हरियाणा में छोटे हो रहे परिवार: हम दो हमारे दो नहीं, अब हम दो हमारा एक की हो रही सोच; प्रजनन दर 1.9 पहुंची
हरियाणा में छोटे परिवार की सोच बढ़ रही है। महिलाओं की शिक्षा का स्तर बढ़ना, रोजगार में उनकी बढ़ती भागीदारी, विवाह की बढ़ती आयु, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और परिवार नियोजन के साधनों की आसान उपलब्धता ने परिवारों को छोटा बनाने में अहम भूमिका निभाई है। साथ ही बढ़ती महंगाई और बच्चों की शिक्षा पर बढ़ते खर्च ने भी लोगों को सीमित परिवार की ओर प्रेरित किया है।
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बदलती जीवनशैली, बढ़ती शिक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं ने हरियाणा के परिवारों की तस्वीर बदल दी है। बड़े परिवारों की जगह अब छोटे परिवार ले रहे हैं। हम दो हमारे दो की जगह अब हम दो हमारे एक ने जगह ले ली है। घरों में बच्चों की संख्या घट रही है।
नई पीढ़ी परिवार नियोजन को पहले से अधिक महत्व दे रही है। यही वजह है कि राज्य की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट-टीएफआर) अब घटकर 1.9 पर पहुंच गई है। यह आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि हरियाणा के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य की बदलती तस्वीर का संकेत भी है।
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा में एक महिला अपने प्रजनन काल में औसतन 1.9 बच्चों को जन्म दे रही है। यह दर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से भी नीचे है। प्रतिस्थापन स्तर वह सीमा मानी जाती है, जिस पर एक पीढ़ी खुद को अगली पीढ़ी में बनाए रख सकती है। इसके नीचे जाने का अर्थ है कि आने वाले वर्षों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
रिपोर्ट बताती है कि हरियाणा में शहरों ने इस बदलाव की अगुवाई की है। शहरी क्षेत्रों में प्रजनन दर घटकर 1.6 रह गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 2.0 दर्ज की गई है। यानी शहरों में दो से भी कम बच्चों वाले परिवार अब सामान्य होते जा रहे हैं, जबकि गांव भी धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं।
12 साल में बदला परिवारों का गणित
पिछले 12 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो बदलाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। वर्ष 2012-14 के दौरान हरियाणा की कुल प्रजनन दर 2.2 थी, जो 2022-24 में घटकर 1.9 रह गई। पिछले 12 वर्षों में हरियाणा की कुल प्रजनन दर में 0.3 अंकों यानी करीब 13.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 2.3 से घटकर 2.1 हुई, जबकि शहरी क्षेत्रों में 2.0 से घटकर 1.7 तक पहुंच गई। प्रतिशत के हिसाब से शहरों में 15 फीसदी और गांवों में 8.7 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। दिलचस्प बात यह है कि हरियाणा अब राष्ट्रीय औसत के बराबर पहुंच चुका है। वर्ष 2024 में भारत की कुल प्रजनन दर भी 1.9 दर्ज की गई है और हरियाणा भी इसी स्तर पर आ गया है। हालांकि ग्रामीण हरियाणा की प्रजनन दर अभी भी राष्ट्रीय शहरी औसत 1.5 से ऊपर है, जबकि शहरी हरियाणा देश के शहरी औसत के काफी करीब पहुंच चुका है।
प्रजनन दर : इसका मतलब बच्चा पैदा कर सकने वाली उम्र की महिलाओं (आमतौर पर 15 से 44 या 49 वर्ष) द्वारा दिए गए जन्मों की संख्या से है। इसका सबसे मुख्य पैमाना कुल प्रजनन दर है, जो यह दर्शाता है कि एक महिला अपने पूरे जीवनकाल में औसतन कितने बच्चे पैदा करती है।
प्रतिस्थापन स्तर : किसी देश या क्षेत्र की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आदर्श कुल प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए। जब किसी क्षेत्र या देश की प्रजनन दर 2.1 से नीचे गिर जाती है तो वहां की आबादी कम होने लगती है और और बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगती है।
आबादी घटने के साथ विकास पर भी पड़ेगा असर
सेंट्रल यूनिवर्सिटी जम्मू के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान के पूर्व डीन अश्विनी कुमान नंदा कहते हैं कि यदि टीएफआर 2.1 से कम हुआ तो इसका मतलब है कि जितने लोग दुनिया से जा रहे हैं, उतने लोग जन्म नहीं ले रहे। प्रजनन दर कम होने का सीधा असर आबादी पर पड़ेगा। आबादी कम होगी। विकास भी धीमा होगा। माइग्रेशन भी बढ़ेगा। मगर इसका असर 20 से 25 साल में देखने को मिल सकता है। अब महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं और नौकरी कर रही हैं। परिवार नियोजन के साधन सुलभ है। इसलिए हरियाणा में प्रजनन दर कम हुई है।