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Kurukshetra News: भगवान नरसिंह जयंती पर मिलती है अकालमृत्यु के भय से मुक्ति
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कुरुक्षेत्र। विष्णु जी के नरसिंह अवतार।
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कुरुक्षेत्र। जब-जब धरती पर बुराई बढ़ती है, भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतार लेकर संतुलन बनाते हैं। इन्हीं में से एक हैं नरसिंह अवतार। यह भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना जाता है। इनका उद्देश्य था परम भक्त प्रह्लाद को बचाना और अत्याचारी राजा हिरण्यकशिपु का अंत। हिरण्यकशिपु को ऐसा वरदान मिला हुआ था कि उसे न इंसान मार सकता था, न जानवर और न देवता। उसने स्वयं को अजेय समझ लिया था। नरसिंह जयंती प्रतिवर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. रामराज कौशिक ने बताया कि पंचांग के अनुसार यह तिथि 29 अप्रैल को शाम 7:51 बजे शुरू होगी और 30 अप्रैल को रात 9:12 बजे खत्म होगी। उदया तिथि के आधार पर यह पर्व 30 अप्रैल वीरवार को मनाया जाएगा। इस दिन पूजा का विशेष शुभ समय शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक रहेगा। सारा दिन ही चतुर्दशी के कारण पूरा दिन पूजा दर्शन दान पुण्य कर सकते हैं। नरसिंह जयंती सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि यह अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक भी है। मान्यता है कि इस दिन भगवान नरसिंह की पूजा करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं।
ग्रह दोष शांत होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। जो लोग इस दिन व्रत रखते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं, उन्हें एकादशी व्रत के समान पुण्य मिलता है और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और अंत में बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
भगवान नरसिंह के भोग की प्रिय वस्तुएं
पंडित बलराज ने बताया कि भगवान नरसिंह को मुख्य रूप से गुड़ और चने का भोग सबसे प्रिय है, जो उनकी उग्रता को शांत करने के लिए अर्पित किया जाता है। पंचामृत, पनाकम (गुड़ का शरबत), केसरिया भात, फल (जैसे केला, नारियल, आम), हलवा और शीतल पेय भी उन्हें अत्यंत प्रिय हैं। लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
बारवा में नरसिंह भगवान का एकमात्र मंदिर
गांव बारवा में स्थित नरसिंह भगवान मंदिर एक ऐतिहासिक और सिद्ध तीर्थ है, जो 48 कोस कुरुक्षेत्र भूमि के अंतर्गत आता है। महाभारत युद्ध के दौरान भीम ने दुशासन का वध करने की शक्ति पाने के लिए यहां भगवान नरसिंह की उपासना की थी। यह मंदिर नृसिंह तीर्थ और सरोवर के लिए प्रसिद्ध है। यहां 9वीं-10वीं शताब्दी के खंडित मूर्ति के अवशेष भी मिले। विशालकाय भीम की मूर्ति भी शोभनीय है।
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ज्योतिषाचार्य डॉ. रामराज कौशिक ने बताया कि पंचांग के अनुसार यह तिथि 29 अप्रैल को शाम 7:51 बजे शुरू होगी और 30 अप्रैल को रात 9:12 बजे खत्म होगी। उदया तिथि के आधार पर यह पर्व 30 अप्रैल वीरवार को मनाया जाएगा। इस दिन पूजा का विशेष शुभ समय शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक रहेगा। सारा दिन ही चतुर्दशी के कारण पूरा दिन पूजा दर्शन दान पुण्य कर सकते हैं। नरसिंह जयंती सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि यह अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक भी है। मान्यता है कि इस दिन भगवान नरसिंह की पूजा करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं।
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ग्रह दोष शांत होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। जो लोग इस दिन व्रत रखते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं, उन्हें एकादशी व्रत के समान पुण्य मिलता है और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और अंत में बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
भगवान नरसिंह के भोग की प्रिय वस्तुएं
पंडित बलराज ने बताया कि भगवान नरसिंह को मुख्य रूप से गुड़ और चने का भोग सबसे प्रिय है, जो उनकी उग्रता को शांत करने के लिए अर्पित किया जाता है। पंचामृत, पनाकम (गुड़ का शरबत), केसरिया भात, फल (जैसे केला, नारियल, आम), हलवा और शीतल पेय भी उन्हें अत्यंत प्रिय हैं। लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
बारवा में नरसिंह भगवान का एकमात्र मंदिर
गांव बारवा में स्थित नरसिंह भगवान मंदिर एक ऐतिहासिक और सिद्ध तीर्थ है, जो 48 कोस कुरुक्षेत्र भूमि के अंतर्गत आता है। महाभारत युद्ध के दौरान भीम ने दुशासन का वध करने की शक्ति पाने के लिए यहां भगवान नरसिंह की उपासना की थी। यह मंदिर नृसिंह तीर्थ और सरोवर के लिए प्रसिद्ध है। यहां 9वीं-10वीं शताब्दी के खंडित मूर्ति के अवशेष भी मिले। विशालकाय भीम की मूर्ति भी शोभनीय है।
