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जीरो मातृ मृत्यु लक्ष्य : कल से विशेष अभियान शुरू, अस्पताल रहेंगे अलर्ट
Mon, 06 Jul 2026 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Mon, 06 Jul 2026 12:57 AM IST
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फतेहाबाद के नागरिक अस्पताल में शिविर में गर्भवती की जांच करते हुए स्त्रोत लाइब्रेरी
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फतेहाबाद। प्रदेश में मातृ मृत्यु दर को शून्य करने के लक्ष्य के साथ स्वास्थ्य विभाग 7 से 22 जुलाई तक मेटरनल हेल्थ पखवाड़ा चलाएगा। इस दौरान गर्भवती महिलाओं की विशेष निगरानी, हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान और सुरक्षित संस्थागत प्रसव सुनिश्चित करने पर सबसे अधिक जोर रहेगा।
मातृ मृत्यु के किसी भी मामले को छिपाने या लापरवाही बरतने पर संबंधित अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। जिले में पिछले साल 16 प्रसुताओं मौत हुई जबकि इस साल तीन माह में चार मौत हो चुकी है। जिले का मातृ मृत्यु दर 106 है। उप सिविल सर्जन डॉ. भरत सहारण ने बताया कि पखवाड़े के दौरान सिविल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों पर विशेष गतिविधियां संचालित होंगी।
अभियान शुरू होने से पहले सभी एएनएम और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ) को अपने-अपने क्षेत्रों में 7 से 22 जुलाई के बीच संभावित प्रसव वाली महिलाओं की सूची तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। इनमें हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को अलग से चिह्नित कर नियमित फॉलोअप किया जाएगा।
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इसके अलावा जिनकी डिलिवरी होनी है उनसे पूछा जाएगा कि किस संस्थान में करवाएंगी। स्वास्थ्य विभाग ने सभी फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) में ऑक्सीटोसिन, मैग्नीशियम सल्फेट, लेबेटालोल और मिसोप्रोस्टोल जैसी जरूरी दवाओं का पर्याप्त स्टॉक, ब्लड स्टोरेज, बिजली बैकअप और विशेषज्ञ डॉक्टरों की 24 घंटे उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
गंभीर प्रसूति मरीज के अस्पताल पहुंचते ही ब्लड प्रेशर, पल्स, हीमोग्लोबिन और भ्रूण की धड़कन की जांच अनिवार्य होगी। गंभीर स्थिति में पांच मिनट के भीतर मेडिकल ऑफिसर द्वारा प्राथमिक उपचार देना होगा ताकि गर्भस्थ शिशु और मां की जान को खतरा न हो।
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36 से 48 घंटे रहना होगा अस्पताल
सामान्य प्रसव के बाद महिला को 36 से 48 घंटे और सिजेरियन डिलिवरी के बाद कम से कम 72 घंटे अस्पताल में रखना अनिवार्य किया गया है। आशा कार्यकर्ता और एएनएम प्रसव के बाद 42 दिनों तक होम बेस्ड पोस्ट नेटल केयर के तहत नियमित गृह भ्रमण कर मां और नवजात के स्वास्थ्य की निगरानी करेंगी। हाई रिस्क मामलों में हर दूसरे दिन फॉलोअप होगा। विभाग ने निजी अस्पतालों में भी नो-रिफ्यूजल पॉलिसी लागू करते हुए गंभीर प्रसूति मरीज को प्राथमिक उपचार दिए बिना रेफर या डिस्चार्ज करने पर रोक लगा दी है। वहीं मेडिकल कॉलेजों को अंतिम रेफरल केंद्र बनाया गया है जहां बेड या वेंटिलेटर की कमी का हवाला देकर किसी भी मरीज को वापस नहीं भेजा जाएगा। प्रत्येक मातृ मृत्यु या गंभीर घटना का 24 घंटे के भीतर क्लीनिकल ऑडिट होगा जबकि सेवा में लापरवाही, अधूरे रिकॉर्ड या अनधिकृत रेफरल पर संबंधित कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर कार्रवाई की जाएगी।
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पिछले साल हुई 22 होम डिलिवरी
