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Karnal News: पुरानी बीमारी बता नहीं कर सकते दावा रद्द

संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल Updated Mon, 08 Jun 2026 02:09 AM IST
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Claim cannot be cancelled by citing old illness
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करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम के खिलाफ फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एलआईसी की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें उसने पुरानी बीमारियों को न बताने का बहाना बनाकर एक महिला के पति के डेथ क्लेम को खारिज कर दिया था। आयोग ने एलआईसी को आदेश दिया कि वह मृतक की पत्नी को 10 लाख रुपये की बीमा राशि नौ प्रतिशत ब्याज दर के साथ चुकाए। 36 हजार रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी पुरानी बीमारी का मौत के कारण से कोई संबंध न हो, तो क्लेम से इनकार नहीं किया जा सकता।

आयोग के फैसले के अनुसार, अशोका कॉलोनी की गीता नोहरिया के पति दिवंगत रोहित नोहरिया ने अक्तूबर 2020 में एलआईसी से 10 लाख रुपये की जीवन लक्ष्य, जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। इसमें उनकी पत्नी नॉमिनी थीं। नवंबर 2021 में रोहित नोहरिया को डेंगू हो गया और पंचकूला के निजी अस्पताल में इलाज के दौरान डेंगू शॉक सिंड्रोम और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
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गीता नोहरिया ने बीमा राशि के लिए दावा किया तो एलआईसी ने 30 अक्टूबर 2023 को इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मृतक को पिछले 7 सालों से टाइप-दो डायबिटीज थी। 2014 में उनकी हार्ट वाल्व की सर्जरी हुई थी और वे लिवर की बीमारी से पीड़ित थे जिसे उन्होंने पॉलिसी लेते समय छिपाया था। इसके खिलाफ गीता नोहरिया ने उपभोक्ता आयोग में अपनी शिकायत दर्ज करवाई।
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आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्य नीरू अग्रवाल ने मामले की सुनवाई के बाद एलआईसी की दलीलों को अनुमान और धारणाओं पर आधारित बताते हुए खारिज कर दिया। आयोग ने फैसले में स्पष्ट किया कि मरीज की मौत डेंगू के कारण हुई थी। पुरानी बीमारियों (जैसे डायबिटीज या 2014 की हार्ट सर्जरी) का डेंगू से होने वाली मौत से कोई सीधा संबंध नहीं है। आयोग ने आदेश जारी होने के 45 दिनों के भीतर 10 लाख रुपये की राशि नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के साथ शिकायतकर्ता गीता नोहरिया को सौंपने का निर्देश दिया।

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अदालत में ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रही एलआईसी

बीमा कंपनी ने पुरानी बीमारियों का दावा तो किया लेकिन कोर्ट में न तो कोई पुख्ता मेडिकल रिकॉर्ड पेश किया और न ही इलाज करने वाले किसी डॉक्टर का बयान या हलफनामा दर्ज करवाया। इसके अलावा आईआरडीएआई के दिशा-निर्देशों के अनुसार, 45 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को पॉलिसी देने से पहले मेडिकल टेस्ट करवाना जरूरी होता है, यदि कंपनी ने बिना जांच किए पॉलिसी जारी की और प्रीमियम लेती रही, तो बाद में वह बीमारी छिपाने का आरोप नहीं लगा सकती। आयोग ने एलआईसी के इस रवैये को सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार व्यवहार माना है।

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