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मलबे के निस्तारण में पिछड़ रहे हरियाणा के शहर: स्वच्छ सर्वेक्षण में कट सकते हैं अंक, तीन प्लांट लगेंगे
Mon, 19 Oct 2026 09:12 AM IST
Nivedita
अरूण शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
अरूण शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Mon, 19 Oct 2026 09:12 AM IST
सार
सोनीपत में 100 टन और पानीपत में 50 टन प्रतिदिन क्षमता के प्लांट लगाए जाएंगे। सोनीपत में गांव रेवली के पास 10 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है। इस पर करीब नौ करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यहां काम कराने के लिए तीन एजेंसियों ने रुचि दिखाई है।
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निर्माण मलबा
- फोटो : फाइल
विस्तार
निर्माण कार्यों से निकलने वाले मलबे के निस्तारण में हरियाणा के शहर पिछड़ रहे हैं। कई जगह मलबा खुले में डाला जा रहा है तो कहीं प्लांट के लिए जमीन चिह्नित करने के बाद भी काम आगे नहीं बढ़ा है। इससे शहरों की सफाई व्यवस्था प्रभावित हो रही है और स्वच्छ सर्वेक्षण में अंक कटने का खतरा बना हुआ है। अब मलबे के निस्तारण के लिए मानेसर, सोनीपत और पानीपत में प्लांट लगाने की तैयारी है। तीनों प्लांटों की कुल क्षमता 450 टन प्रतिदिन होगी।
मानेसर में होंडा इंडिया फाउंडेशन कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत 300 टन प्रतिदिन क्षमता का प्लांट लगाएगी। नगर निगम और कंपनी के बीच समझौता हो चुका है। निगम इसके लिए चार एकड़ जमीन देगा और निर्माण का पूरा खर्च कंपनी उठाएगी। सभी एनओसी समय पर मिल गईं तो अगले साल मार्च-अप्रैल तक प्लांट तैयार होने की उम्मीद है।
सोनीपत में 100 टन और पानीपत में 50 टन प्रतिदिन क्षमता के प्लांट लगाए जाएंगे। सोनीपत में गांव रेवली के पास 10 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है। इस पर करीब नौ करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यहां काम कराने के लिए तीन एजेंसियों ने रुचि दिखाई है। पानीपत में बिंझौल डेयरी, निंबरी और बरसत रोड पर प्लांट के लिए संभावित जगह चिह्नित की गई हैं। अधिकारी अभी योजना तैयार कर रहे हैं।
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कई शहरों में मलबे के निस्तारण का इंतजाम नहीं
प्रदेश के दूसरे शहरों में स्थिति चिंताजनक है। हिसार और रोहतक में जमीन चिह्नित होने के बावजूद काम आगे नहीं बढ़ा है। रेवाड़ी के मनेठी में प्लांट होने के बाद भी काम नहीं हो रहा। सिरसा में एजेंसी ठीक से काम नहीं कर रही। फतेहाबाद, भिवानी और चरखी दादरी में प्लांट के लिए जगह तक तय नहीं हुई है। अंबाला में 32 टन क्षमता का प्लांट लगाने के लिए 3.68 करोड़ रुपये की निविदा जारी की गई है। बहादुरगढ़ में रोज करीब 2.5 टन मलबा अलग-अलग निचले इलाकों में डाल दिया जाता है। नारनौल में गांव रघुनाथपुरा में प्लांट लगाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
धूल सेहत के लिए भी खतरा
पर्यावरण विश्लेषक सुनील दहिया के अनुसार, खुले में पड़े निर्माण मलबे से उड़ने वाली धूल लोगों के फेफड़ों तक पहुंचती है और वायु गुणवत्ता खराब करती है। मलबे के ढेर पर दूसरे कचरे के जमा होने से गंदगी भी बढ़ती है। वैज्ञानिक तरीके से मलबे को दोबारा इस्तेमाल योग्य बनाया जा सकता है। इससे निर्माण सामग्री की मांग भी घटेगी।
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मानेसर में होंडा इंडिया फाउंडेशन कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत 300 टन प्रतिदिन क्षमता का प्लांट लगाएगी। नगर निगम और कंपनी के बीच समझौता हो चुका है। निगम इसके लिए चार एकड़ जमीन देगा और निर्माण का पूरा खर्च कंपनी उठाएगी। सभी एनओसी समय पर मिल गईं तो अगले साल मार्च-अप्रैल तक प्लांट तैयार होने की उम्मीद है।
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सोनीपत में 100 टन और पानीपत में 50 टन प्रतिदिन क्षमता के प्लांट लगाए जाएंगे। सोनीपत में गांव रेवली के पास 10 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है। इस पर करीब नौ करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यहां काम कराने के लिए तीन एजेंसियों ने रुचि दिखाई है। पानीपत में बिंझौल डेयरी, निंबरी और बरसत रोड पर प्लांट के लिए संभावित जगह चिह्नित की गई हैं। अधिकारी अभी योजना तैयार कर रहे हैं।
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कई शहरों में मलबे के निस्तारण का इंतजाम नहीं
प्रदेश के दूसरे शहरों में स्थिति चिंताजनक है। हिसार और रोहतक में जमीन चिह्नित होने के बावजूद काम आगे नहीं बढ़ा है। रेवाड़ी के मनेठी में प्लांट होने के बाद भी काम नहीं हो रहा। सिरसा में एजेंसी ठीक से काम नहीं कर रही। फतेहाबाद, भिवानी और चरखी दादरी में प्लांट के लिए जगह तक तय नहीं हुई है। अंबाला में 32 टन क्षमता का प्लांट लगाने के लिए 3.68 करोड़ रुपये की निविदा जारी की गई है। बहादुरगढ़ में रोज करीब 2.5 टन मलबा अलग-अलग निचले इलाकों में डाल दिया जाता है। नारनौल में गांव रघुनाथपुरा में प्लांट लगाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
धूल सेहत के लिए भी खतरा
पर्यावरण विश्लेषक सुनील दहिया के अनुसार, खुले में पड़े निर्माण मलबे से उड़ने वाली धूल लोगों के फेफड़ों तक पहुंचती है और वायु गुणवत्ता खराब करती है। मलबे के ढेर पर दूसरे कचरे के जमा होने से गंदगी भी बढ़ती है। वैज्ञानिक तरीके से मलबे को दोबारा इस्तेमाल योग्य बनाया जा सकता है। इससे निर्माण सामग्री की मांग भी घटेगी।