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Hisar News: अग्रोहा टीले की खोदाई में मिला मंदिर की दीवार का चबूतरेनुमा हिस्सा
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अग्रोहा टीले की खोदाई की दौरान मिली प्राचीन मोहर ।
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अग्रोहा (हिसार)। अग्रोहा के ऐतिहासिक टीले की खोदाई में मिली मुहरों पर संस्कृत, ब्राह्मी लिपि में लिखे संदेश मिले हैं। यह मुहरें पांचवीं-छठी शताब्दी में विष्णु गुप्त के शासनकाल की मानी जा रही हैं। इनकी वास्तविक आयु पता करने के लिए कार्बन डेटिंग की जाएगी। टीले के दक्षिण-पूर्व में मंदिर की दीवार का चबूतरेनुमा हिस्सा मिला है। टीले पर दो महीने से अधिक समय से चल रहा खोदाई कार्य गर्मी के कारण फिलहाल बंद कर दिया है। शनिवार को खोदाई स्थलों को तिरपाल से ढकने का काम शुरू कर दिया। नवंबर माह में फिर से खोदाई शुरू होगी।
अग्रोहा के ऐतिहासिक टीले पर खोदाई के दौरान अलग-अलग आकृतियों की तीन मुद्राएं, मनके, मिट्टी के बर्तन, दीवारें आदि मिली हैं। पुरातत्व संस्थान पंडित दीनदयाल उपाध्याय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, ग्रेटर नोएडा के पीजी डिप्लोमा 2026 बैच के 15 छात्रों की टीम ने 60 दिनों तक खोदाई व शोध कार्य किया। पुरातत्व विभाग के उपनिदेशक डॉ. अरखित प्रधान ने बताया कि पिछले वर्ष छात्रों का 45 दिनों का शोध कार्य था। अबकी बार 60 दिनों तक शोध किया है। खोदाई के दौरान मिली पहली मुहर पर चक्र का चिह्न बना हुआ है। उस पर विष्णु गुप्त लिखा है। यह मुहर संस्कृत और ब्राह्मी लिपि में पांचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी की है। नाम से संकेत मिलता है कि यह गुप्त वंश के अंतिम शासक विष्णु गुप्त या किसी व्यापारी ने जारी की थी। दूसरी मुहर पर एक वेदी का चित्र बना है। उस पर संस्कृत और ब्राह्मी लिपि में लगभग पांचवीं शताब्दी ईस्वी का जितंभागवत लिखा है। यह इस काल में बौद्ध धर्म की मान्यता को दर्शाता है। तीसरी मुहर पर पुष्प चित्रण के बीच में संस्कृत और ब्राह्मी लिपि में लगभग पांचवीं शताब्दी ईस्वी का जीविदास लिखा है। खोदाई स्थल से टेराकोटा मुहरों की प्राप्ति से यह सिद्ध होता है कि यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी का एक अति महत्वपूर्ण स्थल है।
टीले के पूर्व व दक्षिण दिशा में खोदाई की गई जिसमें 10 गुणा 10 मीटर में 48 ट्रेंच बनाए गए थे। इनमें से 31ट्रैंच की खुदाई हो चुकी है। अब तक इन ट्रैंच की अधिकतम 8 मीटर गहराई तक खोदाई हो चुकी है। पिछले वर्ष उत्तर दिशा में खोदाई की गई थी। इस दौरान दो कमरे व 1 मीटर व दस सेमी की दीवार मिली थी।
बारिश से बचाव के किए इंतजाम
बारिश से बचाव के लिए ट्रेंच (खातों ) पर बांस की लकड़ी की चटाई व उसके ऊपर प्लास्टिक का तिरपाल लगाया जा रहा है। इसके साथ ही चारों ओर मिट्टी डाली जाएगी ताकि बारिश के दिनों में अंदर पानी न जा सके। सुरक्षा के लिए दिन व रात के लिए अलग से सुरक्षा गार्ड तैनात किए जाएंगे ताकि कोई अन्य व्यक्ति यहां न आ सके। जानवरों से सुरक्षा के भी प्रबंध किए गए हैं। अग्रोहा टीले पर उत्खनन का कार्य चंडीगढ़ मंडल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से कामई अथोइलु कबुई के निर्देशन और डॉ. अरखित प्रधान के सह-निर्देशन में किया गया।
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अग्रोहा के ऐतिहासिक टीले पर खोदाई के दौरान अलग-अलग आकृतियों की तीन मुद्राएं, मनके, मिट्टी के बर्तन, दीवारें आदि मिली हैं। पुरातत्व संस्थान पंडित दीनदयाल उपाध्याय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, ग्रेटर नोएडा के पीजी डिप्लोमा 2026 बैच के 15 छात्रों की टीम ने 60 दिनों तक खोदाई व शोध कार्य किया। पुरातत्व विभाग के उपनिदेशक डॉ. अरखित प्रधान ने बताया कि पिछले वर्ष छात्रों का 45 दिनों का शोध कार्य था। अबकी बार 60 दिनों तक शोध किया है। खोदाई के दौरान मिली पहली मुहर पर चक्र का चिह्न बना हुआ है। उस पर विष्णु गुप्त लिखा है। यह मुहर संस्कृत और ब्राह्मी लिपि में पांचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी की है। नाम से संकेत मिलता है कि यह गुप्त वंश के अंतिम शासक विष्णु गुप्त या किसी व्यापारी ने जारी की थी। दूसरी मुहर पर एक वेदी का चित्र बना है। उस पर संस्कृत और ब्राह्मी लिपि में लगभग पांचवीं शताब्दी ईस्वी का जितंभागवत लिखा है। यह इस काल में बौद्ध धर्म की मान्यता को दर्शाता है। तीसरी मुहर पर पुष्प चित्रण के बीच में संस्कृत और ब्राह्मी लिपि में लगभग पांचवीं शताब्दी ईस्वी का जीविदास लिखा है। खोदाई स्थल से टेराकोटा मुहरों की प्राप्ति से यह सिद्ध होता है कि यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी का एक अति महत्वपूर्ण स्थल है।
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टीले के पूर्व व दक्षिण दिशा में खोदाई की गई जिसमें 10 गुणा 10 मीटर में 48 ट्रेंच बनाए गए थे। इनमें से 31ट्रैंच की खुदाई हो चुकी है। अब तक इन ट्रैंच की अधिकतम 8 मीटर गहराई तक खोदाई हो चुकी है। पिछले वर्ष उत्तर दिशा में खोदाई की गई थी। इस दौरान दो कमरे व 1 मीटर व दस सेमी की दीवार मिली थी।
बारिश से बचाव के किए इंतजाम
बारिश से बचाव के लिए ट्रेंच (खातों ) पर बांस की लकड़ी की चटाई व उसके ऊपर प्लास्टिक का तिरपाल लगाया जा रहा है। इसके साथ ही चारों ओर मिट्टी डाली जाएगी ताकि बारिश के दिनों में अंदर पानी न जा सके। सुरक्षा के लिए दिन व रात के लिए अलग से सुरक्षा गार्ड तैनात किए जाएंगे ताकि कोई अन्य व्यक्ति यहां न आ सके। जानवरों से सुरक्षा के भी प्रबंध किए गए हैं। अग्रोहा टीले पर उत्खनन का कार्य चंडीगढ़ मंडल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से कामई अथोइलु कबुई के निर्देशन और डॉ. अरखित प्रधान के सह-निर्देशन में किया गया।
