विश्व रेडियो दिवस:पीली चिट्ठियों से ईमेल तक का सफर, श्रोताओं का जुड़ाव अब भी कायम; सरहदों पार से आती थी फरमाइश
हिसार आकाशवाणी के निदेशक पवन कुमार बताते हैं कि आकाशवाणी की आवाज अब केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रही। पाकिस्तान, दुबई, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से भी नियमित रूप से श्रोता संपर्क करते हैं। विदेशों में बसे भारतीय अपने वतन की मिट्टी की खुशबू रेडियो की आवाज में तलाशते हैं।
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समय बदलता रहा, तकनीक आगे बढ़ती रही, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो दशकों बाद भी उसी गर्मजोशी से कायम रहते हैं। हिसार आकाशवाणी और उसके श्रोताओं का संबंध भी ऐसा ही है जो अब केवल शहर या प्रदेश तक सीमित नहीं, बल्कि सरहदों पार भी कायम है। एक दौर था जब आकाशवाणी हिसार के दफ्तर में रोज पीली चिट्ठियां पहुंचती थीं। नीली स्याही से लिखे नाम, गांव का पता और नीचे विनम्र आग्रह हमारी फरमाइश जरूर सुनवाएं। गीत सुनाने से पहले फरमाइश करने वाले का नाम पुकारा जाता तो पूरे परिवार के चेहरे पर खुशी झलकती थी। आकाशवाणी में आज भी फरमाइशें आती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि चिट्ठियों की जगह अब डिजिटल संदेशों ने ले ली हैं पर शब्दों में वही अपनापन महसूस होता है।
हिसार आकाशवाणी के निदेशक पवन कुमार बताते हैं कि आकाशवाणी की आवाज अब केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रही। पाकिस्तान, दुबई, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से भी नियमित रूप से श्रोता संपर्क करते हैं। विदेशों में बसे भारतीय अपने वतन की मिट्टी की खुशबू रेडियो की आवाज में तलाशते हैं। ऑस्ट्रेलिया से बादल सिंह गिल लगातार कॉल कर अपने पसंदीदा गीतों की फरमाइश करते हैं। अमेरिका से भी नियमित रूप से संदेश और कॉल प्राप्त होती हैं।
सदाबहार गीतों की मांग
पवन कुमार कहते हैं कि विदेशों से आने वाली फरमाइशों में अक्सर सदाबहार गीतों की मांग होती है। मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और किशोर कुमार के गाने आज भी उतने ही पसंद किए जाते हैं। कई श्रोता हमारे संग चली गंगा की लहरें...चूड़ी मजा न देगी, कंगन मजा न देगा...जैसे सदाबहार गाने सुनने की इच्छा जताते हैं। यह केवल एक गीत की मांग नहीं, बल्कि उन यादों को फिर से जीने की चाह है जो रेडियो से जुड़ी हैं। पाकिस्तान के श्रोताओं की ईमेल के माध्यम से हिंदी गानों की फरमाइश आती है।
सादगी और भरोसे की वजह से दिलों में बसा है रडियो
कभी हर घर की पहचान रहा रेडियो आज भले ही आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटता दिख रहा हो, लेकिन यादों की तरंगों पर उसकी आवाज अब भी कानों गूंज रही है। सुबह की शुरुआत समाचार से और शाम को पूरा परिवार गीत-संगीत व नाटक-कहानी सुनने के लिए लालायित रहता था। वह दौर लोगों को आज भी याद है। शहरों में अब शायद कोई नया रेडियो खरीदता हो। पुराने रेडियो खराब होने पर उन्हें ठीक कराने की कोशिश भी कम ही की जाती है।
श्रोताओं का आकाशवाणी से रिश्ता आज भी जीवित
डिजिटल युग में विकल्प भले बढ़ गए हों, लेकिन आकाशवाणी का रिश्ता आज भी जीवित है। पीली चिट्ठियों से लेकर ईमेल तक, यह जुड़ाव समय के साथ बदला जरूर है, लेकिन कमजोर नहीं हुआ। शायद यही कारण है कि सरहदों पार भी जब कोई अपने वतन की याद में रेडियो चालू करता है तो हिसार आकाशवाणी की आवाज उसके दिल की धड़कन बन जाती है। पुराने जमाने में गांवों में रेडियो सिर्फ मशीन नहीं, बल्कि घर का सदस्य माना जाता था। लोग कार्यक्रमों की फरमाइश के लिए चिट्ठियां भेजते, सुझाव देते और अपने मन की बातें लिखते थे। आज भी आकाशवाणी कार्यालय में वर्षों पुराने खत सुरक्षित रखे हैं। -पवन कुमार, निदेशक, आकाशवाणी हिसार।
दिल में बसा है रेडियो
बचपन से पापा के साथ रेडियो सुनता आया हूं। पहले यही एक साधन था, फिर टीवी आया और उसके बाद मोबाइल। आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सब कुछ मिल जाता है, लेकिन रेडियो जैसा अपनापन कहीं नहीं मिलता। यहां आवाज में भरोसा महसूस होता है और उद्घोषकों की मखमली आवाज में एक अलग ही जादू होता है। -रमन शर्मा, प्रेम नगर।
समय भले कम मिलता हो, लेकिन हर रविवार सुबह 10:30 बजे ‘नारी संसार’ कार्यक्रम जरूर सुनती हूं। गांव में पहले सब रेडियो सुना करते थे, आज भी वो यादें ताजा हैं। कभी नॉब घुमाना, कभी एंटीना हिलाना, सीलोन की फरमाइश और गीतों का खजाना। रेडियो का वो जमाना आज भी रूह में बसा है। -कमला देवी।
रेडियो हमारे गांव की आवाज था। खेती-बाड़ी की जानकारी ‘किसान जगत’ और ‘किसान वाणी’ जैसे कार्यक्रमों से मिलती थी, जो आज भी जारी है। देश-दुनिया की खबरें भी वहीं से मिलती थीं। रेडियो चलते ही पुराना समय याद आ जाता है। -रणधीर नंबरदार।
मैंने जिंदगी का बड़ा हिस्सा रेडियो के साथ बिताया है और आज भी समाचार रेडियो पर ही सुनता हूं। रेडियो का जमाना कभी खत्म नहीं हो सकता। श्रोता भले कम हुए हों, लेकिन इसका अपना अंदाज और मिजाज है। हर व्यक्ति को रेडियो जरूर सुनना चाहिए। -समुद्र सिंह।