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Kurukshetra News: प्राकृतिक खेती से घटेगा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, केयू के शोध में दावा
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कुरुक्षेत्र। प्राकृतिक खेती अपनाने से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। यह दावा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन संस्थान के एक शोध में किया गया है। अध्ययन में कैथल, कुरुक्षेत्र और करनाल के 27 स्थानों पर प्राकृतिक, जैविक और परंपरागत खेती का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया।
यह शोध विश्वविद्यालय की शोधार्थी नेहा कालोनिया ने सहायक प्रोफेसर डॉ. दीप्ति ग्रोवर के निर्देशन में किया है। शोध के अनुसार परंपरागत खेती में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन सबसे अधिक पाया गया, जबकि प्राकृतिक खेती पर्यावरण के लिए सबसे अनुकूल रही। धान की खेती में परंपरागत पद्धति की तुलना में प्राकृतिक खेती से करीब 31.6 प्रतिशत और गेहूं की खेती में 7.18 प्रतिशत तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई। जैविक खेती में भी उत्सर्जन कम पाया गया।
अध्ययन वर्ष 2023-24 के दौरान उत्तर-पश्चिम भारत के प्रमुख धान-गेहूं उत्पादक क्षेत्रों कैथल, कुरुक्षेत्र और करनाल के 27 स्थानों पर किया गया। इसमें खेतों का सर्वेक्षण, मिट्टी के भौतिक एवं रासायनिक गुणों का विश्लेषण, फसल उत्पादकता का परीक्षण तथा कूल फार्म टूल के माध्यम से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का आकलन किया गया।
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शोध में यह भी सामने आया कि परंपरागत खेती की तुलना में धान की उत्पादकता जैविक खेती में 18 प्रतिशत और प्राकृतिक खेती में करीब 8.99 प्रतिशत कम रही। शोधकर्ताओं का कहना है कि परंपरागत खेती फिलहाल अधिक उत्पादन देती है लेकिन प्राकृतिक खेती पर्यावरणीय दबाव कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर विकल्प हो सकती है।
डॉ. दीप्ति ग्रोवर ने बताया कि भविष्य की कृषि केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रह सकती। पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देना समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शोध के निष्कर्ष जलवायु-स्मार्ट कृषि नीतियां बनाने और पर्यावरण हितैषी खेती को बढ़ावा देने में उपयोगी साबित होंगे। उन्होंने बताया कि यह शोध उनके निर्देशन में शोधार्थी नेहा कालोनिया ने किया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) के वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार मिश्रा का भी सहयोग रहा।
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यह शोध विश्वविद्यालय की शोधार्थी नेहा कालोनिया ने सहायक प्रोफेसर डॉ. दीप्ति ग्रोवर के निर्देशन में किया है। शोध के अनुसार परंपरागत खेती में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन सबसे अधिक पाया गया, जबकि प्राकृतिक खेती पर्यावरण के लिए सबसे अनुकूल रही। धान की खेती में परंपरागत पद्धति की तुलना में प्राकृतिक खेती से करीब 31.6 प्रतिशत और गेहूं की खेती में 7.18 प्रतिशत तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई। जैविक खेती में भी उत्सर्जन कम पाया गया।
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अध्ययन वर्ष 2023-24 के दौरान उत्तर-पश्चिम भारत के प्रमुख धान-गेहूं उत्पादक क्षेत्रों कैथल, कुरुक्षेत्र और करनाल के 27 स्थानों पर किया गया। इसमें खेतों का सर्वेक्षण, मिट्टी के भौतिक एवं रासायनिक गुणों का विश्लेषण, फसल उत्पादकता का परीक्षण तथा कूल फार्म टूल के माध्यम से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का आकलन किया गया।
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शोध में यह भी सामने आया कि परंपरागत खेती की तुलना में धान की उत्पादकता जैविक खेती में 18 प्रतिशत और प्राकृतिक खेती में करीब 8.99 प्रतिशत कम रही। शोधकर्ताओं का कहना है कि परंपरागत खेती फिलहाल अधिक उत्पादन देती है लेकिन प्राकृतिक खेती पर्यावरणीय दबाव कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर विकल्प हो सकती है।
डॉ. दीप्ति ग्रोवर ने बताया कि भविष्य की कृषि केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रह सकती। पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देना समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शोध के निष्कर्ष जलवायु-स्मार्ट कृषि नीतियां बनाने और पर्यावरण हितैषी खेती को बढ़ावा देने में उपयोगी साबित होंगे। उन्होंने बताया कि यह शोध उनके निर्देशन में शोधार्थी नेहा कालोनिया ने किया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) के वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार मिश्रा का भी सहयोग रहा।