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Karnal News: फर्जी जमाबंदी लगाकर दिलाई जमानत, अधिवक्ता सहित तीन के खिलाफ प्राथमिकी
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। तरावड़ी पुलिस थाने में वर्ष 2024 में दर्ज एनडीपीएस अधिनियम के मामले में आरोपी रामप्रीत को जमानत दिलाने पर अदालत के आदेशानुसार अधिवक्ता सहित तीन लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी की प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि जमानत के दौरान जमीन की फर्जी जमाबंदी और गलत हलफनामा पेश कर कोर्ट को गुमराह किया गया।
तहसील स्तर पर हुई जांच में सामने आया कि गगसीना निवासी जमानती सुरेश पहले भी नाै लोगों की जमानत करवा चुका है। उसकी जमीन पर कर्ज भी है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रीतू की अदालत के रीडर रजनीत राठाैर की शिकायत के अनुसार, तरावड़ी थाना क्षेत्र में यूपी के देवरिया जिला के गोरा बरहज गांव निवासी रामप्रीत से पुलिस ने 4.800 किलो चरस बरामद की थी। इसी को लेकर आरोपी के खिलाफ तरावड़ी थाना में 28 मई, 2024 को एनडीपीएस अधिनियम में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। यह मुकदमा अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रीतू की अदालत में विचाराधीन है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बीती 12 फरवरी को आरोपी को जमानत देने का आदेश दिया था।
इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने एक लाख रुपये के मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानती की शर्त पर आरोपी को रिहा करने के आदेश दिए गए। 19 फरवरी को आरोपी की ओर से जमानत बांड पेश किए गए। इसमें गांव गगसीना निवासी सुरेश सिंह ने जमानती के रूप में अपने दस्तावेज लगाए। पहचानकर्ता के तौर पर गांधी नगर निवासी जतिंद्र धवन शामिल हुए।
बताैर जमानती सुरेश सिंह ने कोर्ट में दिए हलफनामे में दावा किया कि उसने पहले कभी किसी की जमानत नहीं दी और उसकी जमीन पर कोई कर्ज या बोझ नहीं है। उसने अपनी जमीन की जमाबंदी (2022-2023) भी दस्तावेज के रूप में पेश की। जबकि सुरेश ने पहले ही नाै लोगों की जमानत करवाई हुई थी। इसके अलावा उसकी जमीन पर कर्ज भी था और छह मामले में कुर्क और नीलामी के आदेश भी जारी हो चुके थे।
इसी के आधार पर अदालत ने आरोपी सुरेश, अधिवक्ता जतिंद्र धवन और रामप्रीत के खिलाफ धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश दिए। अदालत के रीडर की शिकायत पर थाना सिविल लाइन पुलिस ने धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं में तीनों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है।
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तहसील से जांच हुई तो पकड़ा गया फर्जीवाड़ा
अदालत ने दस्तावेजों की जांच के लिए मामले संबंधी कागजात घरौंडा तहसील को भेजे गए। वहां से आई रिपोर्ट से खुलासा हुआ। रिपोर्ट से पता लगा कि आरोपी सुरेश सिंह की ओर से अदालत में जमीन की जो जमाबंदी दी गई है, उससे मौजूद कर्ज और अन्य देनदारियों को हटा दिया गया है। सुरेश सिंह पहले ही 9 अन्य मामलों में जमानती बन चुका है। उसकी जमीन 6 मामलों में कुर्क और नीलाम करने के आदेश जारी हो चुके हैं।
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अदालत में आरोपी व जमानती ने मानी गलती
तहसील रिपोर्ट आने के बाद कोर्ट ने आरोपी रामप्रीत और जमानती सुरेश सिंह को नोटिस जारी कर बुलाया। दोनों ने कोर्ट में पेश होकर अपने बयान दर्ज कराए। बयान में दोनों ने रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को स्वीकार किया। सुरेश सिंह ने माना कि उसे अपनी जमीन पर कर्ज और अन्य देनदारियों की पूरी जानकारी थी, उसका आरोपी रामप्रीत से कोई परिचय नहीं है। सुरेश सिंह ने यह भी स्वीकार किया कि उसने जमानत बांड और अपने आधार कार्ड की कॉपी पर हस्ताक्षर किए थे।
