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Chandigarh-Haryana News: अरावली पर्वतमाला की सीमा तय करने पर हाईकोर्ट सख्त
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-प्रधान मुख्य वन संरक्षक से अरावली के सटीक क्षेत्र को परिभाषित करने का विस्तृत हलफनामा तलब
-हरिंदर ढींगरा की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जारी किया आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अरावली पर्वतमाला से जुड़े क्षेत्रों की पहचान और संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह अरावली रेंज में आने वाले सटीक और स्पष्ट क्षेत्रों को परिभाषित करते हुए विस्तृत शपथपत्र दाखिल करे। इसके लिए राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह आदेश हरिंदर ढींगरा की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया।
अदालत ने कहा कि अरावली पर्वतमाला की भौगोलिक सीमा को लेकर लंबे समय से अस्पष्टता बनी हुई है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों के साथ-साथ अवैध खनन, अनधिकृत निर्माण और वन भूमि के दुरुपयोग पर प्रभावी कार्रवाई में बाधा आ रही है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दाखिल किए जाने वाले शपथपत्र में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के साथ-साथ 29 नवंबर 2025 को पारित ताजा आदेश का भी उल्लेख अनिवार्य रूप से किया जाए। यह आदेश टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपद बनाम भारत संघ मामले से संबंधित है जिसमें देशभर की वन भूमि और पर्यावरण संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
अदालत ने टिप्पणी की कि अरावली पर्वतमाला एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र है और इसकी सटीक सीमा तय होना पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है। न्यायालय ने कहा कि स्पष्ट सीमांकन के बिना संरक्षण कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना संभव नहीं है। हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देशों के अनुपालन के लिए समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 9 जनवरी 2026 को निर्धारित की है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि शपथपत्र के अध्ययन के बाद आगे और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
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-हरिंदर ढींगरा की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जारी किया आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अरावली पर्वतमाला से जुड़े क्षेत्रों की पहचान और संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह अरावली रेंज में आने वाले सटीक और स्पष्ट क्षेत्रों को परिभाषित करते हुए विस्तृत शपथपत्र दाखिल करे। इसके लिए राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह आदेश हरिंदर ढींगरा की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया।
अदालत ने कहा कि अरावली पर्वतमाला की भौगोलिक सीमा को लेकर लंबे समय से अस्पष्टता बनी हुई है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों के साथ-साथ अवैध खनन, अनधिकृत निर्माण और वन भूमि के दुरुपयोग पर प्रभावी कार्रवाई में बाधा आ रही है।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दाखिल किए जाने वाले शपथपत्र में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के साथ-साथ 29 नवंबर 2025 को पारित ताजा आदेश का भी उल्लेख अनिवार्य रूप से किया जाए। यह आदेश टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपद बनाम भारत संघ मामले से संबंधित है जिसमें देशभर की वन भूमि और पर्यावरण संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
अदालत ने टिप्पणी की कि अरावली पर्वतमाला एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र है और इसकी सटीक सीमा तय होना पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है। न्यायालय ने कहा कि स्पष्ट सीमांकन के बिना संरक्षण कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना संभव नहीं है। हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देशों के अनुपालन के लिए समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 9 जनवरी 2026 को निर्धारित की है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि शपथपत्र के अध्ययन के बाद आगे और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं।