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एआई शोधार्थी का सहायक, विकल्प नहीं : कुलपति
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12जेएनडी12: कार्यशाला में शामिल हुए अध्यापक व शौधार्थी। स्रोत: सीआरएसयू
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जींद। चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय (सीआरएसयू) में ‘एनईपी-2020 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में डॉ. एसआर रंगनाथन के सिद्धांतों का पुनर्कल्पन विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला हुई। इसमें करीब 200 शिक्षक, शोधार्थी, पुस्तकालयाध्यक्ष और विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया। इसमें कुलपति प्रोफेसर डॉ. रामपाल सैनी ने मुख्यातिथि के तौर पर शिरकत की।
कुलपति ने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में पुस्तकालय का विशेष महत्व है। शिक्षा बिना पुस्तकालय के अधूरी है और किसी शिक्षण संस्थान की पहचान उसकी पुस्तकालय से होती है। उन्होंने शिक्षकों से भी नियमित रूप से पुस्तकालय में समय बिताने और नई पुस्तकों व शोध सामग्री से अद्यतन रहने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता डॉ. धीरज कुमार ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और एआई शोध कार्य को व्यवस्थित करने और समय बचाने में सहायक हैं लेकिन इन्हें शोधार्थी का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने विषय चयन, साहित्य समीक्षा, शोध प्रश्न तय करने, स्रोतों के मूल्यांकन और शोध-अंतराल की पहचान की प्रक्रिया समझाई।
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डॉ. धीरज कुमार ने शोधार्थियों को सलाह दी कि एआई से प्राप्त सामग्री और संदर्भों का मूल स्रोत से अनिवार्य रूप से सत्यापन करें। उन्होंने कहा कि शोध की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए फर्जी आंकड़ों और अप्रमाणित संदर्भों से बचना जरूरी है। एआई का इस्तेमाल नैतिक और जिम्मेदार तरीके से किया जाना चाहिए।
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कुलपति ने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में पुस्तकालय का विशेष महत्व है। शिक्षा बिना पुस्तकालय के अधूरी है और किसी शिक्षण संस्थान की पहचान उसकी पुस्तकालय से होती है। उन्होंने शिक्षकों से भी नियमित रूप से पुस्तकालय में समय बिताने और नई पुस्तकों व शोध सामग्री से अद्यतन रहने का आह्वान किया।
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मुख्य वक्ता डॉ. धीरज कुमार ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और एआई शोध कार्य को व्यवस्थित करने और समय बचाने में सहायक हैं लेकिन इन्हें शोधार्थी का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने विषय चयन, साहित्य समीक्षा, शोध प्रश्न तय करने, स्रोतों के मूल्यांकन और शोध-अंतराल की पहचान की प्रक्रिया समझाई।
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डॉ. धीरज कुमार ने शोधार्थियों को सलाह दी कि एआई से प्राप्त सामग्री और संदर्भों का मूल स्रोत से अनिवार्य रूप से सत्यापन करें। उन्होंने कहा कि शोध की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए फर्जी आंकड़ों और अप्रमाणित संदर्भों से बचना जरूरी है। एआई का इस्तेमाल नैतिक और जिम्मेदार तरीके से किया जाना चाहिए।