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट मुताबिक पिछले वर्ष 18,455 गर्भवती महिलाओं का एएनसी के लिए पंजीकरण किया गया जो कि लक्ष्य का लगभग 86 प्रतिशत है। इनमें से 17,187 महिलाओं का पंजीकरण गर्भावस्था की पहली तिमाही में हुआ। जिले में 15,126 संस्थागत प्रसव कराए गए जबकि घरों में केवल 22 प्रसव हुए। इस दौरान 51 मृत शिशु जन्म (स्टिल बर्थ) और 16 मातृ मृत्यु के मामले दर्ज किए गए। वहीं 15,081 जीवित जन्म दर्ज हुए जिनमें से 15,009 नवजात का जन्म के समय वजन लिया गया। इसके अलावा 14,249 नवजात को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया गया।
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मातृ मृत्यु के किसी भी मामले को छिपाने या लापरवाही बरतने पर संबंधित अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। जिले में पिछले साल 16 प्रसुताओं मौत हुई जबकि इस साल तीन माह में चार मौत हो चुकी है। जिले का मातृ मृत्यु दर 106 है। उप सिविल सर्जन डॉ. भरत सहारण ने बताया कि पखवाड़े के दौरान सिविल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों पर विशेष गतिविधियां संचालित होंगी।
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अभियान शुरू होने से पहले सभी एएनएम और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ) को अपने-अपने क्षेत्रों में 7 से 22 जुलाई के बीच संभावित प्रसव वाली महिलाओं की सूची तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। इनमें हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को अलग से चिह्नित कर नियमित फॉलोअप किया जाएगा।
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इसके अलावा जिनकी डिलिवरी होनी है उनसे पूछा जाएगा कि किस संस्थान में करवाएंगी। स्वास्थ्य विभाग ने सभी फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) में ऑक्सीटोसिन, मैग्नीशियम सल्फेट, लेबेटालोल और मिसोप्रोस्टोल जैसी जरूरी दवाओं का पर्याप्त स्टॉक, ब्लड स्टोरेज, बिजली बैकअप और विशेषज्ञ डॉक्टरों की 24 घंटे उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
गंभीर प्रसूति मरीज के अस्पताल पहुंचते ही ब्लड प्रेशर, पल्स, हीमोग्लोबिन और भ्रूण की धड़कन की जांच अनिवार्य होगी। गंभीर स्थिति में पांच मिनट के भीतर मेडिकल ऑफिसर द्वारा प्राथमिक उपचार देना होगा ताकि गर्भस्थ शिशु और मां की जान को खतरा न हो।
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36 से 48 घंटे रहना होगा अस्पताल
सामान्य प्रसव के बाद महिला को 36 से 48 घंटे और सिजेरियन डिलिवरी के बाद कम से कम 72 घंटे अस्पताल में रखना अनिवार्य किया गया है। आशा कार्यकर्ता और एएनएम प्रसव के बाद 42 दिनों तक होम बेस्ड पोस्ट नेटल केयर के तहत नियमित गृह भ्रमण कर मां और नवजात के स्वास्थ्य की निगरानी करेंगी। हाई रिस्क मामलों में हर दूसरे दिन फॉलोअप होगा। विभाग ने निजी अस्पतालों में भी नो-रिफ्यूजल पॉलिसी लागू करते हुए गंभीर प्रसूति मरीज को प्राथमिक उपचार दिए बिना रेफर या डिस्चार्ज करने पर रोक लगा दी है। वहीं मेडिकल कॉलेजों को अंतिम रेफरल केंद्र बनाया गया है जहां बेड या वेंटिलेटर की कमी का हवाला देकर किसी भी मरीज को वापस नहीं भेजा जाएगा। प्रत्येक मातृ मृत्यु या गंभीर घटना का 24 घंटे के भीतर क्लीनिकल ऑडिट होगा जबकि सेवा में लापरवाही, अधूरे रिकॉर्ड या अनधिकृत रेफरल पर संबंधित कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर कार्रवाई की जाएगी।
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पिछले साल हुई 22 होम डिलिवरी
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट मुताबिक पिछले वर्ष 18,455 गर्भवती महिलाओं का एएनसी के लिए पंजीकरण किया गया जो कि लक्ष्य का लगभग 86 प्रतिशत है। इनमें से 17,187 महिलाओं का पंजीकरण गर्भावस्था की पहली तिमाही में हुआ। जिले में 15,126 संस्थागत प्रसव कराए गए जबकि घरों में केवल 22 प्रसव हुए। इस दौरान 51 मृत शिशु जन्म (स्टिल बर्थ) और 16 मातृ मृत्यु के मामले दर्ज किए गए। वहीं 15,081 जीवित जन्म दर्ज हुए जिनमें से 15,009 नवजात का जन्म के समय वजन लिया गया। इसके अलावा 14,249 नवजात को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया गया।