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भाजपा की नीतियों से पशुपालकों को झेलना पड़ रहा नुकसान : दिग्विजय
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पशु चारे व संबंधित सामग्री पर महंगाई से राहत दिलाने की मांग उठाई
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। जजपा के युवा प्रदेशाध्यक्ष दिग्विजय सिंह चौटाला ने कहा कि भाजपा सरकार की नीतियों और लगातार बढ़ती महंगाई के कारण दुग्ध उत्पादकों और पशुपालकों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है। पशुओं के चारे, खल, बिनौले और अन्य आवश्यक सामग्री के दाम लगातार बढ़ रहे हैं जबकि दूध के भाव उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं।
दिग्विजय ने कहा कि आज एक अच्छी दुधारू भैंस की कीमत 2 से 3 लाख रुपये तक पहुंच गई है। गाय खरीदने पर भी 50 हजार से एक लाख रुपये तक खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा पशुओं के लिए बिनौला, चना चूरी, सरसों खल, सोयाबीन और अन्य चारे की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में पशुपालकों का खर्च लगातार बढ़ रहा है और उन्हें दुग्ध उत्पादन में लाभ के बजाय नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि पशु चारे और संबंधित सामग्री पर राहत दी जाए ताकि दुग्ध उत्पादकों को आर्थिक सहायता मिल सके। दिग्विजय ने चेतावनी दी कि यदि लागत बढ़ती रही और पशुपालकों को राहत नहीं मिली तो भविष्य में कई किसान पशुपालन छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं जिसका असर दूध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। जजपा के युवा प्रदेशाध्यक्ष दिग्विजय सिंह चौटाला ने कहा कि भाजपा सरकार की नीतियों और लगातार बढ़ती महंगाई के कारण दुग्ध उत्पादकों और पशुपालकों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है। पशुओं के चारे, खल, बिनौले और अन्य आवश्यक सामग्री के दाम लगातार बढ़ रहे हैं जबकि दूध के भाव उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं।
दिग्विजय ने कहा कि आज एक अच्छी दुधारू भैंस की कीमत 2 से 3 लाख रुपये तक पहुंच गई है। गाय खरीदने पर भी 50 हजार से एक लाख रुपये तक खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा पशुओं के लिए बिनौला, चना चूरी, सरसों खल, सोयाबीन और अन्य चारे की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में पशुपालकों का खर्च लगातार बढ़ रहा है और उन्हें दुग्ध उत्पादन में लाभ के बजाय नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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उन्होंने सरकार से मांग की कि पशु चारे और संबंधित सामग्री पर राहत दी जाए ताकि दुग्ध उत्पादकों को आर्थिक सहायता मिल सके। दिग्विजय ने चेतावनी दी कि यदि लागत बढ़ती रही और पशुपालकों को राहत नहीं मिली तो भविष्य में कई किसान पशुपालन छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं जिसका असर दूध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।