जमानती सुरेश सिंह ने अपने बयान में कहा कि एडवोकेट जतिंद्र धवन ने उसे इस मामले में जमानती बनने के लिए कहा था। वही इस केस में पहचानकर्ता भी बने थे। कोर्ट ने पूरे मामले में तीनों की भूमिका को गंभीर मानते हुए कहा कि इन लोगों ने मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार कर कोर्ट को गुमराह किया और आरोपी को गलत तरीके से जमानत दिलवाई है।
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फर्जी जमानत9 मार्च को रुपयों के लालच में फर्जी कागजात के आधार पर जमानत करवाने वाले विकास नगर निवासी आरोपी गुरमीत सिंह और वसंत विहार निवासी रणजीत सिंह को सिविल लाइन थाना पुलिस गिरफ्तार किया था।
एक मार्च, 2026 को अज्ञात के खिलाफ फर्जी दस्तावेज के आधार पर जमानत करवाने की प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोपी ने 5 नवंबर, 2019 को पारित आदेश के अनुसार 6 नवंबर, 2019 को 50 हजार रुपये का जमानत बांड जमा हुआ था।
21 नवंबर, 2025 को सिविल लाइन में दर्ज हुई थी प्राथमिकी, 19 अप्रैल 2023 को जुंडला निवासी अरविंद के कागजात का प्रयोग करके अज्ञात आरोपी ने करवाई थी राहुल की जमानत।
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जमानत के दस्तावेज की जांच1. कोर्ट स्तर पर जांच : अदालत का अहलमद और रीडर कागजात चेक करते हैं। नाम, पता, पहचान और केस से संबंधित जानकारी मिलाई जाती है।
2. पुलिस वेरिफिकेशन : कई मामलों में कोर्ट पुलिस स्टेशन को जमानती की जांच के लिए भेजती है पुलिस जांच करती है कि जमानती असली है या नहीं है। उसकी संपत्ति वास्तव में मौजूद है या नहीं कहीं वह पहले किसी केस में डिफॉल्टर तो नहीं है।
3. संपत्ति की जांच : अगर जमानत संपत्ति के आधार पर है। जमाबंदी / फर्द / रजिस्ट्री देखी जाती है यह जांचा जाता है कि जमीन जमानती के नाम पर है उस पर कोई कर्ज या विवाद तो नहीं है। इसके लिए कागजात तहसीलदार को भेजे जाते हैं। अदालत कई मामलों में तहसील/राजस्व विभाग से भी सत्यापन कराया जाता है। कोर्ट अपनी संतुष्टि के अनुसार जमानत को रद्द भी कर सकती है।
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करनाल। तरावड़ी पुलिस थाने में वर्ष 2024 में दर्ज एनडीपीएस अधिनियम के मामले में आरोपी रामप्रीत को जमानत दिलाने पर अदालत के आदेशानुसार अधिवक्ता सहित तीन लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी की प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि जमानत के दौरान जमीन की फर्जी जमाबंदी और गलत हलफनामा पेश कर कोर्ट को गुमराह किया गया।
तहसील स्तर पर हुई जांच में सामने आया कि गगसीना निवासी जमानती सुरेश पहले भी नाै लोगों की जमानत करवा चुका है। उसकी जमीन पर कर्ज भी है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रीतू की अदालत के रीडर रजनीत राठाैर की शिकायत के अनुसार, तरावड़ी थाना क्षेत्र में यूपी के देवरिया जिला के गोरा बरहज गांव निवासी रामप्रीत से पुलिस ने 4.800 किलो चरस बरामद की थी। इसी को लेकर आरोपी के खिलाफ तरावड़ी थाना में 28 मई, 2024 को एनडीपीएस अधिनियम में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। यह मुकदमा अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रीतू की अदालत में विचाराधीन है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बीती 12 फरवरी को आरोपी को जमानत देने का आदेश दिया था।
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इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने एक लाख रुपये के मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानती की शर्त पर आरोपी को रिहा करने के आदेश दिए गए। 19 फरवरी को आरोपी की ओर से जमानत बांड पेश किए गए। इसमें गांव गगसीना निवासी सुरेश सिंह ने जमानती के रूप में अपने दस्तावेज लगाए। पहचानकर्ता के तौर पर गांधी नगर निवासी जतिंद्र धवन शामिल हुए।
