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Hisar News: पढ़ाई के नाम पर वसूली...महंगी स्टेशनरी खरीदने को अभिभावक मजबूर
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
Updated Fri, 03 Apr 2026 12:21 AM IST
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हिसार। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही शहर के निजी स्कूलों में किताबों और कॉपियों की खरीद को लेकर अभिभावकों की परेशानी बढ़ गई है। इन स्कूलों में किताबों के साथ स्कूल के नाम से छपी कॉपियां बेची जा रही हैं और अभिभावकों को इन्हें खरीदने के लिए अनिवार्य किया जा रहा है। बाजार में सस्ती कीमतों पर उपलब्ध समान पेज की कॉपियों के बावजूद स्कूल इनकी अधिक कीमत वसूल रहे हैं जिससे अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
अभिभावकों के अनुसार एलकेजी कक्षा के लिए किताब और कॉपियों का पूरा सेट 1800 रुपये में दिया गया जिसमें 6 कॉपियां शामिल हैं। इनकी कुल कीमत 210 रुपये है यानी एक कॉपी की कीमत 35 रुपये है। जबकि स्थानीय बाजार में समान पेज वाली कॉपी 20 रुपये में मिल रही है। कुछ स्कूलों में कॉपियों के पेज कम होते हैं लेकिन कीमत अधिक ली जाती है। कागज की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्कूलों से मिलने वाली कॉपियां और बाजार की कॉपियां में कोई खास अंतर नहीं है फिर भी कीमत में बड़ा फर्क देखा जा रहा है। यह अंतर केवल स्कूल के नाम और अनिवार्यता के कारण ही स्पष्ट हो रहा है।
विभागीय दिशा-निर्देशों की अनदेखी
शिक्षा विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान या सामग्री को खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। स्कूल परिसर में स्टेशनरी या किताबों की बिक्री भी नियमों के विरुद्ध मानी जाती है। इसके बावजूद शहर के कई निजी स्कूल इन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। अभिभावकों से किसी किताब या कॉपी को लेने से मना करने पर स्कूल की ओर से इसे अनिवार्य बताकर बिल में जोड़ दिया जाता है। विद्यार्थियों को भी यही निर्देश दिए जाते हैं कि केवल स्कूल के नाम वाली ही नोटबुक लानी जरूरी है जिससे अभिभावकों को मजबूरी में महंगी सामग्री खरीदनी पड़ती है। हर नए शैक्षणिक सत्र के साथ किताबों और कॉपियों पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। विशेषकर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह खर्च संभालना कठिन हो रहा है। फीस, परिवहन और अन्य खर्चों के अलावा इस प्रकार की अनिवार्य खरीद से कुल खर्च और बढ़ जाता है। यदि अभिभावकों को बाजार से सामग्री खरीदने की स्वतंत्रता दी जाए तो वे काफी हद तक खर्च कम कर सकते हैं। लेकिन स्कूलों की शर्तों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।
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हर साल नए सत्र के साथ खर्च बढ़ता जा रहा है लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा खराब है। स्कूल ने हमसे निर्धारित दुकान से ही किताब और कॉपी का पूरा सेट खरीदने को कहा। बाजार में 120 पेज की कॉपी 20 रुपये में मिल रही है जबकि स्कूल की दुकान पर वही कॉपी 35 रुपये में मिल रही है। कागज की गुणवत्ता भी लगभग एक जैसी है। मध्यम वर्ग के परिवार के लिए यह अतिरिक्त खर्च मुश्किल पैदा करता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि बच्चे की पढ़ाई के कारण हम मना नहीं कर पाते।
- सीमा, अभिभावक।
निजी स्कूल अब पढ़ाई के साथ-साथ हर चीज में कमाई देख रहे हैं। पहले किताबें महंगी होती थीं अब कॉपियों पर भी स्कूल का नाम छापकर उन्हें अनिवार्य कर दिया है। शिक्षक भी यही कहते हैं कि स्कूल की कॉपी ही इस्तेमाल करनी होगी। इस तरह अभिभावकों की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। प्रशासन को इस पर सख्ती से ध्यान देना चाहिए ताकि यह मनमानी बंद हो सके।
