीले पर पुरातत्व विभाग कई बार खोदाई कर चुका है। हर बार हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े प्रमाण मिले हैं। यह दावा भी किया गया कि यहां उस समय चूड़ियां बनाने का बड़ा केंद्र रहा होगा क्योंकि खोदाई में बड़ी संख्या में चूड़ियां मिली हैं। धरोहर को शोधार्थियों और भावी पीढ़ी के लिए संरक्षित करना जरूरी है। यहां से मिली वस्तुएं आज भी उस समृद्ध सभ्यता की कहानी बयां कर रही हैं। -मास्टर उदय सिंह।
तिगड़ाना की भूमि के नीचे आज भी हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े अनेक रहस्य छिपे हैं। उनका वैज्ञानिक अध्ययन इस सभ्यता को समझने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। ऐसे ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण जरूरी है ताकि भावी पीढ़ी अपने पूर्वजों के रहन-सहन और इतिहास को समझ सके। - अमित तंवर, समाजसेवी।
हड़प्पा काल की सिंधु घाटी सभ्यता के कई ऐतिहासिक स्थल भिवानी जिले में मौजूद हैं लेकिन तिगड़ाना का ऐतिहासिक टीला अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। केवल अधीन घोषित कर देने से धरोहर सुरक्षित नहीं होगी। इसके संरक्षण के लिए धरातल पर ठोस कार्य होना आवश्यक है। -राजकुमार प्रधान, समाजसेवी।
गांव तिगड़ाना में हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिल चुके हैं और टीले को पुरातत्व विभाग की धरोहर घोषित किया जा चुका है। कुछ समय पहले ग्राम पंचायत ने पुरातत्व विभाग से लिखित प्रस्ताव प्राप्त किया था जिसमें पूरे क्षेत्र की चहारदीवारी के लिए बजट स्वीकृत कराने की बात कही गई थी। पंचायत का प्रयास है कि धरोहर का संरक्षण हो और भविष्य में यहां पर्यटन को भी बढ़ावा मिले। -डॉ. सुरेंद्र दहिया, सरपंच, तिगड़ाना।
अधिकारी के अनुसार
पुरातत्व विभाग ने तिगड़ाना के ऐतिहासिक टीले को अपने अधीन लिया हुआ है। इस जगह को संरक्षित करने के लिए सरकार जल्द ही ठोस कदम उठाएगी। इसके प्रयास चल रहे हैं। - डॉ. नरेंद्र सिंह परमार, डिप्टी डायरेक्टर, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, हरियाणा।