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Fatehabad News: हस्तकला में हासिल की महारथ, देशभर में पहुंची सुनीता के बर्तनों और कृषि उपकरणों की धमक
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Sun, 08 Mar 2026 12:14 AM IST
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गांव मानावाली की महिला सुनीता ओडिशा के मेले में स्टॉल लगाकर अपने सामान की बिक्री करती। स्रोत: स
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फतेहाबाद। ठान लो तो क्या नहीं हो सकता। इस वाक्य को न जाने कितने ही बार सुना होगा। कुछ लोग होते हैं जो इस तरह की बातों को न केवल सुनते हैं बल्कि जीवन में आत्मसात कर लेते हैं। फतेहाबाद जिले के गांव मानावाली की सुनीता भी इन्हीं में से एक है। इन्होंने अपनी मेहनत से जीवन को एक नई राह दिखाई है। कक्षा आठवीं तक पढ़ी सुनीता ने ऐसे काम को चुना जिसे पुरुष प्रधान माना जाता रहा है। लोहार समाज से ताल्लुक रखने वाली सुनीता ने अपने पुश्तैनी काम को ही संजोए रखने की ठानी और बर्तन और कृषि उपकरण बनाना शुरू कर दिया। पत्नी की हिम्मत देख पति ने कदमताल की। आज सुनीता और उनके परिवार के हाथ के बने सामान की धमक अब हरियाणा से निकलकर दूसरे राज्यों तक जा पहुंची है।
वे देश के प्रसिद्ध मेलों जैसे ओडिशा, राजस्थान के पुष्कर, गोगामेड़ी और झज्जर के मेलों में अपनी स्टॉल लगाती हैं। सुनीता ने बताया कि पहले ग्रामीण अंचल में हस्तकला सामान परिवार की अर्थव्यवस्था का आधार होता था। मशीनीकरण और बाजार में आए सस्ते प्लास्टिक व एल्युमीनियम के बर्तनों ने इस कला को कम कर दिया। लोहार समाज का काम हाशिये पर था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से बड़ा मंच मिला तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। संवाद
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लाखों का मुनाफा, यह बनाती हैं बर्तन
सुनीता और उनका परिवार मिलकर लोहे की कड़ाही, तवे, चिमटे, पलटे और खेती-किसानी में काम आने वाले औजार जैसे कस्सी, कुल्हाड़ी, करौंती और दरांती तैयार कर रहे हैं। उनके बनाए बर्तनों की मजबूती मशीनी उत्पादों में नजर नहीं आती। उनके बनाए गए बर्तनों को आकर्षक डिजाइन और मजबूती के कारण लोग पसंद कर रहे हैं। अपनी कड़ी मेहनत और हुनर के दम पर वे सालाना लाखों रुपये का मुनाफा कमा रही हैं। सुनीता गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के प्रति जागरूक कर रही हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनने का संदेश दे रही हैं।
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स्वयं सहायता समूह और आजीविका मिशन का मिला सहारा
सुनीता ने अपने पति मनीष के साथ मिलकर लोहे के पारंपरिक औजारों के साथ-साथ नए डिजाइन के बर्तन और घरेलू उपयोग की सामग्री बनाना शुरू कर दिया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने संजीवनी का काम किया। मिशन से जुड़ने के बाद उन्हें आर्थिक सहायता और मार्गदर्शन मिला, उनके उत्पादों को एक बड़ा मंच भी प्राप्त हुआ है। अब उनकी पहचान एक गांव के कारीगर तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे एक सफल उद्यमी के रूप में उभरकर सामने आई हैं।
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मेलों के जरिए देशभर में बनाई पहचान
सुनीता प्रत्येक मेले में करीब 20 क्विंटल से अधिक लोहे के बर्तन और कृषि औजार बेच लेती हैं। वहीं वर्तमान में भी सुनीता ओडिशा के मेले में अपनी स्टॉल लगाए हुए हैं, जहां उनके हस्तनिर्मित उत्पादों की अच्छी बिक्री हो रही है। मेलों के माध्यम से उन्हें सीधा बाजार मिला है, बिचौलियों के खत्म होने से मुनाफा भी बढ़ा है।
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लाखों का मुनाफा, यह बनाती हैं बर्तन
सुनीता और उनका परिवार मिलकर लोहे की कड़ाही, तवे, चिमटे, पलटे और खेती-किसानी में काम आने वाले औजार जैसे कस्सी, कुल्हाड़ी, करौंती और दरांती तैयार कर रहे हैं। उनके बनाए बर्तनों की मजबूती मशीनी उत्पादों में नजर नहीं आती। उनके बनाए गए बर्तनों को आकर्षक डिजाइन और मजबूती के कारण लोग पसंद कर रहे हैं। अपनी कड़ी मेहनत और हुनर के दम पर वे सालाना लाखों रुपये का मुनाफा कमा रही हैं। सुनीता गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के प्रति जागरूक कर रही हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनने का संदेश दे रही हैं।
स्वयं सहायता समूह और आजीविका मिशन का मिला सहारा
सुनीता ने अपने पति मनीष के साथ मिलकर लोहे के पारंपरिक औजारों के साथ-साथ नए डिजाइन के बर्तन और घरेलू उपयोग की सामग्री बनाना शुरू कर दिया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने संजीवनी का काम किया। मिशन से जुड़ने के बाद उन्हें आर्थिक सहायता और मार्गदर्शन मिला, उनके उत्पादों को एक बड़ा मंच भी प्राप्त हुआ है। अब उनकी पहचान एक गांव के कारीगर तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे एक सफल उद्यमी के रूप में उभरकर सामने आई हैं।
मेलों के जरिए देशभर में बनाई पहचान
सुनीता प्रत्येक मेले में करीब 20 क्विंटल से अधिक लोहे के बर्तन और कृषि औजार बेच लेती हैं। वहीं वर्तमान में भी सुनीता ओडिशा के मेले में अपनी स्टॉल लगाए हुए हैं, जहां उनके हस्तनिर्मित उत्पादों की अच्छी बिक्री हो रही है। मेलों के माध्यम से उन्हें सीधा बाजार मिला है, बिचौलियों के खत्म होने से मुनाफा भी बढ़ा है।