बताैर जमानती सुरेश सिंह ने कोर्ट में दिए हलफनामे में दावा किया कि उसने पहले कभी किसी की जमानत नहीं दी और उसकी जमीन पर कोई कर्ज या बोझ नहीं है। उसने अपनी जमीन की जमाबंदी (2022-2023) भी दस्तावेज के रूप में पेश की। जबकि सुरेश ने पहले ही नाै लोगों की जमानत करवाई हुई थी। इसके अलावा उसकी जमीन पर कर्ज भी था और छह मामले में कुर्क और नीलामी के आदेश भी जारी हो चुके थे।
इसी के आधार पर अदालत ने आरोपी सुरेश, अधिवक्ता जतिंद्र धवन और रामप्रीत के खिलाफ धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश दिए। अदालत के रीडर की शिकायत पर थाना सिविल लाइन पुलिस ने धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं में तीनों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है।
तहसील से जांच हुई तो पकड़ा गया फर्जीवाड़ा
अदालत ने दस्तावेजों की जांच के लिए मामले संबंधी कागजात घरौंडा तहसील को भेजे गए। वहां से आई रिपोर्ट से खुलासा हुआ। रिपोर्ट से पता लगा कि आरोपी सुरेश सिंह की ओर से अदालत में जमीन की जो जमाबंदी दी गई है, उससे मौजूद कर्ज और अन्य देनदारियों को हटा दिया गया है। सुरेश सिंह पहले ही 9 अन्य मामलों में जमानती बन चुका है। उसकी जमीन 6 मामलों में कुर्क और नीलाम करने के आदेश जारी हो चुके हैं।
अदालत में आरोपी व जमानती ने मानी गलती
तहसील रिपोर्ट आने के बाद कोर्ट ने आरोपी रामप्रीत और जमानती सुरेश सिंह को नोटिस जारी कर बुलाया। दोनों ने कोर्ट में पेश होकर अपने बयान दर्ज कराए। बयान में दोनों ने रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को स्वीकार किया। सुरेश सिंह ने माना कि उसे अपनी जमीन पर कर्ज और अन्य देनदारियों की पूरी जानकारी थी, उसका आरोपी रामप्रीत से कोई परिचय नहीं है। सुरेश सिंह ने यह भी स्वीकार किया कि उसने जमानत बांड और अपने आधार कार्ड की कॉपी पर हस्ताक्षर किए थे।
जमानती सुरेश सिंह ने अपने बयान में कहा कि एडवोकेट जतिंद्र धवन ने उसे इस मामले में जमानती बनने के लिए कहा था। वही इस केस में पहचानकर्ता भी बने थे। कोर्ट ने पूरे मामले में तीनों की भूमिका को गंभीर मानते हुए कहा कि इन लोगों ने मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार कर कोर्ट को गुमराह किया और आरोपी को गलत तरीके से जमानत दिलवाई है।
फर्जी जमानत9 मार्च को रुपयों के लालच में फर्जी कागजात के आधार पर जमानत करवाने वाले विकास नगर निवासी आरोपी गुरमीत सिंह और वसंत विहार निवासी रणजीत सिंह को सिविल लाइन थाना पुलिस गिरफ्तार किया था।
एक मार्च, 2026 को अज्ञात के खिलाफ फर्जी दस्तावेज के आधार पर जमानत करवाने की प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोपी ने 5 नवंबर, 2019 को पारित आदेश के अनुसार 6 नवंबर, 2019 को 50 हजार रुपये का जमानत बांड जमा हुआ था।
21 नवंबर, 2025 को सिविल लाइन में दर्ज हुई थी प्राथमिकी, 19 अप्रैल 2023 को जुंडला निवासी अरविंद के कागजात का प्रयोग करके अज्ञात आरोपी ने करवाई थी राहुल की जमानत।
जमानत के दस्तावेज की जांच1. कोर्ट स्तर पर जांच : अदालत का अहलमद और रीडर कागजात चेक करते हैं। नाम, पता, पहचान और केस से संबंधित जानकारी मिलाई जाती है।
2. पुलिस वेरिफिकेशन : कई मामलों में कोर्ट पुलिस स्टेशन को जमानती की जांच के लिए भेजती है पुलिस जांच करती है कि जमानती असली है या नहीं है। उसकी संपत्ति वास्तव में मौजूद है या नहीं कहीं वह पहले किसी केस में डिफॉल्टर तो नहीं है।
3. संपत्ति की जांच : अगर जमानत संपत्ति के आधार पर है। जमाबंदी / फर्द / रजिस्ट्री देखी जाती है यह जांचा जाता है कि जमीन जमानती के नाम पर है उस पर कोई कर्ज या विवाद तो नहीं है। इसके लिए कागजात तहसीलदार को भेजे जाते हैं। अदालत कई मामलों में तहसील/राजस्व विभाग से भी सत्यापन कराया जाता है। कोर्ट अपनी संतुष्टि के अनुसार जमानत को रद्द भी कर सकती है।