– राजेश, अभिभावक।
स्कूल की ओर से पहले ही दो से तीन दुकान फिक्स कर दी जाती है। इसके अलावा स्कूल की सामग्री अन्य दुकानों पर नहीं मिलती। स्कूल नोटबुक और लोकल नोटबुक में कोई अंतर नहीं है। अगर गुणवत्ता बेहतर होती तो बात अलग थी लेकिन यहां सिर्फ नाम के कारण कीमत बढ़ाई गई है।
– पूजा, अभिभावक
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अभिभावकों के अनुसार एलकेजी कक्षा के लिए किताब और कॉपियों का पूरा सेट 1800 रुपये में दिया गया जिसमें 6 कॉपियां शामिल हैं। इनकी कुल कीमत 210 रुपये है यानी एक कॉपी की कीमत 35 रुपये है। जबकि स्थानीय बाजार में समान पेज वाली कॉपी 20 रुपये में मिल रही है। कुछ स्कूलों में कॉपियों के पेज कम होते हैं लेकिन कीमत अधिक ली जाती है। कागज की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्कूलों से मिलने वाली कॉपियां और बाजार की कॉपियां में कोई खास अंतर नहीं है फिर भी कीमत में बड़ा फर्क देखा जा रहा है। यह अंतर केवल स्कूल के नाम और अनिवार्यता के कारण ही स्पष्ट हो रहा है।
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विभागीय दिशा-निर्देशों की अनदेखी
शिक्षा विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान या सामग्री को खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। स्कूल परिसर में स्टेशनरी या किताबों की बिक्री भी नियमों के विरुद्ध मानी जाती है। इसके बावजूद शहर के कई निजी स्कूल इन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। अभिभावकों से किसी किताब या कॉपी को लेने से मना करने पर स्कूल की ओर से इसे अनिवार्य बताकर बिल में जोड़ दिया जाता है। विद्यार्थियों को भी यही निर्देश दिए जाते हैं कि केवल स्कूल के नाम वाली ही नोटबुक लानी जरूरी है जिससे अभिभावकों को मजबूरी में महंगी सामग्री खरीदनी पड़ती है। हर नए शैक्षणिक सत्र के साथ किताबों और कॉपियों पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। विशेषकर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह खर्च संभालना कठिन हो रहा है। फीस, परिवहन और अन्य खर्चों के अलावा इस प्रकार की अनिवार्य खरीद से कुल खर्च और बढ़ जाता है। यदि अभिभावकों को बाजार से सामग्री खरीदने की स्वतंत्रता दी जाए तो वे काफी हद तक खर्च कम कर सकते हैं। लेकिन स्कूलों की शर्तों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।
हर साल नए सत्र के साथ खर्च बढ़ता जा रहा है लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा खराब है। स्कूल ने हमसे निर्धारित दुकान से ही किताब और कॉपी का पूरा सेट खरीदने को कहा। बाजार में 120 पेज की कॉपी 20 रुपये में मिल रही है जबकि स्कूल की दुकान पर वही कॉपी 35 रुपये में मिल रही है। कागज की गुणवत्ता भी लगभग एक जैसी है। मध्यम वर्ग के परिवार के लिए यह अतिरिक्त खर्च मुश्किल पैदा करता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि बच्चे की पढ़ाई के कारण हम मना नहीं कर पाते।
- सीमा, अभिभावक।
निजी स्कूल अब पढ़ाई के साथ-साथ हर चीज में कमाई देख रहे हैं। पहले किताबें महंगी होती थीं अब कॉपियों पर भी स्कूल का नाम छापकर उन्हें अनिवार्य कर दिया है। शिक्षक भी यही कहते हैं कि स्कूल की कॉपी ही इस्तेमाल करनी होगी। इस तरह अभिभावकों की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। प्रशासन को इस पर सख्ती से ध्यान देना चाहिए ताकि यह मनमानी बंद हो सके।
– राजेश, अभिभावक।
स्कूल की ओर से पहले ही दो से तीन दुकान फिक्स कर दी जाती है। इसके अलावा स्कूल की सामग्री अन्य दुकानों पर नहीं मिलती। स्कूल नोटबुक और लोकल नोटबुक में कोई अंतर नहीं है। अगर गुणवत्ता बेहतर होती तो बात अलग थी लेकिन यहां सिर्फ नाम के कारण कीमत बढ़ाई गई है।
– पूजा, अभिभावक